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Updated: 24 जनवरी, 2022 07:13 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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महात्मा गांधी के प्रिय भजनों में से एक रहे 'अबाइड विद मी' (Abide With Me) को केंद्र सरकार ने बीटिंग रिट्रीट समारोह से हटाने का फैसला लिया है. भारतीय सेना की ओर से बीटिंग रिट्रीट समारोह के लिए जारी किए गए ब्राशर में इस बात की जानकारी सामने आई है. 'अबाइड विद मी' को हटाकर बीटिंग रिट्रीट समारोह में लोकप्रिय देशभक्ति गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' को जगह दी गई है. इस गीत को कवि प्रदीप ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को याद करने के लिए लिखा था. वहीं, 'अबाइड विद मी' भजन को हटाने के फैसले पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई है. इससे पहले अमर जवान ज्योति के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की लौ में विलय को लेकर भी कांग्रेस ने केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी. कांग्रेस का आरोप है कि महात्मा गांधी की विरासत को मिटाने के लिए ये फैसला लिया गया है. कांग्रेस प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने इसे 'वैचारिक युद्ध' बताया है. इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि 'अबाइड विद मी' को बीटिंग रिट्रीट से हटाने का विरोध कितना जायज है?

Abide With Me song removed from Beating Retreat Ceremonyस्कॉटलैंड के एक चर्च के पादरी और एंजलिकन कवि हेनरी फ्रांसिस लाइट ने 'अबाइड विद मी' भजन लिखा था.

केंद्र सरकार का क्या तर्क है?

'अबाइड विद मी' को बीटिंग रिट्रीट समारोह से हटाने के फैसले पर केंद्र सरकार का मानना है कि देश की आजादी के 75वें साल के जश्न में मनाए जा रहे 'आजादी का अमृत महोत्सव' के लिए भारतीय धुन ज्यादा अनुकूल है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्र सरकार चाहती थी कि 'बीटिंग रिट्रीट समारोह में भारतीय धुनों को तवज्जो दी जाए.' बताया जा रहा है कि इसी कारण से 29 जनवरी को आयोजित होने वाले समारोह में केवल भारतीय मूल के धुनों को ही बजाया जाएगा.

गाने का क्या इतिहास है?

स्कॉटलैंड के एक चर्च के पादरी और एंजलिकन कवि हेनरी फ्रांसिस लाइट ने 'अबाइड विद मी' भजन लिखा था. 1820 में हेनरी फ्रांसिस लाइट ने अपने एक करीबी दोस्त के आखिरी समय में भगवान से उसकी पीड़ा को कम करने की प्रार्थना के लिए ये भजन लिखा था. हालांकि, 1847 में हेनरी फ्रांसिस लाइट के अंतिम संस्कार पर यह पहली बार गाया गया था. ईसाई धर्म के लोगों में यह भजन बहुत ही लोकप्रिय है. लेकिन, इस भजन को लोकप्रियता तब मिली, जब प्रथम विश्व युद्ध के दौरान एडिथ कावेल नाम की एक ब्रिटिश नर्स ने इसे गाया था. कहा जाता है कि एडिथ कावेल ने इसे जर्मन सैनिकों द्वारा अपनी हत्या किए जाने से एक रात पहले इसे गाया था.

महात्मा गांधी और 'अबाइड विद मी'

'अबाइड विद मी' को महात्मा गांधी के प्रिय भजनों में से एक माना जाता है. जिसे उन्होंने पहली बार मैसूर पैलेस बैंड द्वारा बजाई गई धुन के तौर पर सुना था. इसके बाद महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम की भजनावली में 'वैष्णव जन तो...' और 'रघुपति राघव राजाराम' के साथ ही 'अबाइड विद मी' को शामिल किया गया था. 'अबाइड विद मी' की ये धुन 1950 से बीटिंग रिट्रीट समारोह का हिस्सा था. कहा जा सकता है कि महात्मा गांधी की पसंदीदा धुन होने की वजह से ही इस धुन को बीटिंग रिट्रीट में शामिल किया गया था.

भारतीय सेना का हिस्सा क्यों बने?

एक ईसाई प्रेयर जिसे एक स्कॉटिश लेखक (चर्च के पादरी) ने लिखा है, वह 1950 से बीटिंग रिट्रीट (भारतीय सेना) का हिस्सा क्यों है? इस सवाल का एक ही जवाब है कि ये धुन महात्मा गांधी को प्रिय थी. 'अबाइड विद मी' एक अच्छा भजन है, इसमें कोई दो राय नही है. लेकिन, केंद्र सरकार अगर बीटिंग रिट्रीट में भारतीय गीतों को शामिल करने में तरजीह देती है, तो इसका विरोध क्या केवल इसलिए किया जाना चाहिए कि इसकी वजह से महात्मा गांधी की प्रिय धुन को हटा दिया गया. 'आजादी का अमृत महोत्सव' मना रहे देश में केंद्र सरकार अगर 'अबाइड विद मी' को बीटिंग रिट्रीट से हटाकर भारत-चीन युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों की शहादत को याद करने वाले देशभक्ति गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' को शामिल करती है, तो इसमें दिक्कत क्या है?

कवि प्रदीप के इस गीत को पहली बार 27 जनवरी, 1963 में लता मंगेशकर ने शहीदों की विधवाओं के लिए एक फंडरेजर कार्यक्रम में गाया था. दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में आयोजित उस कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी शामिल हुए थे. कहा जाता है कि 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गीत को सुनते हुए जवाहर लाल नेहरू की आंखें नम हो गई थीं. एक ईसाई भजन की जगह लोगों में देशभक्ति की भावना को जगाने वाले इस गीत की धुन कानों को कहीं ज्यादा सुखद लगेगी. क्योंकि, यह देशभक्ति गीत लंबे समय से ऐसे कई कार्यक्रमों का हिस्सा रहा है. आसान शब्दों में कहा जाए, तो 'अबाइड विद मी' से कहीं ज्यादा लोगों का इस गीत से भावनात्मक लगाव है. और, ये बात किसी भी हाल में अतिश्योक्ति नहीं कही जा सकती है.

अगर ऐसे देशभक्ति गीत को भारतीय सेना का हिस्सा बनाया जाता है, तो इससे केवल कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को ही समस्या हो सकती है. क्योंकि, इसकी वजह से उन्हें भाजपा पर सियासी हमले करने का मौका मिलता है.इस पर कांग्रेस की ओर से सवाल उठाए जाने के पीछे भी यही वजह है कि कांग्रेस किसी भी हाल में महात्मा गांधी की विरासत संभालने वाली पार्टी की अपनी छवि को खोना नहीं चाहती है. अभी हाल ही में अमर जवान ज्योति के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की लौ में विलय को लेकर भी कांग्रेस ने हंगामा मचाया था. जबकि, तार्किक रूप से देखा जाए, तो राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की ज्योति में अमर जवान ज्योति का विलय कहीं से भी गलत नही कहा जा सकता है. लेकिन, कांग्रेस का ऐसे मुद्दों को लेकर विरोध का एजेंडा बिल्कुल साफ है. क्योंकि, महात्मा गांधी के नाम के सहारे भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाए बगैर कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों का राजनीतिक मकसद पूरा नहीं हो सकता है.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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