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सियासत

बड़ा आर्टिकल  |   05-12-2018
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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टीम इंडिया के सलामी बल्लेबाज गौतम गंभीर ने क्रिकेट के सभी फॉर्मेट से संन्यास ले लिया है. बाएं हाथ के इस बल्लेबाज ने भारत को दो वर्ल्ड कप दिलाने में अहम भूमिका निभाई. इंटरनेशनल क्रिकेट में 10,000 से भी अधिक रन बनाए और टीम को कई अहम मौकों पर जीत दिलाई. 2007 में पाकिस्तान से टी20 के फाइनल में तो उन्होंने भारत की 'नाक' बचाने जैसा काम किया था. यूं तो जब भी कोई क्रिकेटर संन्यास लेता है तो सबसे पहले कयास इस बात के लगते हैं कि वह कोच बनेगा या कमेंट्री करेगा, लेकिन गंभीर के मामले में ऐसा नहीं है. गंभीर को लेकर लोग ये लगभग तय मान रहे हैं कि वह राजनीति में आएंगे. खैर, उनके पुराने बयानों और ट्वीट को देखकर ये अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन अगर गौतम गंभीर राजनीति में उतरे तो वह किस पार्टी में जाएंगे? ये जानने के लिए उनके ट्वीट के पैटर्न और दिल्ली की राजनीति के इतिहास पर नजर डालना जरूरी है...

गौतम गंभीर, क्रिकेट, राजनीति, भाजपा2014 में तो अरुण जेटली के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए गौतम गंभीर अमृतसर तक चले गए थे.

आम आदमी पार्टी तो बिल्कुल नहीं

दिल्ली में रहने वाले गौतम गंभीर दिल्ली के प्रदूषण को लेकर गौतम गंभीर आम आदमी पार्टी पर हमेशा ही हमला करते रहते हैं. उनके ट्वीट करने के अंदाज से ये तो साफ होता है कि वह किसी भी हालत में आम आदमी पार्टी में शामिल नहीं होंगे. देखा जाए तो उनके ट्वीट में आम आदमी पार्टी के लिए एक गुस्सा साफ दिखाई देता है.

कांग्रेस में जाना भी मुश्किल ही लगता है

मैच फिक्सिंग के आरोप लगने के बाद मोहम्मद अजहरुद्दीन के खेलने पर पाबंदी लगा दी गई थी. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और यूपी के मुरादाबाद से चुनाव जीते भी. महीने भर पहले ही ईडेन गार्डन स्टेडियम में मोहम्मद अजहरुद्दीन को घंटी बजाने की अनुमति देने को लेकर भी गंभीर नाराज दिखे. उन्होंने ट्वीट किया- 'आज भले ही भारत ईडन गार्डन्स स्टेडियम में हुए मैच जीत गया हो, लेकिन मुझे दुख है कि बीसीसीआई, सीओए और सीएबी हार गए हैं. ऐसा लग रहा है कि भ्रष्टाचार को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं करने की नीति रविवार को छुट्टी पर चली गई थी. मैं जानता हूं कि उन्हें (अजहरुद्दीन को) एचसीए का चुनाव लड़ने की इजाजत दी गई थी, लेकिन यह तो सदमा पहुंचाने वाला है. घंटी बज रही है, उम्मीद करता हूं कि शक्तियां सुन रही होंगी.' जिसे गंभीर भ्रष्ट कह रहे हैं, भला गंभीर उस पार्टी में कैसे जाएंगे, जहां वो (अजहरुद्दीन) पहले से हों.

भाजपा अच्छा विकल्प, विचारधारा से मेल खाता हुआ

आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को छोड़ दें तो दिल्ली में बड़ी पार्टी भाजपा ही बचती है. अब अगर गौतम गंभीर के पुराने ट्वीट के पैटर्न को ध्यान से देखें तो उनकी विचारधारा भाजपा से काफी मिलती-जुलती दिखाई देती है. हालांकि, वह अपने ट्वीट में भाजपा पर भी निशाना साधते हैं, लेकिन उनके खिलाफ आक्रामक नहीं होते. किसी पार्टी में न होने की वजह से और भारतीय टीम का हिस्सा होने के चलते गंभीर कुछ भी बोलने के पहले काफी सोचते थे. अब गौतम ने संन्यास ले लिया है, तो उनके गंभीर ट्वीट भी जरूर आएंगे, जिसमें वह खुलकर बोलेंगे. खुद स्वाति चतुर्वेदी ने भी ट्वीट कर के गौतम गंभीर से पूछा है कि वह भाजपा की लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ेंगे या राज्यसभा में आएंगे. चलिए एक नजर उनके कुछ ट्वीट पर डालते हैं, जो इशारा कर रहे हैं कि वह भाजपा में जा सकते हैं.

