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Updated: 18 अक्टूबर, 2021 05:53 PM
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कांग्रेस वर्किंग कमिटी की मीटिंग में जो होना था वही हुआ. इस मीटिंग में क्या होना था देश के हर नागरिक को पता था. ठीक वैसे ही जैसे देश के हर नागरिक को पता है कि होली कैसे मनाई जाती है और दिवाली में क्या क्या होता है. फिर यह मीटिंग क्यों हो रही थी यह किसी को पता नहीं. कहा गया कि जी-23 के नाम से कांग्रेस का एक खेमा असंतुष्ट था जिसने कहा था कि कांग्रेस को पूर्णकालिक अध्यक्ष की ज़रूरत है और इसके लिए कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलायी जानी चाहिए. कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में राजनीतिक प्रस्ताव पास किए गए जो गांधी- नेहरू के जमाने से इस बैठक की रस्म अदायगी की तरह होते हैं. मगर यह भी कांग्रेस वर्किंग कमेटी की रस्म अदायगी बन गई है जो कि निभा दी गई कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मांग करेंगे कि राहुल गांधी फिर से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. पहले से तय स्क्रिप्ट के अनुसार एक बुजुर्ग कांग्रेस नेता एके एंटोनी ने राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनने का आग्रह किया और परेशान दूसरे बुजुर्ग नेता अशोक गहलोत ने लपक लिया कि राहुल गांधी ही बीजेपी को टक्कर दे सकते हैं. जी-23 वाले भी बोले कि वही तो हम कह रहे हैं कि राहुल गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालना चाहिए. राहुल गांधी ने कहा कि सोचेंगे और सब ख़ुशी-ख़ुशी रवाना हो गए. कांग्रेस के ऊपर बोझ बन गए कांग्रेसी नेता मन की मुराद पूरी करवाकर लौट गए हैं. मगर कांग्रेस को इससे क्या हासिल हुआ है?

Congress, Rahul Gandhi, Priyanka Gandhi, Sonia Gandhi, Meeting, National Presidentजैसी प्रियंका गांधी की कार्यप्रणाली है कांग्रेस नेताओं की आंख की किरकिरी प्रियंका का काम करने का तरीका है

लोग सोच रहे हैं कि आख़िर कांग्रेस ने इस वर्किंग कमेटी की बैठक बलाई क्यों थी? कांग्रेस का कहना है कि इतना बड़ा फ़ैसला लिया है कि अक्टूबर 2022 तक पार्टी का संगठनात्मक चुनाव करा लिया जाएगा और गोदी मीडिया को दिख हीं नहीं रहा है. पहला सवाल है कि राहुल गांधी पद नहीं छोड़ते तो उनका कार्यकाल तो दिसंबर 2022 तक था ही तो फिर दो महीने पहले नया अध्यक्ष चुनने की घोषणा कर कौन सा तीर मार लिया है? दूसरा कि जब यह तय ही हो गया कि राहुल गांधी को ही कांग्रेस का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना है तो एक साल का इंतज़ार क्यों?

इस सवाल का जवाब है कि कांग्रेस उत्तराखंड, पंजाब, गोवा में सफलता की उम्मीद लगाए बैठी जिसके बाद जीत के जश्न के साथ विजय का सेहरा राहुल गांधी के सिर पर बांध कर उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाएगा. और उत्तर प्रदेश की असफलता का सेहरा? वह कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी के सिर बांधा जाएगा. वहीं प्रियंका गांधी जो कांग्रेस की एकमात्र नेता हैं जो ज़मीन पर जी जान से मेहनत कर रही है.

यूपी में कांग्रेस के रेगिस्तान में फूल खिलाने की प्रियंका की कोशिशों का पूरा देश मुरीद हुआ पड़ा है. मगर कांग्रेस के बुजुर्गों को प्रियंका से क्यों डर लगता है? प्रियंका गांधी के कांग्रेस में जान फूंकने की रणनीति में बाहर हो जाने के डर से सभी बुझे हुए कारतूस एक हो गए है. प्रियंका कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष न बन जाए इसलिए जी-23 नाम का ग्रुप भी ना रहा. अशोक गहलोत अंबिका सोनी से मिलते हैं, पिछली बार की मीटिंग में भीड़ने वाले नेता आनंद शर्मा से भी मिलते हैं और फिर क्या हुआ सब जानते हैं.

