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Updated: 23 सितम्बर, 2022 06:03 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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24 साल बाद कांग्रेस को गैर-गांधी अध्यक्ष मिलने जा रहा है. 1998 में सीताराम केसरी की जगह सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया गया था. तबसे यह पद सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बीच आता-जाता रहा है. वैसे, कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने साफ कर दिया है कि वो इस चुनाव से दूर रहेंगे. इसी के साथ सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी को लेकर चल रही चर्चाएं भी किनारे लग चुकी हैं. माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस सांसद शशि थरूर के बीच चुनाव होगा.

गांधी परिवार के खिलाफ बगावत करने वाले असंतुष्ट गुट जी-23 के नेता शशि थरूर को अपने राज्य केरल के कांग्रेस नेताओं का ही समर्थन नहीं मिल पा रहा है. तो, माना जा सकता है कि कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अशोक गहलोत की राह आसान होने वाली है. खैर, कांग्रेस अध्यक्ष कौन बनेगा, इसका फैसला 19 अक्टूबर को हो जाएगा. लेकिन, यहां सवाल उठना लाजिमी है कि आखिरी गैर-गांधी अध्यक्ष सीताराम केसरी और अशोक गहलोत के बीच क्या फर्क है?

Congress President Election Sitaram Kesari Ashok Gehlotसीताराम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से बेइज्जत कर हटाया गया था.

सीताराम केसरी कौन थे, कैसे और क्यों हटाए गए

सीताराम केसरी बिहार के वरिष्ठ कांग्रेस नेता थे. जो 1996 से 1998 तक कांग्रेस अध्यक्ष पद रहे थे. 1919 में जन्मे सीताराम केसरी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी हिस्सा लिया था. और, गांधीवादी विचारों वाले केसरी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई बार जेल भी गए थे. 1967 में केसरी बिहार की कटिहार लोकसभा सीट से सांसद बने. 1973 में सीताराम केसरी को बिहार कांग्रेस समिति का अध्यक्ष बनाया गया था. 1980 में उन्हें कांग्रेस का कोषाध्यक्ष बनाया गया. सीताराम केसरी पांच बार राज्यसभा के सदस्य भी चुने गए. सीताराम केसरी के पास लंबा राजनीतिक अनुभव था. वे जवाहर लाल नेहरू से लेकर पीवी नरसिम्हा राव तक कांग्रेस के मजबूत सिपाही रहे. लेकिन, 1997 में सोनिया गांधी की कांग्रेस में एंट्री के साथ ही सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद से हटाने की बात की जाने लगी.

12वें लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 142 सीटों पर जीत दर्ज की. सोनिया गांधी ने इस चुनाव में कांग्रेस के लिए जमकर प्रचार किया. सोनिया गांधी की पहली रैली उसी तमिलनाडु राज्य में हुई, जहां उनके पति और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की गई थी. चुनाव के बाद कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने का ठीकरा सीताराम केसरी पर फोड़ा गया. क्योंकि, केसरी ने पूरे चुनाव में एक भी रैली नहीं की थी. आसान शब्दों में कहें, तो कांग्रेस में गांधी परिवार के चाहने वालों ने केसरी के खिलाफ परोक्ष रूप से मोर्चा खोल दिया. हालांकि, इंडिया टुडे को दिए अपने एक इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने कहा था कि 'सोनिया गांधी एक रक्षक की भूमिका में आई हैं.' लेकिन, गांधी परिवार के करीबियों ने केसरी को हटाने की प्लानिंग तैयार कर ली थी.

जिसके बाद सीताराम केसरी पर अंग्रेजी न आने से लेकर उच्च जाति के नेताओं को तवज्जो न देने के आरोप लगने लगे. कहा जाता है कि सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्टी पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए केसरी के विरोधी गुट को हवा दी. और, सीताराम केसरी पर पद छोड़ने का दबाव बनाया जाने लगा. कहा जाता है कि सीताराम केसरी बस ससम्मान अपना कार्यकाल पूरा करना चाहते थे. लेकिन, ये प्रस्ताव मंजूर नहीं हो सका. और, मार्च 1998 में कांग्रेस कार्य समिति ने केसरी को उनके पद से जबरन हटा दिया. कांग्रेस कार्य समिति ने उसी दौरान पार्टी के कानून में बदलाव कर सोनिया गांधी को संसदीय दल का नेता चुने जाने का रास्ता भी बनाया. कहा जाता है कि जिस दिन सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने का फैसला किया गया. तो, सीताराम केसरी गुस्से में अपने ऑफिस चले गए. जिसके बाद गुस्साए कांग्रेसियों ने सीताराम केसरी को उनके ऑफिस में बंद कर दिया था. इतना ही नहीं, उनके ऑफिस के बाहर लगी नेमप्लेट भी उखाड़ के फेंक दी गई थी. आसान शब्दों में कहें, तो केसरी को बेइज्जत करके कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया गया था.

सोनिया गांधी और 2004 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी

2004 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस केवल 141 सीटें ही जीत सकी थी. लेकिन, तब तक सोनिया गांधी का कांग्रेस पार्टी पर प्रभाव स्थापित हो चुका था. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार बनाने के लिए यूपीए का गठन किया. और, इसकी चेयरमैन बन गईं. कहा जाता है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनना चाहती थीं. लेकिन, व्यापक विरोध की वजह से ऐसा नहीं हो सका. जिसके चलते सोनिया ने गांधी परिवार के वफादार मनमोहन सिंह को पीएम पद पर बैठा दिया. 2007 में दोबारा लोकसभा चुनाव जीतने पर सोनिया गांधी ने फिर से मनमोहन सिंह को ही पीएम बनाए रखा. क्योंकि, मनमोहन सिंह को तब तक 'रबरस्टांप पीएम' कहा जाने लगा था.

2019 में गांधी परिवार की लगातार नाकामी और सरेंडर

2014 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेस को गांधी परिवार की करिश्माई छवि भी नहीं बचा सकी. और, पार्टी 50 से भी कम सीटों पर सिमट गई. वहीं, पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने केंद्र में सरकार बना ली. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष का पद सौंपा. माना जा रहा था कि राहुल गांधी पीएम पद के लिए बेहतरीन उम्मीदवार साबित होंगे. इस दौरान राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. 2019 के लोकसभा चुनाव में ही राहुल गांधी ने नारा दिया था कि 'चौकीदार चोर है.' लेकिन, उनका ये नारा कांग्रेस पर भारी पड़ा. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मोदी लहर पर सवार होकर प्रचंड बहुमत हासिल किया. जिसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़कर अपने हथियार डाल दिए थे.

अशोक गहलोत क्यों पसंद बने गांधी परिवार की

खांटी कांग्रेसी अशोक गहलोत को गांधी परिवार का करीबी माना जाता है. और, कई मौकों पर गहलोत इसे साबित भी कर चुके हैं. माना जा रहा है कि इस बार भी कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अशोक गहलोत ने गांधी परिवार के कहने पर ही चुनाव लड़ने की हामी भरी है. क्योंकि, गहलोत किसी भी हाल में राजस्थान के मुख्यमंत्री का पद नहीं छोड़ना चाहते थे. लेकिन, बीते दिनों सोनिया गांधी और राहुल गांधी से मुलाकात के बाद गहलोत का मन बदल गया. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के लिए कमर कस ली. वैसे, कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अशोक गहलोत गांधी परिवार की पसंद इसी वजह से बने हैं कि मौका आने पर वह आसानी से ये पद राहुल गांधी के लिए खाली कर दें. और, गहलोत के साथ सीताराम केसरी जैसा व्यवहार न करना पड़े.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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