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Updated: 04 अक्टूबर, 2019 07:25 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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चुनावी मैदान में उतरने से पहले की कोई भी एक्टिविटी प्रत्यक्ष राजनीति के दायरे से बाहर होती है. आदित्य ठाकरे ने मातोश्री की लक्ष्मण रेखा पार कर साफ कर दिया है कि अब किसी को उन्हें हल्के में लेने की जरूरत नहीं है. वर्ली विधानसभा सीट से नामांकन के बाद आदित्य ठाकरे जनता के बीच पहुंच कर राजनीति में औपचारिक पारी शुरू कर दी है. आदित्य ठाकरे मातोश्री से चुनाव मैदान की ओर कदम बढ़ाने वाले ठाकरे परिवार के पहले सदस्य ही नहीं हैं - वो खुद भी चार कदम आगे की राजनीतिक सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं. अब तक की आदित्य ठाकरे की बातों से जो राजनीतिक सोच समझ में आती है वो बाल ठाकरे और राज ठाकरे की राजनीति से बहुत आगे का अपडेटेड-वर्जन है. आदित्य ठाकरे ने जमाने के साथ चलने का फैसला किया है. वो पहले ही जान चुके हैं कि शिवसेना की सियासी स्टाइल पुरानी पड़ चुकी है.

अगर बीजेपी महाराष्ट्र में फिलहाल अकेले दम पर सरकार बनाने का आत्मविश्वास रखती है तो बिलकुल भी गलत नहीं है, लेकिन अगर वो आदित्य ठाकरे को बहुत हल्के में ले रही है तो ये भारी भूल हो सकती है - आदित्य ठाकरे के सियासी पंख निकल आये हैं. वो उड़ान भरने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं.

क्या आदित्य ठाकरे मुख्यमंत्री बनेंगे?

हड़बड़ी हमेशा ही अच्छी नहीं होती. आदित्य ठाकरे को लेकर संजय राउत उस वक्त कुछ ज्यादा ही बोल गये - चंद्रयान 2 तो चंद्रमा पर नहीं उतर सका, लेकिन शिवसेना सुनिश्चित करेगी कि आदित्य मंत्रालय के छठे फ्लोर पर 21 अक्टूबर को जरूर पहुंच जायें. सामना के संपादक संजय राउत ये तुलना चंद्रमा और सूरज के हिसाब से कर रहे थे - क्योंकि आदित्य सूर्य का ही एक नाम है.

संजय राउत के इस दावे में एक बड़ी गड़बड़ी और भी है. 21 अक्टूबर को सिर्फ वोट डाले जाएंगे और नतीजे 24 अक्टूबर को मालूम हो सकेंगे. हो सकता है शिवसेना मतदाताओं को बूथ कर पहुंचा भी दे, लेकिन उसी दिन विधानसभा तो नहीं ही पहुंचा जा सकता है. अगर ये बात नतीजे के दिन को लेकर कहे होते तो एक बार भावनाओं को समझा जा सकता था.

aditya thackeray selfieये महज सेल्फी नहीं, आदित्य ठाकरे की पॉलिटिकल लाइन है!

दरअसल, संजय राउत के इतने जोशीले बयान देने की एक बड़ी वजह भी रही. उद्धव ठाकरे ने उससे पहले कहा था कि अपने पिता बालासाहेब ठाकरे से जो वादा किया है उसे वो पूरा करके रहेंगे. उद्धव ठाकरे ने बताया था कि वो एक शिवसैनिक को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाने का वादा किये थे. बाल ठाकरे तो दो-दो शिवसैनिकों को महाराष्ट्र के सीएम की कुर्सी पर बिठा चुके थे - जाते जाते उद्धव को सौंपी गयी आगे की तमाम जिम्मेदारियों में इसे भी जोड़ दिया था.

संजय राउत का दावा अपनी जगह है और हकीकत अपनी जगह. महाराष्ट्र की 288 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी खुद 164 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और शिवसेना को 124 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने का मौका दिया है. हालांकि, बीजेपी को अपने पास की 164 सीटों में ही RPI, RSP, शिव संग्राम और रयत क्रांति को भी समायोजित करना है. बीजेपी ने इस बात पर भी हामी भरी है कि वो डिप्टी सीएम की कुर्सी शिवसेना को दे सकती है. हालांकि, कुछ बीजेपी नेता इसे भी चुनावी जुमले की तरह ही समझ और समझा रहे हैं.

लेकिन आदित्य ठाकरे पूरी तरह सजग रहते हैं. हाल ही में आदित्य ठाकरे से एक पत्रकार का सवाल रहा - 'क्या मैं अगले मुख्यमंत्री से बात कर रहा हूं?' आदित्य ठाकरे ने कोई हड़बड़ी नहीं दिखायी और मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'आप ऐसे व्यक्ति से बात कर रहे हैं जो हमेशा राज्य की सेवा करेगा.' साथ ही आदित्य ठाकरे ने जोर देकर कहा कि वो राजनीति में एक बड़े मकसद के साथ उतरे हैं. वो नया महाराष्ट्र बनाना चाहते हैं. ये आदित्य ठाकरे के नामांकन के वक्त का वाकया है जब उनके साथ उनके पिता उद्धव ठाकरे, मां रश्मि ठाकरे और भाई तेजस भी मौजूद थे.