प्रियंका इनकी नस-नस से वाक़िफ़ हैं और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का हश्र देखकर तो जनता से दूर हो चुके बुजुर्ग कांग्रेसी और डरे हुए हैं. यानी यूपी चुनाव की हार के बाद प्रियंका के नेतृत्व पर पिछले दरवाज़े से मीडिया में अंगुली उठवाने में माहिर हो चुके घुटे हुए कांग्रेसी यह काम कर लेंगें और फिर मौज करते रहेंगे.

आपको याद है न कि लोकसभा चुनाव के बाद प्रियंका गांधी ने इन्हीं कांग्रेसी नेताओं को कांग्रेस का हत्यारा कहा था. आपको याद हो न हो कांग्रेस के बूढ़े  कंधों पर ढोए जा रहे 70 पार इन नेताओं को प्रियंका का यह तेवर हमेशा याद रहता है. प्रियंका गांधी से बुजुर्ग नेता किस क़दर ख़ौफ़ खाते हैं इसका उदाहरण यह है कि तीन सालों से आंदोलन कर रहे कंप्यूटर टीचर भर्ती वाले बेरोज़गार लखनऊ जा कर प्रियंका गांधी से मिलते हैं और रातो रात मुख्यमंत्री अशोक ग़हलोत उनको सरकारी नौकरी देने का ऐलान कर देते हैं.

जबकि राहुल गांधी न जाने कितने वादे कर राजस्थान में गए किसानों के लोन माफ़ी से लेकर खेत के पास कृषि उधोग लगाने का, पर कोई नेता राहुल के वादों का ध्यान नहीं देता. सबको पता है कि कांग्रेस को कई सालों से दीमक की तरह अंदर से खोखला करने वाले कांग्रेस के बुजुर्ग नेता बीजेपी से मुकाबले के बजाए एक-एक कर सभी नौजवान उर्जावान कांग्रेसी नेताओं को ठिकाने में लगे रहते हैं.

ये जो नेता कांग्रेस के वर्किंग कमेटी में बैठे थे वो अपने -अपने इलाक़े में जनता से जाकर पूछ लें कि कांग्रेस के आम कार्यकर्ता या जनता किसे कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष देखना चाहती है तो आसान सा फ़ीडबैक उपलब्ध है. मगर फिर इनका क्या होगा. चौक चौराहों पर आम जनता यह चर्चा करती है कि क्या इटली में भी मां बेटी के बजाए बेटों को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहती है.

देश के गांव-नगर के चौराहों का फ़ीडबैक अगर किसी पार्टी को नहीं मिल रहा है तो उस पार्टी को कोई बचा नहीं सकता है. कांग्रेस उत्तर प्रदेश के नेता सलमान ख़ुर्शीद ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक से पहले एक इंटरव्यू में कहा कि जनता किसे कांग्रेस का अध्यक्ष देखना चाहती है यह हाल फ़िलहाल की रैलियों को देख कर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं. उनका इशारा किसकी तरफ़ था समझा जा सकता है मगर सच कहने की हिम्मत उनमें नहीं है.

ब्रांड प्रियंका को कांग्रेस किस दिन रात के लिए बचाकर रखना चाहती है यह किसी को समझ में नहीं आ रहा है. दुनिया की यह पहली घटना होगी जहां पर ज़बरन किसी नेता को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा रहा है जब वह बनना नहीं चाहता है. राहुल गांधी एक बेहतरीन इंसान हैं और जनता के मुद्दों पर BJP से ज़बर्दस्त ढंग से भिड़ते भी है मगर इतनी भर से राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की क़ाबिलीयत नहीं हो जाती है.

मैं राहुल गांधी की रैलियों में पत्रकार की हैसियत से हिस्सा लेता हूं और जब यह देखता हूं कि जैसे ही राहुल गांधी का भाषण शुरू होता है और जनता उठकर जाने लगती है तो बुरा लगता है. क्योंकि राहुल जनता की बात कर रहे होते हैं मगर इस देश को ऐसा कांग्रेस नेता चाहिए जो जनता को वैसे ही संबोधित करें जैसे वाराणसी में प्रियंका गांधी ने किया था.

बड़ा सवाल है कि जब से राहुल गांधी राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ा है तब से इस बीच उनसे उन्होंने ऐसा कौन सा महान काम कर दिया उन्हें वापस राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की मांग तूल पकड़ने लगी है. पश्चिम बंगाल के चुनाव से लेकर तमिलनाडु और केरल के चुनावों में असफलता हाथ लगी है, यहां तक कि पुडुचेरी भी हाथ से जाता रहा.

