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Updated: 21 जून, 2019 05:29 PM
श्रुति दीक्षित
श्रुति दीक्षित
  @shruti.dixit.31
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दुनिया के एक हिस्से पर अब युद्ध का खतरा मंडरा रहा है. ईरान और अमेरिका के बीच जिस तरह के हालात हैं बस एक चिंगारी दोनों देशों के बीच भीषण युद्ध की शुरुआत कर सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump पहले ही कई बार Iran को चेतावनी दे चुके हैं. हाल ही में ईरान की तरफ से अमेरिका का एक निगरानी करने वाला ड्रोन मार गिराया गया. ईरान का कहना था कि ड्रोन उसके Hormozgan प्रांत की सीमा में आ गया था और अमेरिका का कहना है कि ये ईरानी सीमा से काफी दूर था. इस मामले में ट्रंप ने ट्वीट कर ये भी कहा कि, 'ईरान ने बड़ी गलती कर दी है'. NewYork Times की खबर के मुताबिक अमेरिकी सेना पूरी तरह से तैयार थी हमला करने के लिए. हमले का समय भी निर्धारित हो गया था, प्लेन और समुद्री जहाज सभी तैयार थे, लेकिन ऐन मौके पर डोनाल्ड ट्रंप ने हमला रोक दिया. पूरी तैयारी के बाद ईरान पर हमला रोकने के कई कारण हो सकते हैं. इसमें अमेरिकी कूटनीति भी शामिल हो सकती है.

कुछ समय पहले Oman में तेल के टैंकरों पर हमला करने की बात को लेकर भी ईरान और अमेरिका के बीच ठन गई थी. ईरान पर अमेरिका ने इन टैंकरों पर हमला करने का आरोप लगाया था, लेकिन उसके बाद भी ट्रंप ने कुछ नहीं किया. अब जब ईरान की सीमा पर अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया गया है तब हमले की तैयारी के बाद भी हमला न होना कई सवाल खड़े कर रहा है.

जरा सोचिए अमेरिका जैसा देश ईरानी रडार मिसाइल बैटरी का टार्गेट सेट करने के बाद, हमले की पूरी तैयारी करने के बाद क्यों पीछे हट सकता है? वो भी तब जब इससे पहले मिडिल ईस्ट में दो बार राष्ट्रपति ट्रंप ने हमला करवाया है. दोनों बार सीरीया पर बम गिराए हैं. डोनाल्ड ट्रंप का इस तरह से अपना मन नहीं बदल सकते, लेकिन इसके पीछे कई अन्य कारण हो सकते हैं.

अमेरिकी सीनेटर ने आगाह किया ट्रंप को...

गुरुवार 20 जून को हमले से पहले प्रेसिडेंट ट्रंप को कई अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान मामले में संयम बरतने को कहा. Aljazeera की रिपोर्ट के मुताबिक कई कांग्रेस अधिकारियों और सीनेटरों ने ट्रंप को चेतावनी दी कि दोनों देशों की तरफ से एक भी गलती भारी पड़ सकती है. ट्रंप ने इस मीटिंग से पहले कहा था कि ईरान अपनी करनी का फल भुगतेगा और इस मीटिंग के बाद ट्रंप के तेवर बदल गए थे और उनका कहना था कि ईरान के किसी बेवकूफ जनरल की ये गलती हो सकती है.

इतने खतरनाक हैं हालात-

ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध के हालात बेहद खतरनाक स्थिति में हैं. अमेरिका ने मई में ही 1500 सैनिकों को ईरान के बाहरी इलाके में भेजे थे और 13 जून के हमले के बाद पेंटागन की तरफ से 1000 सैनिक वहां भेजने की बात स्वीकारी. इसके साथ ही, उस इलाके में अमेरिकी जंगी जहाज पहले से ही मौजूद हैं. यहीं ईरान की खतरनाक और भरोसेमंद Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) फोर्स और अन्य सेनाएं पहले से ही हाई अलर्ट पर हैं. यही कारण है कि इतनी मुश्तैदी से अमेरिकी ड्रोन को गिरा दिया गया. ईरान की तरफ से स्टेटमेंट भी आया है कि ड्रोन के पास कई बार रेडियो वॉर्निंग भेजी गईं, लेकिन जब ड्रोन ईरान की सीमा से बाहर नहीं गया तब उसे नष्ट किया गया.

