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Updated: 13 अप्रिल, 2019 05:01 PM
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जब RSS और BJP ने अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा चुनाव तक होल्ड कर लिया तो लगा यूपी चुनावी मुद्दे इस बार अलग होंगे - या कहम से कम श्मशान और कब्रिस्तान की बहस में तो नहीं ही उलझने वाले हैं. भ्रम टूटने में ज्यादा देर नहीं लगी. हो सकता है 2018 के विधानसभा चुनावों में हार के चलते यूपी के मुख्यमंत्री भी राष्ट्रवाद पर ही बहस को आगे बढ़ा रहे थे, तभी मायावती ने देवबंध पहुंच कर नया मुद्दा उठा दिया.

मुस्लिम वोटों को लेकर बीजेपी और कांग्रेस की लड़ाई काफी पुरानी है, इस बार इसमें मायावती भी धावा बोल चुकी हैं. बीजेपी कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण तो कांग्रेस बीजेपी पर सांप्रदायिक राजनीति का आरोप लगाती रही है, लेकिन अब बात आगे बढ़ चुकी है.

अब तक सिर्फ बीजेपी पर वोटों के ध्रुवीकरण का इल्जाम लगता रहा - लेकिन अब मायावती भी अपने फायदे के हिसाब से ये खेल खेलने लगी हैं. योगी आदित्यनाथ की अली और बजरंगबली मुहिम के अलावा मुस्लिम वोटों पर अपने बयान को लेकर मेनका गांधी भी सुर्खियों में छा चुकी हैं.

चुनाव आयोग ने मुस्लिम वोटों को लेकर बयानबाजी के लिए मायावती और योगी आदित्यनाथ के बाद मेनका गांधी को भी नोटिस थमा दिया है. वैसे भी आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में चुनाव आयोग के नोटिस उसकी सजा से ज्यादा असरदार लगते हैं.

मेनका की धमकी

बीजेपी में साक्षी महाराज जैसे नेता तो बस बयानबाजी के भरोसे ही अस्तित्व बचाये रखते हैं. वो टिकट न मिलने की स्थिति में पार्टी नेतृत्व को धमकाते हैं तो वोटिंग से पहले इलाके के लोगों को - 'वोट नहीं दिया तो श्राप दे देंगे'. साक्षी महाराज और मेनका गांधी की राजनीति में ऐसे तो तुलना नहीं हो सकती लेकिन मतदाताओं को धमकाने में ज्यादा अंतर नहीं लगता. मतदाताओं को धमकाने के मामले में साक्षी महाराज और मेनका गांधी में फर्क सिर्फ इतना है कि उन्नाव से भगवाधारी उम्मीदवार ने सीधे सीधे धमकाया है तो सुल्तानपुर से पशु अधिकारों की पैरोकार उम्मीदवार नें थोड़ी संजीदगी बरती है.

जिस साक्षी महाराज को बलात्कारी राम रहीम जैसे अपराधियों को सजा मिलने पर साजिश लगती है - उसके श्राप कितने असरदार होंगे ये तो बताने की भी जरूरत नहीं लगती लेकिन मेनका गांधी जो बातें चर्चा में हैं वो जरूर लोकतंत्र के लिए फिक्र करने वाली हैं.

mayawati, ajit singh, akhilesh yadavमुस्लिम वोट के लिए कुछ भी करेंगे...

एक वायरल वीडियो में मेनका गांधी को बड़े आक्रामक अंदाज में कहते सुना गया है - 'मैं जीत रही हूं मैं जीत रही हूं... लोगों की मदद लोगों के प्यार से मैं जीत रही हूं, लेकिन मेरी जीत मुसलमानों के बिना होगी तो मुझे बहुत अच्छा नहीं लगेगा - क्योंकि इतना मैं बता देती हूं कि दिल खट्टा हो जाता है. फिर जब मुसलमान आता है काम के लिए फिर मैं सोचती हूं कि रहने दो क्या फर्क पड़ता है? नौकरी सौदेबाजी भी तो होती है. ये नहीं की हम भी कोई महात्मा गांधी की छठी औलाद नहीं हैं... ऐसा थोड़ा ही है कि हम भी सिर्फ देते ही रहेंगे और चुनाव में मार खाएंगे.'

चुनाव आयोग की तरफ से मेनका गांधी के बयान पर नोटिस देकर जवाब मांगा गया है. मुसलमानों को लेकर अपने बयान के चलते मेनका के बेटे वरुण गांधी भी विवादों में रहे हैं - हालांकि, बाद में वो सबूतों के अभाव में अदालत से बरी हो गये थे.

मुस्लिमों वाले बयान के वायरल होने के बाद मेनका गांधी बीजेपी के आईटी सेल पर भड़की हुई बतायी जा रही हैं. मेनका का कहना है कि जो उन्होंने बोला और जो टीवी पर दिखाया गया वो बिलकुल अलग है. मेनका का कहना है कि शुरू से ही वो चाह रही हैं कि मुसलमान भाई साथ आयें, लेकिन आईटी सेल ने उसे गंभीरता से नहीं लिया.