आदित्य ठाकरे को बच्चा न समझे BJP

आदित्य ठाकरे ये तो अच्छी तरह समझ चुके हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति में राज ठाकरे क्यों फेल हुए? आदित्य ठाकरे को ये भी मालूम है कि शिवसेना को अपने ही गढ़ मुंबई और महाराष्ट्र में नंबर दो पर बने रहने के लिए भी क्यों संघर्ष करना पड़ रहा है?

ये सब समझने का मतलब आदित्य ठाकरे ये भी समझ ही चुके होंगे कि महाराष्ट्र में बीजेपी ने पैर कैसे जमा लिये - और वो भी बड़ी मजबूती से?

कहा तो ये भी जा सकता है कि ये सब चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के ठोस एक्शन प्लान का हिस्सा हो सकता है - लेकिन प्रशांत किशोर भी तो सफल तभी होते हैं जब उनकी टीम को काम करने का पूरा मौका और खुली छूट मिलती है. आखिर प्रशांत किशोर क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चुनावी मुहिम में कामयाब हो जाते हैं और राहुल गांधी के केस में नाकामी का धब्बा लग जाता है? प्रशांत किशोर को कामयाबी तो कांग्रेस में भी मिलती है, लेकिन जब वो कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए काम करते हैं.

ऐसा भी नहीं कि आदित्य ठाकरे नयी सोच के साथ राजनीति शुरू करने वाले पहले नेता बनने जा रहे हैं. आदित्य ठाकरे से बहुत पहले से राहुल गांधी इसी बात के लिए जूझते रहे हैं और अब तो एक तरीके से हथियार ही डाल चुके हैं. बिहार में तेजस्वी यादव ने भी RJD की छवि बदलने की बहुत कोशिश की, लेकिन तभी तक जब लालू प्रसाद मैदान में डटे हुए थे. लालू प्रसाद के जेल चले जाने के बाद सारा खेल खत्म नजर आने लगा है. राहुल गांधी की ही तरह तेजस्वी यादव को भी बिहार में पूरी तरह फेल समझा जाने लगा है, खासकर आम चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने के बाद.

राहुल गांधी, तेजस्वी यादव वाली कतार में यूपी के अखिलेश यादव, तमिलनाडु के एमके स्टालिन और आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी भी खड़े समझे जा सकते हैं, जिन्हें पारिवारिक राजनीति विरासत में मिली हुई है. अखिलेश यादव ने तो बीएसपी के साथ गठबंधन कर कुछ नया प्रयोग करने की कोशिश की थी, लेकिन बाकियों की तरह मायावती से वो भी धोखा खा गये.

एमके स्टालिन और जगनमोहन रेड्डी का प्रदर्शन बेहतरीन रहा बाकियों के मुकाबले बेहतर रहा. स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके ने आम चुनाव में 39 में से 21 सीटें जीतीं - और जगनमोहन रेड्डी तो एन. चंद्रबाबू नायडू को बुरी तरह हराते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी ही छीन ली.

आदित्य ठाकरे नये महाराष्ट्र की बात कर रहे हैं. निश्चित रूप से ये महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थापना से आगे की बात है. राज ठाकरे ने पार्टी का नाम तो दिया - लेकिन पुराने मॉडल पर ही चलते रहे और अब तक नाकाम रहने की भी यही वजह है उनके अब तक नाकाम रहने की भी. आदित्य ठाकरे वक्त की नजाकत को समझते हैं. आदित्य ठाकरे जानते हैं कि भविष्य किस तरीके की राजनीति का है.

'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास' जीतने में जुटी बीजेपी का ध्यान इस बात पर भी जरूर जाता होगा कि वर्ली में लगे आदित्य ठाकरे के पोस्टर मराठी से इतर कई और भी भाषाओं में क्यों लगे हैं? आदित्य ठाकरे को न हिंदी से परहेज है न गुजराती और न ही उर्दू या अंग्रेजी से. बीजेपी अभी भले ही शिवसेना को आस पास टिकने न दे, लेकिन आदित्य ठाकरे दूरगामी सोच के तहत राजनीति के मैदान में उतरे हैं.

उद्धव ठाकरे अब तक जो भी राजनीति करते आ रहे हैं उसकी नींव 1990 में रखी गयी थी - और कहते हैं 1999 में वो मुख्यमंत्री भी बनना चाहते थे, लेकिन शिवसेना-बीजेपी गठबंधन सत्ता हासिल करने से चूक गया. राज ठाकरे के बारे में भी कहा जाता है कि वो भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे लेकिन अचानक मन बदल लिया.

खानदानी 'ठाकरे पॉलिटिक्स' में वैलेंटाइन डे का विरोध किया जाता रहा है - लेकिन आदित्य ठाकरे ऐसा नहीं करते. यही दोनों की राजनीतिक शैली में सबसे बड़ा और बुनियादी फर्क है. दरअसल, बाल ठाकरे कार्टून बनाते थे, आदित्य ठाकरे कविता लिखते हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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