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Updated: 29 सितम्बर, 2018 03:42 PM
अंशुमान शुक्ल
अंशुमान शुक्ल
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बांग्लादेशी घुसपैठिये, अब ये नाम अटपटा सा नहीं लगता. ऐसा इसलिए क्योंकि बांग्लादेश के गावों और शहरों से रोजगार की तलाश में भारत की सीमा लांघ कर पहुंचे लाखों लोग अब हमारे घरों के भीतर तक दाखिल हो चुके हैं. काम करने वाली बाई, ड्राइवर, सब्जी वाले सहित तमाम कामगारों की शक्ल में. अकेले उत्तर प्रदेश में दस साल पहले एक लाख से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठिये थे. अब तो इनमें से अधिकांश के आधार व राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र तक बन चुके हैं. ये सुनकर अचरज नहीं होगा कि इनमें से कुछ आयकर रिटर्न तक भर रहे हों.

दरअसल बांग्लादेशी घुसपैठिये अब मुद्दे की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं. खास तौर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक प्रमुख मोहन भागवत और भारतीय जनता पार्टी प्रमुख अमित शाह ऐसे घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने की बात करते हैं. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार के बाद फिर से इनकी शिनाख्त का काम शुरू हुआ तो एक साल के भीतर 67 बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़ लिया गया. ऐसा प्रमुख सचिव गृह का कहना है.

बांग्लादेशी घुसपैठिये, बांग्लादेश, कानून, उत्तर प्रदेश  सारे देश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के लिए भी बांग्लादेशी घुसपैठिये बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं

दरअसल बांग्लादेशी घुसपैठियों ने असम के रास्ते भारत में दाखिल होने के दशकों बाद जब देश भर के शहरों का रुख किया तो जनता की निगाहें इन पर गर्इं. कभी कबाड़ वाले तो कभी कूड़ा बीनने वालों की शक्ल में गलियों से लेकर शहर के बेहद सुरक्षित इलाकों तक पहुंच चुके इन बांग्लादेशी घसपैठियों में से कुछ ने जब देश की आंतरिक सुरक्षा की रेकी शुरू की तो केन्द्रीय गृह मंत्रालय का माथा ठनका. जयपुर में हुए सिलसिलेवार पांच बम धमाकों के बाद 20 मई वर्ष 2008 को देश भर में ऐसे घुसपैठियों की पहचान का अभियान शुरू किया गया था. उस वक्त उत्तर प्रदेश के सभी शहरों में एक लाख बांग्लादेशी घुसपैठियों के होने की बात सामने आई.

भारतीय जनता पार्टी ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से बाहर करने का जब संकल्प लिया तो जिन राज्यों में उनकी सरकार है, वहां ऐसे घुसपैठिये तलाशे जाने लगे. उत्तर प्रदेश में भी बेहद गुपचुप तरीके से इनकी तलाश में अभियान शुरू किया गया. नतीजा यह हुआ कि एक साल में 67 पकड़े गये. उत्तर प्रदेश सरकार के पास बांग्लादेशी घुसपैठियों के बारे में नौ साल पहले से मौजूद आंकड़े बताते हैं कि गोरखपुर, बनारस, बलिया, गाजीपुर, मिर्जापुर, इलाहाबाद, जौनपुर, आजमगढ़, बांदा, मेरठ, मुरादाबाद, फिरोजाबाद, गाजियाबाद, नोएडा, सहित प्रमुख शहरों में एक लाख से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठिये रह रहे हैं.

बीते पन्द्रह वर्षों में प्रदेश में तेजी से बढ़ी इनकी संख्या और इसी दरमयान उत्तर प्रदेश में फैले हूजी, जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तोएबा सरीखे आतंकवादी संगठनों के स्लीपिंग माड्यूल्स ने प्रदेश सरकार को गहरी सोच में डाल दिया है. वरिष्ठ आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक अगले वर्ष इलाहाबाद में आयोजित होने वाले कुम्भ को आतंकवादी घटनाओं से सुरक्षित रखने के लिए नौ बरस बाद उत्तर प्रदेश में बांग्लादेशी घुसपैठियों की खोजबीन का अभियान शुरू किया गया है.

