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सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   12-10-2018
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लखनऊ में शिवपाल यादव को नया बंगला मिला है. वो बंगला जो कभी मायावती का हुआ करता था. मायावती ने उसे दफ्तर बनाया हुआ था, लेकिन कहा तो यहां तक जाता है कि सतीश चंद्र मिश्रा जैसे नेता भी जूते उतार कर अंदर जाया करते रहे. बाकियों की क्या हैसियत रही होगी समझा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट का डंडा चला तो बाकी पूर्व मुख्यमंत्रियों की तरह मायावती को भी वो बंगला खाली करना पड़ा.

बंगले की खासियत सिर्फ इतनी भर नहीं है. ये बंगला मायावती के मौजूदा बंगले की बगल में है - मतलब, यूपी की योगी सरकार की कृपा से शिवपाल यादव अब से मायावती के पड़ोसी हो गये हैं.

लखनऊ के सियासी गलियारे में ये बंगला फिलहाल चर्चा का सबसे हॉट टॉपिक है. लोग अपने अपने तरीके से इसका बखान और सियासी पैमाइश भी करते जा रहे हैं.

फिर भी हर जबान पर लाख टके का सवाल तो सिर्फ एक ही है - बंगले के पीछे, बीजेपी सरकार का मकसद क्या है?

मायावती के पड़ोसी बने शिवपाल यादव

व्हाट्सऐप के जमाने में भी कई जगह पोस्टल अड्रेस की अहमियत बनी हुई है. विशेष रूप से राजनीति में. ताजा खबर ये है कि शिवपाल यादव का भी पोस्टल अड्रेस बदल गया है.

shivpal yadavमायावती के पड़ोसी बने शिवपाल यादव

शिवपाल यादव का नया पता है - 6, लाल बहादुर शास्त्री मार्ग, लखनऊ. जिस बंगले का ये पता है उसका इस्तेमाल मायावती भी दफ्तर के रूप में ही करती थीं - और अब शिवपाल यादव को लेकर भी वैसे ही कयास लगाये जा रहे हैं. शिवपाल यादव ने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बना रखा है. समझा जा रहा है कि शिवपाल यादव इस बंगले को अपने नये मोर्चे का दफ्तर बनाएंगे. बंगले से पहले तो शिवपाल के मोर्चे की ही चर्चा रही है. कहा जा रहा है कि शिवपाल के मोर्चे के पीछे बीजेपी का ही हाथ है. बंगले के पीछे किसका हाथ है ये तो बताने की भी जरूरत नहीं है. खुलेआम तो नहीं लेकिन इशारों में समाजवादी पार्टी महासचिव राम गोपाल यादव बीजेपी के हाथों शिवपाल पर खेलने का आरोप भी लगा चुके हैं. शिवपाल यादव और राम गोपाल यादव दोनों मुलायम सिंह यादव के भाई और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के चाचा हैं.

अब जबकि शिवपाल यादव मायावती के पड़ोसी हो गये हैं तो जाहिर है पड़ोसी का पूरा ख्याल रखना होगा उन्हें. वैसे भी मायावती समाजवादी पार्टी में चले झगड़े के दिनों में शिवपाल के प्रति बड़ी ही सहानुभूतिपूर्वक पेश आती रहीं. बीजेपी के हिसाब से देखें तो शिवपाल द्वारा पड़ोसी के ख्याल रखने का मतलब नजर रखना ही होगा.

क्या चल रहा है? पड़ोस में कौन आ जा रहा है? किसके आने और जाने का क्या मतलब होता है - ये सारी बातें तो अब शिवपाल के लोगों के जिम्मे ही होंगी.

अगर रामगोपाल यादव की बातें सही हैं तो बीजेपी शिवपाल यादव के जरिये अखिलेश यादव को ज्यादा से ज्यादा डैमेज और संभावित गठबंधन की राह में रोड़े खड़े करने की कोशिश करेगी.

क्या बदला चुका पाएंगे शिवपाल यादव?

जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक कार्यक्रम में अमर सिंह भी मौजूद थे. लखनऊ में हुए इस कार्यक्रम के लिए अमर सिंह ने विशेष रूप से भगवा कुर्ता सिलवाया था. प्रधानमंत्री कार्यक्रम में मौजूद उद्योगपतियों से बात कर रहे थे, तभी एक ऐसा प्रसंग आया कि पूरा हॉल ठहाकों से गूंज उठा. अमर सिंह की ओर इशारा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनके पास सबकी हिस्ट्री है. वो सब निकाल लेंगे. एक एक करके वो सबके इतिहास खोल देंगे.