जिस तरह भाजपा नेशनल एंथम, कश्मीर और देशभक्ति की बातें करती है, कुछ वैसी ही बातें गौतम गंभीर भी करते दिखाई देते हैं. उनके ये कुछ ट्वीट देखकर आपको यकीन हो जाएगा.

कश्मीर को लेकर उनका सोचना भी भाजपा जैसा ही है. भले ही उनके ट्वीट में उन्होंने भाजपा पर भी सवाल उठाया हो, लेकिन आक्रामकता भाजपा के लिए प्रति नहीं दिखेगी.

कश्मीर मुद्दे पर तो उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफ्रीदी तक को नहीं बख्शा था.

दिल्ली से चुनाव लड़ेंगे गंभीर!

तो ये तो लगभग तय लग रहा है कि पश्चिमी दिल्ली के राजेंद्र नगर में रहने वाले गौतम गंभीर राजनीति में आ सकते हैं और भाजपा में शामिल हो सकते हैं. अब सवाल ये उठता है कि वो चुनाव कहां से लड़ सकते हैं? अगर दिल्ली की राजनीति के इतिहास पर नजर डाली जाए तो ये देखने को मिलता है कि दिल्ली को बदलाव पसंद है. बदलाव के लिए ही दिल्ली ने केजरीवाल को सत्ता थमा दी. भाजपा ने दिल्ली एमसीडी में सालों तक कोई खास काम नहीं किया, लेकिन जब भाजपा ने बदले हुए चेहरों पर नए वादों के साथ दोबारा चुनाव लड़ा तो दिल्ली ने उन्हें दोबारा सर आंखों पर बिठा लिया.

दिल्ली में बिजली, पानी, सड़कें... सारी मूलभूत सुविधाएं मौजूद हैं. यहां चुनाव लड़ने का सबसे बड़ा आधार है चेहरा. केजरीवाल का कार्यकाल भी आधे से अधिक बीत चुका है, लोग उनसे भी खुश नहीं दिख रहे हैं. यानी अगर कोई नया चेहरा सामने आता है, भले ही वह किसी भी पार्टी का हो, बशर्तें लोगों को पसंद हो, तो जीत ही जाएगा.

जल्द ही 2019 के लोकसभा चुनाव होने वाले हैं. दिल्ली में लोकसभा की सातों सीटों पर भाजपा का ही कब्जा है. अब अगर दोबारा भाजपा जीतना चाहती है तो वह बेशक इन सीटों पर नए चेहरों को कुछ नए वादों के साथ उतारेगी, जैसा दिल्ली की एमसीडी में किया था. ऐसे में अगर भाजपा के टिकट पर गौतम गंभीर 'पश्चिमी दिल्ली' लोकसभा सीट से चुनाव लड़ लें, तो उनके जीतने के चांस बहुत अधिक हैं. गंभीर को तो घर-घर जाकर हाथ जोड़कर वोट भी नहीं मांगने होंगे. जिस घर में जाकर वह ऑटोग्राफ दे दें और एक कप चाय भी पी लें, वहां तो घर के सारे लोग कमल के फूल वाला बटन ही दबाएंगे.

इसके अलावा, अगर गंभीर के अतीत पर नजर डालें तो ये देखने को मिलता है कि वह भाजपा नेताओं के लिए चुनाव प्रचार भी कर चुके हैं. 2014 में तो अरुण जेटली के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए वह अमृतसर तक चले गए थे. यूं तो दिल्ली की सियासत पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ कुछ भी साफ-साफ कहने से बचते हुए यही कह रहे हैं कि अभी ये कहना जल्दबादी होगी कि गंभीर राजनीति में आएंगे या नहीं, लेकिन राजनीति के विकल्प को वह दरकिनार भी नहीं कर रहे हैं.

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