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Updated: 21 सितम्बर, 2019 07:00 PM
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महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनावी तैयारियां तो पहले से ही शुरू हो गयी थीं, अब तारीख भी आ गयी है. दोनों राज्यों में एक एक ही चरण में एक ही दिन चुनाव होंगे. मुख्य निर्वाचन अधिकारी सुनील अरोड़ा के अनुसार, 21 अक्टूबर को वोटिंग होगी और 24 अक्टूबर को वोटों की गिनती यानी नतीजे भी आ जाएंगे.

दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव के साथ ही देश भर की 64 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी 21 अक्टूबर को ही चुनाव होने हैं और वोटों की गिनती भी 24 अक्टूबर को ही होनी है. साथ ही, बिहार की एकमात्र लोकसभा सीट समस्तीपुर में भी मतदान की वही तारीख होगी. समस्तीपुर के सांसद और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान के निधन के बाद वहां उपचुनाव होने जा रहा है.

चुनाव तारीखों की घोषणा के साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां भी दी है - मसलन, अगर कोई उम्मीदवार अपने आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी नहीं देता है तो उसका पर्चा रद्द कर दिया जाएगा.

विधानसभा चुनाव तारीखों के ऐलान के ऐन पहले इंडिया टुडे कॉनक्लेव में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और युवा सेना के प्रमुख आदित्य ठाकरे पहुंचे थे. दोनों ही नेताओं ने बातचीत में जो कुछ भी कहा, जिन सवालों के जवाब दिये या जिनके पूरी तरह टाल गये - महाराष्ट्र की पूरी मौजूदा राजनीतिक तस्वीर ही खींच डाली है.

जब दोस्ती में पत्थर फूल बन जाते हैं

इंडिया टुडे कॉनक्लेव के दो अलग अलग सेशन में बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे से तमाम सवाल पूछे गये - दोनों ही नेताओं में एक कॉमन बात देखने को ये मिली कि गठबंधन को लेकर बड़े ही सचेत रहे. दोनों ही नेता ऐसे सवालों के जवाब बार बार पूछने पर टाल गये जिससे गठबंधन में किसी तरह का विवाद पैदा हो. वैसे सीटों के बंटवारे को लेकर देवेंद्र फडणवीस ने जो कहा वो तो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के दावे को झुठला ही रहा है.

उद्धव ठाकरे का कहना है कि लोक सभा चुनाव से पहले ही सीटों के बंटवारे का फॉर्मूला तय हो गया था, लेकिन देवेंद्र फडणवीस के अनुसार अभी ये फाइनल नहीं है. उद्धव ठाकरे के मुताबिक विधानसभा चुनाव में भी लोक सभा की तरह ही लगभग आधा आधा बंटवारा होना है और ये बात पहले से तय है. लोक सभा चुनाव में बीजेपी महाराष्ट्र की 48 सीटों में से 25 पर और शिवसेना 23 सीटों पर चुनाव लड़ी थी.

devendra fadnavis and aditya thackerayमहाराष्ट्र में कैसे शिवसेना के पत्थर कैसे फूल बन गये?

देवेंद्र फडणवीस ने उन खबरों को खारिज कर दिया जिनमें महाराष्ट्र की 288 सीटों में 162 पर बीजेपी और 126 सीटों पर शिवसेना के चुनाव लड़ने की बात चल रही है. महाराष्ट्र से जुड़े बीजेपी नेता मीडिया से बातचीत में कह रहे हैं कि लोक सभा चुनाव में बीजेपी को शिवसेना की जरूरत थी, लेकिन अभी शिवसेना को ही बीजेपी की जरूरत है. कहने का मतलब है अगर बीजेपी चाहे तो अपने बूते भी महाराष्ट्र चुनाव जीत कर सरकार बना सकती है. ऐसे में बीजेपी इस बार शिवसेना को एक निश्चित सीमा को लांघने नहीं देने के मूड में है. वैसे भी आदित्य ठाकरे के सीएम बनने के अरमानों पर गठबंधन के लिए पानी फेर कर उद्धव ठाकरे ने भी जता ही दिया है कि किसे किसकी और कितनी जरूरत है. बीजेपी के प्रभाव की तो पहली झलक उसी दिन मिल गयी थी जब मोदी कैबिनेट 2.0 में एनडीए के सहयोगी दलों को अधिकतम एक सीट का ऑफर मिला - जिसमें नीतीश कुमार ने तो इंकार कर दिया, लेकिन उद्धव ठाकरे ने चुपचाप स्वीकार कर लिया.