ईरान ने जो ड्रोन गिराया वो 130 मिलियन डॉलर का था और ईरान और अमेरिका इस बात को लेकर बहस कर रहे हैं कि इसमें गलती किसकी थी.

ईरान और अमेरिका ड्रोन की जगह को लेकर बहस कर रहे हैं. सोर्स NewYork timesईरान और अमेरिका ड्रोन की जगह को लेकर बहस कर रहे हैं. (स्रोत: NewYork times)

ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी इस मामले में एक नहीं हो पा रहे हैं कि वाकई में ईरान पर सेना की कार्रवाई करनी चाहिए या नहीं.

न्यूक्लियर डील के कारण बढ़ी है ये सारी टेंशन-

अमेरिका और ईरान के बीच अहम टकराव का कारण है 2015 की न्यूक्लियर डील. बराक ओबामा प्रशासन के दौरान अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन, फ्रांस और जर्मनी के साथ मिलकर ईरान ने परमाणु समझौता किया था. उस डील में ये तय किया गया था कि तय पैमाने के अलावा ईरान अपने यहां यूरेनियम से जुड़ा कोई काम नहीं करेगा. ईरान के लिए न्यूक्लियर ऊर्जा पैदा करने लायक ही यूरेनियम इस्तेमाल करना होगा. इस पैक्ट से 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका का समर्थन हटा लिया. ट्रंप का आरोप था कि ईरान इस डील को तोड़ रहा है और चोरी-छुपे न्यूक्लियर हथियार बना रहा है. ट्रंप ने उस समय कहा था कि वो किसी भी हालत में तेहरान में न्यूक्लियर हथियार नहीं बनने देंगे. ट्रंप के इस काम का विरोध कई लोगों ने किया इसमें बराक ओबामा खुद शामिल थे. यूएन की एजेंसी ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ईरान के पास ऐसा कुछ भी नहीं है.

अब जब मामला इतना बिगड़ गया है तो कुछ समय पहले ईरान ने भी ये स्टेटमेंट जारी किया है कि वो खुद इस डील को तोड़ेगा और जितना तय है उससे ज्यादा यूरेनियम इस्तेमाल करेगा.

अब अलग-थलग पड़ गया है अमेरिका-

अमेरिका को कई तरह की चेतावनी दी जा चुकी है. डोनाल्ड ट्रंप की ये अकड़ मिडिल ईस्ट में चल रहे अमेरिका के युद्ध की याद दिलाती है. जॉर्ज बुश से लेकर ओबामा तक सभी अमेरिकी राष्ट्रपति तालिबान से लड़ने में नाकाम रहे. अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी जंग दशकों से चल रही है और अमेरिका को इसके चक्कर में काफी नुकसान भी हुआ है.

अमेरिका अगर ईरान पर हमला करता है तो उसका नतीजा घातक साबित हो सकता है. यकीनन ईरान को इससे नुकसान तो होगा, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इससे अमेरिका को कोई नुकसान नहीं होगा. अमेरिका इस समय अलग-थलग पड़ गया है और बराक ओबामा ने भी कहा है कि इससे वैश्विक स्तर पर अमेरिका की विश्वस्नीयता पर सवाल उठ सकते हैं. ऐसा होगा भी क्योंकि अमेरिका के साथ कोई और देश नहीं खड़ा है.