मायावती की धमकी

मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के मामले में मायावती ने 2017 में भी कोई कसर बाकी नहीं रखी थी. तब मायावती के करीबी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी तो महीनों मुस्लिम समुदाय को बैठा कर मायावती को मसीहा के रूप में पेश करते रहे - और माफिया डॉन मुख्तार अंसारी को दोबारा साथ लिये जाने के पीछे भी मायावती का यही मकसद रहा. मगर, अफसोस की बात ये रही कि कोई तिकड़म काम न आया.

देवबंद में सपा-बसपा-आरएलडी की पहली ही रैली में मायावती ने मुस्लिम समुदाय से जो अपील की उस पर विवाद शुरू हो गया. मायावती ने मुस्लिम समुदाय को समझाया कि कांग्रेस नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ गठबंधन ही बीजेपी को चुनावों में जीतने से रोक सकता है, इसलिए वे अपना वोट किसी भी सूरत में बंटने न दें.

चुनाव आयोग ने मायावती के इस बयान को प्रथम दृष्या आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना था और नोटिस देकर जवाब मांगा था. मायावती की ओर से चुनाव आयोग को नोटिस का जवाब दिया जा चुका है.

योगी के अली और बंजरंग बली

रामनवमी की शुभकामनाओं वाले ट्वीट में मायावती जिस विवाद का जिक्र कर रही हैं उसे हवा दी है यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने. योगी आदित्यनाथ अभी तक सिर्फ राष्ट्रवाद के नाम पर वोट मांगते आ रहे थे, लेकिन मायावती के बयान के बाद उन्हें भी जोश आ गया लगता है.

2018 के विधानसभा चुनावों में योगी आदित्यनाथ का प्रचार प्रभावी नहीं रहा, इसलिए अब तक न तो उनके मुंह से हनुमान को दलित सुनने को मिल रहा था, अली और बजरंग बली की मुबारकवाद.

योगी आदित्यनाथ ने मौके की जरूरत को देखते हुए अली और बजरंगबली का फर्क समझाना शुरू कर दिया है. योगी आदित्यनाथ के इस बयान पर भी चुनाव आयोग ने नोटिस दिया था जिसका वो जवाब भी दे चुके हैं. कहते हैं जवाब में योगी आदित्यनाथ ने आगे से ऐसा न करने का वचन दिया है.

योगी आदित्यनाथ ने इससे पहले मोदी की सेना कह कर चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया था और बतौर सजा आयोग ने आगे से ऐसा न करने की चेतावनी जारी करके अपना धर्म भी निभा लिया था. देखना है क्या बार बार आचार संहिता का उल्लंघन करने पर कोई कड़ी सजा भी सुनायी जाती है क्या?

वैसे योगी आदित्यनाथ के बयान पर समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने एक नया नाम दिया है - 'बजरंग अली'. रामपुर लोक सभा सीट से उम्मीदवार आजम खान ने कहा, 'आपस के रिश्ते को अच्छा करो, अली और बजरंग में झगड़ा मत कराओ, मैं तो एक नाम देता हूं बजरंग अली.'

आजम खान के बयान पर बीजेपी नेता गिरिराज सिंह भड़क उठे हैं. नवादा से हटाकर चुनाव लड़ने बेगूसराय भेजे गये गिरिराज सिंह का कहना है कि आजम खान ने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली दी और अब हमारे भगवान को गाली दे रहे हैं. गिरिराज सिंह ने कहा है कि चुनाव के बाद वो रामपुर जाएंगे और आजम खान को बताएंगे कि बजरंग बली क्‍या हैं!

वो दौर पर बहुत पहले खत्म हो गया जब धार्मिक नेताओं के फतवे पर मुस्लिम समुदाय वोट दिया करता था, लेकिन वोट डालने को लेकर रवैया नहीं बदला है. अब तो ये खुलेआम सा लग रहा है कि जो कोई भी बीजेपी उम्मीदवार को हराने का यकीन दिला दे मुस्लिम समुदाय का वोट उसे ही मिलना है. मायावती का बयान इस सिलसिले में अलर्ट और रिमाइंडर जैसा ही है लेकिन अंदाज धमकी भरा लगता है. मेनका गांधी ने तो साफ साफ बता ही दिया है अगर उन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिले तो वो इस बात की भी परवाह नहीं करेंगी कि उनके नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'सबका साथ सबका विकास' जैसा कोई स्लोगन भी दिया है.

मेनका गांधी के बयान से तो ऐसा लगता है कि चुनाव जीतने के बाद अगर को उनसे मदद मांगने आता है और उनके पास इस बात की पक्की रिपोर्ट होती है कि मुस्लिम समुदाय ने उन्हें वोट नहीं दिये - तो वो उसे उल्टे पांव लौटा देंगी. वोट नहीं काम नहीं. एक हाथ से लो, दूसरे हाथ से दो. बराबरी का लेन देन भी तो एक तरीके का हिसाब किताब ही है.

देवबंद के बाद गठबंधन की दूसरी रैली में मायावती के तेवर थोड़ बदले लग रहे हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों पर बराबर आक्रामक मायावती का दावा है कि 'अली' और 'बजरंग बली' दोनों उनके साथ हैं. क्या ये योगी आदित्यनाथ के उस बयान का प्रभाव है जिसमें उन्होंने हनुमान को दलित बताया था. फिर तो योगी आदित्यनाथ ने मायावती का काम और आसान कर दिया है - आखिर दलित और मुस्लिम वोटों को मिलाकर ही तो वो चुनाव जीतना चाहती हैं.

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