नौ बरस पहले अकेले लखनऊ के सात थाना क्षेत्रों हैदर कैनाल, कुड़ियाघाट, ऐशबाग रेलवे कालोनी, राजाजीपुरम, मड़ियांव, आशियाना और कुकरैल बंधे पर स्थित झुग्गी झोपड़ियों में पुलिस ने छापेमारी की कार्रवाई की थी. उस वक्त लखनऊ के सभी थानेदारों को अपने इलाके से बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर उनकी सूची बनाने के निर्देश जारी किये गये थे. बहुजन समाज पार्टी की सरकार में ऐसी पहल की गई थी. लेकिन वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद इस अभियान को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया.

बांग्लादेशी घुसपैठिये, बांग्लादेश, कानून, उत्तर प्रदेश  कहना गलत नहीं है कि बांग्लादेशी घुसपैठिये सरकार के लिए बड़ी चुनौती हैं

आतंकवादी संगठनों खास तौर पर हूजी की कार्यप्रणाली पर नजर रख रहे प्रदेश के एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी के मुताबिक पहली बार आतंकवादी वारदातों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संलिप्तता का पुख्ता प्रमाण उत्तर प्रदेश पुलिस को 23 मई वर्ष 2007 को मिला था. उस वक्त फैजाबाद, बनारस और लखनऊ की दीवानी न्यायालय परिसर में सिलसिलेवार बम विस्फोट हुए थे.

इस मामले में एसटीएफ द्वारा गिरफ्तार किये गए हूजी के पश्चिम बंगाल के सिपहसालार बाबू उर्फ जलालुद्दीन व उसके सात अन्य साथियों ने जानकारी दी थी कि प्रदेश में विभिन्न आतंकवादी संगठनों के लगभग तीन सौ स्लीपिंग माड्यूल्स हैं. इस जानकारी के मिलने के बाद से ही प्रदेश सरकार चौकन्ना हो गई थी. उसी के बाद से प्रदेश में काली आंधी की तरह फैले बांग्लादेशी घुसपैठियों से निपटने के रास्ते तलाशे जा रहे थे. केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों के पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि सिलसिलेवार पांच बम धमाकों से दहले गुलाबी शहर जयपुर में हरकत-उल-जेहादी-ए-इस्लाम हूजी ने यह दहशतगर्दी फैलाई थी.

देश की जांच एजेंसियों के पास इस बात के पुख्ता सुबूत हैं कि हूजी ने मम्बई, हैदराबाद, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित देश के प्रमुख राज्यों में अपनी गहरी पैठ जमा ली है. बेहद शातिराना तरीके से शतरंज की एक एक गोट सरका रहे इस आतंकवादी संगठन को लश्कर-ए-तोयबा और हरकत-उल-अंसार पूरा समर्थन दे रहा है. हूजी सहित विभिन्न आतंकवादी संगठनों के प्राक्सी वार से निपटने के लिए आपरेशन क्लीन शुरू किया जा सकता है. यही वह आतंकवादी संगठन है जिसने वाराणसी के संकटमोचन मंदिर में बम धमाकों को अंजाम दिया था.

पाकिस्तान से सटी भारत की सीमा पर कड़ी चौकसी को देखते हुए आईएसआई ने वर्ष 1998-99 में हूजी का मुख्यालय बांग्लादेश स्थानान्तरित कर दिया. अब तक हूजी ने देश में जितने भी बम धमाकों को अंजाम दिया है उसमें तीन बम धमाके ऐसे हैं जो मंगलवार को अंजाम दिये गए. संकटमोचन मंदिर, हैदराबाद और जयपुर में हुए धमाके के लिए मंगलवार का दिन चुनना इस बात की ओर इशारा करता है कि हूजी के अलावा यह काम किसी और का हो ही नहीं सकता था.

इस काम के लिए उसने अपने उन्हीं माड्यूल्स का इस्तेमाल किया जो कामगार की शक्ल में भारत में दाखिल होकर इन शहरों में बरसों से रह रहे थे. केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों के पास हूजी से जुड़े जो दस्तावेज हैं उनमें इस बात का साफ जिक्र है कि अब तक भारत में हुए सभी बम धमाकों को उसके दो मास्टरमाइंड अंजाम तक पहुंचाते हैं. मुनीर और असद उल्लाह नामक यह दोनों आतंकवादी बंगलादेश में ही बैठ कर विस्फोट का सारा ताना-बाना बुनते हैं. इस काम के लिए उन्होंने भारत में मौजूद अपने घुसपैठियों का सहारा लिया है. यही वजह है कि देश से इनको निकालने की आवाज दिन-ब-दिन बुलन्द हो रही है.

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अंशुमान शुक्ल अंशुमान शुक्ल @anshuman.shukla.7

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.

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