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Updated: 14 अप्रिल, 2019 08:03 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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चुनावी मौसम में जिसे सबसे अधिक भला-बुरा सुनना पड़ता है, वो होती है ईवीएम. 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान हो चुका है, जिसमें देश भर में जगह-जगह से ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतें आईं. इन शिकायतों में एक बात कॉमन थी कि सारी शिकायतें विपक्षी पार्टियों ने कीं. और यदि चुनाव में उन्‍हेें जीत हासिल हुई तो उन्‍होंने ईवीएम पर कोई सवाल नहीं उठाया. नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर करने के लिए सारी विपक्षी पार्टियों ने मिलकर महागठबंधन तक बनाने का प्लान बना लिया. ईवीएम कल भी दोषी थी और आज भी दोषी है. ये तब तक दोषी ही रहेगी, जब तक मोदी सरकार सत्ता से बाहर ना हो जाए. यूं लग रहा है अगर भाजपा हारी सिर्फ तभी ईवीएम को सही माना जाएगा.

हर चुनाव में विपक्षी पार्टियों का एक ही राग होता है कि ईवीएम से छेड़छाड़ की गई है. चुनाव भले ही विधानसभा का हो या लोकसभा का, हार की जिम्मेदार होती है ईवीएम. ईवीएम को तब याद नहीं किया जाता, जब विपक्ष जीतता है. राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भाजपा हार गई, क्योंकि ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं हुई होगी. अगर कांग्रेस हार जाती, तो उस विधानसभा चुनाव में भी ईवीएम राग जरूर अलापा जाता. लोकसभा चुनाव के दौरान अभी से ईवीएम का जिन्न निकल आने से यूं लग रहा है कि हारने से पहले ही विपक्षी पार्टियों ने हार का ठीकरा फोड़ने के लिए शिकार तैयार कर लिया है.

ईवीएम, चंद्रबाबू नायडू, लोकसभा चुनाव 2019, विपक्षचंद्रबाबू नायडू समेत विपक्ष के कई नेताओं ने ईवीएम की गड़बड़ी की शिकायत सुप्रीम कोर्ट ले जाने का फैसला किया है.

बटन कोई भी दबे, वोट भाजपा को !

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने ईवीएम के साथ छेड़छाड़ के अलावा उसके साथ लगाए गए वीवीपैट के रिएक्शन टाइम और उससे निकलने वाली पर्ची को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं. आरोप है कि गलत नाम की पर्ची निकल रही है. वोट किसी और को दे रहे हैं, जा रहा है भाजपा को. मांग की गई है कि कम से कम 50 फीसदी मतदान पर्चियों का मिलान ईवीएम से होना चाहिए. ये भी मांग की जा रही है कि वीवीपैट में निकलने वाली पर्ची 3 सेकेंड तक दिखती है, जो काफी कम है, उसे बढ़ाकर 7 सेकेंड किया जाना चाहिए. ये सारे आरोप बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के लगाए गए हैं, जिसमें कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बल, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू समेत कई नेता उपस्थित थे. अपनी शिकायत लेकर विपक्षी नेताओं के बीच सुप्रीम कोर्ट जाने को लेकर सहमति बन गई है.

ईवीएम को लेकर ये किस हद तक पहुंच गया विपक्ष !

पहले चरण का मतदान होने के बाद शनिवार को चंद्रबाबू नायडू ईवीएम में गड़बड़ी की एक शिकायत लेकर चुनाव आयोग पहुंचे. ये दावा उन्होंने हैदराबाद के रहने वाले एक कथित एक्सपर्ट हरि प्रसाद के हवाले से किया था. जब इस एक्सपर्ट के बारे में जांच की तो पता चला कि 2010 में यही शख्स ईवीएम की चोरी के मामले में गिरफ्तार हुआ था. आपको बता दें कि चुनाव आयोग से अधिकारियों से मिलने वाले चंद्रबाबू नायडू के प्रतिनिधिमंडल में ये एक्सपर्ट कहा जाने वाला हरि प्रसाद भी था.

चुनाव आयोग ने ये सब पता चलने के बाद नायडू की पार्टी टीडीपी के लीगल सेल को एक पत्र लिखकर सख्त लहजे में पूछा भी है कि आखिर एक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले शख्स को नायडू के प्रतिनिधि मंडल में जगह कैसे मिली? अब सोचिए जरा, जिस शख्स ने ईवीएम चोरी की, उसे ही नायडू एक्सपर्ट समझ बैठे. आखिर मोदी सरकार और ईवीएम का विरोध करने के लिए विपक्ष किस हद तक पहुंच गया है. विपक्ष तो ये भी मांग कर रहा है कि चुनाव बैलेट पेपर से होने चाहिए, जो सभी जानते हैं कि नामुमकिन है.

विपक्ष किसी की बात क्यों नहीं मानता?

ईवीएम पर किसी चोर एक्सपर्ट की सलाह लेने से अच्छा है कि किसी असल एक्सपर्ट से पूछ लें. पेशे से पत्रकार और चुनावी विश्लेषक प्रणय रॉय से भी हाल ही में ईवीएम से छेड़छाड़ को लेकर सवाल पूछा गया. उन्होंने कहा कि 1997 में ही उन्होंने ईवीएम को अच्छे से चेक किया था. ये साफ हो चुका है कि ईवीएम से छेड़छाड़ संभव नहीं है, जिसकी वजह ये है कि ईवीएम में ना तो इंटरनेट है, ना ब्लूटूथ ना ही वाईफाई जैसा कुछ. ये पूरी तरह से अलग मशीन होती है, जो कैल्कुलेटर जैसी है. प्रणय रॉय ने भी ये बात मानी कि जो हारता है, वही ईवीएम को गलत कहता है, जीतने वाला कभी गलत नहीं कहता. साथ ही उन्होंने ये साफ किया कि अब तक ईवीएम से छेड़छाड़ को कोई भी साबित नहीं कर सका है. कोशिश बहुत से लोगों ने की, लेकिन कुछ नहीं हुआ. उन्होंने तो ये भी साफ किया कि अब वीवीपैट आने के बाद तो सारे संदेह ही खत्म हो गए हैं. आपको बता दें कि प्रणय रॉय ने चुनावी विश्लेषण के आधार पर अपने अनुभव को बयां करते हुए एक किताब भी लिखी है, जिसका नाम है- 'The Verdict: Decoding India’s Elections'.

हर चुनाव में ये आरोप तो लगता ही है कि ईवीएम में गड़बड़ी है, लेकिन किस हद तक. इस बार तो विपक्ष एक्सपर्ट के नाम पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले शख्स को चुनाव आयोग तक ले गया. ये तो तय है कि अगर लोकसभा चुनाव में भाजपा जीत जाती है तो विपक्ष ईवीएम का मुद्दा लेकर तूफान मचा देगा, लेकिन अगर जीत गए तो क्या? क्या जीतने के बाद सत्ता में आकर ईवीएम को हटाने का कानून पारित किया जाएगा? क्या आगे से बैलेट पेपर पर ही चुनाव होंगे? बिल्कुल नहीं, अभी तो सिर्फ विरोध करने के बहाने चाहिए और ईवीएम से अच्छा बहाना और क्या हो सकता है. वो अलग बात है कि आज तक कोई भी ये साबित नहीं कर सका कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ संभव है. खुद चुनावी विश्लेशक प्रणय राय भी मानते हैं कि ऐसा नहीं किया जा सकता, लेकिन राजनीति में तमाम मुद्दों के बीच ईवीएम में एक मुद्दा रहता है और रहेगा, जिस पर हारने वाली पार्टी हार का ठीकरा फोड़ेगी.

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