ईरान की स्थिति और मजबूत हो सकती है-

ईरान इस मामले में और भी ज्यादा मजबूत देश बनकर उभर सकता है. इसके कई कारण हैं और सबसे पहला ये कि ईरान ही एकलौता ऐसा देश है जो अमेरिका से खुलेआम टक्कर ले रहा है. दुनिया में जितने भी मुस्लिम देश हैं वहां या तो सरकार चलती है या फिर राजशाही. और सरकारों से लेकर दुनिया के राज घरानों तक सभी अमेरिका के इर्द-गिर्द घूमते हैं. ऐसे में ईरान ही एक ऐसा देश है जो शिया बहुल है और यहां न तो सरकार न ही राजशाही यहां धर्म आगे चलता है. दुनिया भर के मुस्लिम इस समय ईरान पर नजर बनाए हुए हैं और अमेरिका से टक्कर लेते समय ईरान और मजबूत हो सकता है. धर्म प्रधान देश होने का एक फायदा ये है कि यहां सरकार, राष्ट्रपति, आम जनता, मीडिया सभी एक जुट होकर अमेरिका के खिलाफ हैं. अन्य देशों में अगर कट्टर संगठन खिलाफत भी करते हैं तो भी राजपरिवार या सरकार अमेरिका के साथ हो लेती हैं. ऐसे में अमेरिका भले ही ईरान से युद्ध को लेकर मौके तलाश रहा हो, लेकिन ईरान न तो कोई मौका दे रहा है, न ही अपनी बात से अलग हो रहा है.

अमेरिका, ईरान, युद्ध, ड्रोनअमेरिका और ईरान अब ऐसी स्थिति पर हैं कि कोई भी देश अगर गलती करता है तो उसका खामियाजा दोनों देशों के करोड़ों लोगों को भुगतना पड़ सकता है.

अमेरिका के पास अब क्या विकल्प बचे हैं?

100 बात की एक बात अमेरिका अगर ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ देता है तो ये कोई अच्छा विकल्प नहीं होगा. पर फिर भी अमेरिका के पास कई सारे विकल्प हैं. ईरान की रेवोल्यूशनरी गार्ड फोर्स मिडिल ईस्ट के कई हिस्सों में हैं. इसमें सीरिया, यमन, ईराक, लेबनान आदि शामिल हैं और यहां ईरानी मिलिट्री की छावनी भी हैं. अमेरिका इन छावनियों पर हमला कर सकता है और आसानी से ऐसे हमले प्लान किए जा सकते हैं जिसमें जान का नुकसान न हो.

इसके अलावा, अमेरिका खुद बेहद सीरियस मामले में दखल दे सकता है और ईरान के बाहर मौजूद ईरानी छावनियों पर सीधा हमला कर सकता है जिससे ईरान और अमेरिका के बीच स्थिति और भी ज्यादा भयंकर हो जाएगी. इसके साथ ही ईरानी नेवी पर भी हमला हो सकता है. इसके अलावा, अमेरिका की तरफ से ईरानी साइबर ऑपरेशन पर हमला किया जा सकता है. ऐसे में ईरानी मिलिट्री के कम्प्यूटर नेटवर्क पर हमला किया जा सकता है.

ईरान के पास क्या विकल्प हैं-

अगर अमेरिका के पास विकल्प हैं तो ईरान के पास भी हैं. अगर अमेरिकी मिलिट्री का कोई हमला होता है तो ईरान भी मिडिल ईस्ट में तैनात अमेरिकी अफसरों और मिलिट्री के ठिकानों पर हमला कर सकता है. इतना ही नहीं सीधे अमेरिकी दूतावास और ठिकानों पर ईरान मिसाइल से हमला कर सकता है. ईरान में पहले भी अमेरिकी दूतावास पर हमला हो चुका है और ये इतिहास का सबसे भयानक होस्टेज हालात रहे हैं. इसी के साथ, अमेरिकी नेवी और अन्य सेना के हथियारों पर सीधे तौर पर हमला किया जा सकता है. ईरान किसी अन्य की मदद से भी ये हमले करवा सकता है.

कुल मिलाकर ये हालात बेकाबू हो सकते हैं और पूरी तरह से युद्ध शुरू होने में भी समय नहीं लग सकता. ईरान और अमेरिका दोनों ही देश इस समय तलवार की नोक पर खड़े हैं समझिए और किसी एक की भी चूक बेहद बुरे हालात पैदा कर सकती है. ट्रंप का अमेरिकी हमले को नाकाम करना इसी तरह की रणनीति दिखा रहा है. अमेरिका और ईरान दोनों ही एक दूसरे का इंतजार कर रहे हैं.

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Iran, Tehran, Shiya

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श्रुति दीक्षित श्रुति दीक्षित @shruti.dixit.31

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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