ये ठीक है कि अमर सिंह के पास सबकी कुंडली है, लेकिन समाजवादी पार्टी के हर गेट पर अब ऐसा ताला जड़ा है कि अमर सिंह का दाखिल होना नामुमकिन है. जब तक मुलायम सिंह का दबदबा रहा, अमर सिंह समाजवादी पार्टी में एंट्री मार लेते रहे. अब वो नामुमकिन है - क्योंकि अब हर एंट्री प्वाइंट की चाबी अखिलेश या उनके आदमियों के पास है.

amar singhअमर सिंह जैसा तो कोई नहीं

वैसे भी अमर सिंह को जो जौहर दिखाना था 2017 में खूब दिखाये. अब जो बीजेपी का मुश्किल टास्क है उसके मामले में अमर सिंह फुंके हुए कारतूस के बराबर हैं. अरसे से बीजेपी को यूपी के लिए अमर सिंह के उत्तराधिकारी की तलाश रही है. जो काम अमर सिंह ने अधूरे छोड़ रखे हैं अब बीजेपी की अपेक्षा होगी कि शिवपाल यादव उसे पूरा करें. अमर सिंह के साथ साथ बीजेपी शिवपाल यादव में जीतनराम मांझी वाली खूबी भी खोजना चाहेगी.

योगी आदित्यनाथ और अपर्णा यादव की मुलाकातों से बीजेपी नेताओं को कुछ दिन लगा जरूर था कि वो अमर सिंह के अधूरे कार्यों को अंजाम देने में काम आ सकती हैं. लगता बीजेपी अब निराश हो चुकी है. हो सकता है वहां भी एक्सेस की ही समस्या आयी होगी. अमर सिंह वाली भूमिका के लिए बीजेपी को अब लगता है अपर्णा से भी अधिक अच्छे शिवपाल यादव रहेंगे.

शिवपाल यादव की एक खासियत ये भी है कि उनकी अमर सिंह से पटती भी खूब है. याद कीजिये एक खास मौके पर जब शिवपाल यादव रूठ कर चले गये थे तो अमर सिंह ही उन्हें मना कर वापस लाये थे. अमर सिंह की समाजवादी पार्टी में पिछली एंट्री में भी बड़ी भूमिका शिवपाल यादव की ही रही.

shipval, amar singhबीजेपी का बदला चुका पाएंगे?

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सामने सत्ता पर काबिज होने की चुनौती थी. कोई दो राय नहीं कि अमर सिंह भी उसमें एक स्मार्ट सीढ़ी की तरह मददगार साबित हुए. समाजवादी पार्टी में चले लंबे झगड़े की सारी बातें अमर सिंह के इर्द गिर्द ही घूमती रहीं. यहां तक कि अखिलेश यादव ने झगड़े के पीछे बाहरी आदमी कह कर इशारा अमर सिंह की तरफ की किया था. अमर सिंह का मुलायम सिंह यादव पर खासा प्रभाव रहा और जब तक संभव हुआ वो निभाये भी. मुलायम सिंह ने अमर सिंह को करीबी से बढ़ कर मददगार भी बताया था. खुद मुलायम ने ही इस बात का खुलासा किया था कि अगर अमर सिंह नहीं होते तो उन्हें सात साल की सजा हो सकती थी.

जैसे भी संभव हुआ अमर सिंह ने अपने काम में कोई कोताही नहीं बरती. बीजेपी की राह में समाजवादी पार्टी ही बड़ी चुनौती थी और उसने पार पा लिया.

बीजेपी अब यूपी की सत्ता पर काबिज जरूर है लेकिन 2019 में 2014 जितनी लोक सभा सीटें जीतना अभी के माहौल में बेहद मुश्किल लग रहा है. वो भी गोरखपुर से कैराना वाया फूलपुर के सफर के बाद तो राह और भी मुश्किल हो चली है.

बीजेपी की अब यही कोशिश है कि किसी भी सूरत में कैराना मॉडल पूरे यूपी के किसी भी हिस्से में न खड़ा हो पाये. अगर कैराना मॉडल बिखर जाये तो भी गोरखपुर और फूलपुर मॉडल फिर से सिर न उठाने पाये.

लखनऊ में शिवपाल यादव को मायावती के पड़ोस में मिले बंगले के पीछे भी सबसे बड़ा राज यही लगता है. देखना होगा शिवपाल यादव बीजेपी की उम्मीदों पर कितने खरे उतरते हैं?

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