मगर फिर भी वह कांग्रेस के बुजुर्ग नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर राहुल गांधी को देखना चाहते हैं तो समझा जा सकता है कि वह क्यों देखना चाहते हैं. राहुल गांधी के कांग्रेस पार्टी के रोज़ाना के रूटीन से उन्मुख होकर जीते हैं और यहीं पर कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं की मनमानी का मौक़ा मिलता है. पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री पद का चुनामृत में मिला है.

भूपेश बघेल की कुर्सी दांव पर लगी है और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत संकट में है, ऐसे में इन सभी को भी संकट मोचक रूप में राहुल गांधी के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में मांग हीं मोक्ष का रास्ता दिखाई देता है. राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की मांग करने वाले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जब यह कहते हैं कि जब मैं कांग्रेस का संगठन महासचिव था तो राहुल गांधी का हाथ पकड़ कर उन्हें जहां चाहता था ले जाता था.

ढाबे पर चाय भी पी है और खाना भी खाया है मगर अब वह मैसेज का भी जवाब नहीं देते हैं तो समझा जा सकता है कि राहुल गांधी किस तरह से राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में पार्टी को चलाने वाले हैं और यहीं से अशोक गहलोत जैसे नेताओं की मौज शुरू हो जाती है. जब वह अपनी मनमानी राजस्थान में कर रहे थे और उससे परेशान होकर सचिन पायलट ने वह क़दम उठा लेते है जो उनके जीवन भर उसके करियर पर एक दाग हो जाता है.

फिर यही तो अशोक गहलोत जैसे बुजुर्ग नेता चाहते हैं कि पांव का कांटा निकल जाए भले ही वह कांटा कांग्रेस के दिल में चुभ जाए. राहुल गांधी अगर उस दौरान सचिन पायलट के मैसेज का जवाब देते होते तो शायद सचिन पायलट इस तरह से बागी नहीं होते और फिर राजस्थान में यह हालत नहीं होती कि पार्टी की वापसी की कोई गारंटी नहीं है.

प्रियंका गांधी ने हाल की अपनी राजनीति से यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस ने पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की क़ाबिलीयत उन्हीं में है. वह फ़ैसले लेना जानती है. राहुल गांधी जब राष्ट्रीय अध्यक्ष थे तब भी वह पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं थे और जब सोनिया गांधी कांग्रेस कार्य समिति के नेताओं से यह इजाज़त मांगती है यह कहने के लिए कि मैं पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं तो यह भी सच नहीं है.

क्या कांग्रेस बता सकती है कि कितने कांग्रेसी नेताओं से पिछले एकसाल में कांग्रेस की अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्षा सोनिया गांधी ने मुलाक़ात की है. कौन भूल सकता है कि ग़ुलाम नबी आज़ाद का वह पत्र जिसमें वह लिखते हैं कि मैंने कई बार पत्र भी लिखा कोई जवाब नहीं मिला. फ़ोन पर भी सोनिया जी से बात करने की कोशिश की मगर कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा फ़ोन पर भी नहीं आती है फिर ऐसे में अगर सोनिया गांधी कहती है कि आप मीडिया के ज़रिए बात मत कीजिए, मैं पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं तो फिर सवाल तो उठना ही है.

इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि सोनिया गांधी ने कांग्रेस के कठिन दौर में कांग्रेस का सफल नेतृत्व किया है. मगर इस बात से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है कि हर नेता का अपना दौर होता है और हमेशा कमज़ोर और डरे हुए लोग अपने अतीत को पकड़कर उसके साथ चिपके रहना चाहते हैं.

कुल मिलाकर कांग्रेस में प्रियंका गांधी अपनी राजनीति की शबाब पर है मगर कांग्रेस के नेता उन्हें कमान देने के लिए उनकी ढलान का इंतज़ार कर रहे हैं. एकसाल तक कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव का ऐलान कांग्रेस करती है तो बेहतर होता एक चुनाव का ऐलान और कर दिया जाता कि कांग्रेस के कार्यकर्ता बताएंगे कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वह किस नेता को देखना चाहते हैं.

कांग्रेस की धुंधली तस्वीर में प्रियंका नाम की एक उम्मीद दिखाई देती है मगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नज़रें चुरा रहे हैं कि कहीं वह दूसरी इंदिरा गांधी न बन जाए जिसने कांग्रेस के ऊपर बोझ बने कांग्रेस के बुजुर्गों को बाहर का रास्ता दिखाकर देश में नई कांग्रेस खड़ी की थी. दीवार पर लिखी हुई इबारत कांग्रेस नहीं पढ़ पा रही है तो फिर इसे कौन बचाएगा.

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