गठबंधन सरकार में शिवसेना का शामिल होकर भी विपक्ष की भूमिका निभाने को लेकर जब सीनियर पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने देवेंद्र फडणवीस का रिएक्शन जानना चाहा तो जवाब मिला - 'जब अपने दोस्त पत्थर फेंके तो उसे फूल समझ कर झेल लेना चाहिए.'

देवेंद्र फडणवीस की ही तरह साहिल जोशी के साथ बातचीत में आदित्य ठाकरे भी खुद के मुख्यमंत्री पद के दावेदार से पीछे हट जाने के सवाल का नपातुला जवाब दिया - 'हर पार्टी का अपना तरीका होता है. मैंने अपनी महत्वाकांक्षा नहीं छिपाई. हर पार्टी को बड़े सपने देखने का अधिकार है. एक वक्त हमारी पार्टी भी चीफ मिनिस्टर के पद की तरफ देख रही थी.'

देवेंद्र फडणवीस दो बातों को लेकर आत्मविश्वास से लबालब नजर आये - एक खुद के मुख्यमंत्री पद के एकमात्र दावेदार और चुनाव में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की चुनावों में जीत के बाद सत्ता में वापसी को लेकर.

बीजेपी-शिवसेना को लगा रहा खुला और खाली मैदान मिल गया

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने को तो वैसे ही हो रहे हैं जैसे 2014 में लोक सभा चुनाव के बाद हुए थे, लेकिन मौजूदा माहौल काफी बदला बदला लग रहा है. वैसे भी जब NCP और कांग्रेस के एक दर्जन से ज्यादा विधायक बीजेपी में जा चुके हों और 30 नेता भी भगवा ओढ़ चुके हों तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का चुनाव से पहले भी एक जीते हुए नेता जैसा व्यवहार एक पल के लिए बहुत अजीब भी नहीं लगता.

2014 के मुकाबले वैसे भी बीजेपी ज्यादा लोक सभा सीटों के साथ सत्ता में लौटी है. ऊपर से धारा 370 को खत्म करने का वादा पूरा करने के बाद पहला चुनाव मैदान तैयार हुआ है. यही सब वे कारण हैं जो देवेंद्र फडणवीस आत्मविश्वास से भरपूर नजर आ रहे थे.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने महाराष्ट्र दौरे में कहा था कि अगर हम सबको पार्टी में लेने को तैयार हो जायें तो एनसीपी में शरद पवार और महाराष्ट्र कांग्रेस में सिर्फ पृथ्वीराज चव्हाण ही बचेंगे. एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने तो बीजेपी पर उनके नेताओं को डरा धमका कर झटक लेने का आरोप लगाया ही था - अब एनसीपी महासचिव जितेंद्र आव्हाड का कहना है कि महाराष्ट्र में बीजेपी को समर्थन देना एनसीपी की सबसे बड़ी भूल थी जिसका खामियाजा पार्टी भुगत रही है.

दरअसल, 2014 में शिवसेना ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ कर अलग चुनाव लड़ा था और बीजेपी बहुत के आंकड़े 145 हासिल करने से चूक गयी थी. तब बीजेपी को 122 सीटें मिली थीं और उसे 23 विधायकों की कमी पड़ रही थी. तभी बीजेपी और एनसीपी की डील पक्की हो गयी और 41 विधायकों वाली एनसीपी ने बाहर से समर्थन दे दिया. शरद पवार ने ऐसा किया तो शिवसेना को झटका देने के लिए लेकिन बीजेपी के लिए पांव जमाने के लिए ये काफी था - आगे जो हुआ उससे साबित भी हो गया.

तब शरद पवार ने महाराष्ट्र में एक स्थायी सरकार के निर्माण के लिए बीजेपी को समर्थन देने को एकमात्र विकल्प बताया था - लेकिन अब वही एनसीपी फैसले को भयंकर भूल मानने लगी है.

देवेंद्र फडणवीस का दावा है कि जिस तरह से राहुल गांधी पार्टी चलाते हैं या कांग्रेस की जो हालत है, ऐसे में अगले 20-25 साल तक इन पार्टियों के पास कोई चांस नहीं है. फडणवीस की नजर में बीजेपी में दूसरे दलों से नेताओं के आने की भी सबसे बड़ी वजह यही है.

राहुल गांधी की तरह देवेंद्र फडणवीस एनसीपी नेता शरद पवार को भी वैसे ही पैमाने पर तौलते हैं - 'महाराष्ट्र में शरद पवार की राजनीति का युग खत्म हो चुका है... उन्होंने पार्टियां तोड़ीं, मरोड़ीं... कालचक्र का खेल देखिये... अब उनके साथ वैसे ही हो रहा है.'

देवेंद्र फडणवीस समझाते हैं कि कांग्रेस और एनसीपी के नेताओं को लगने लगा है कि राजनीति करनी है तो बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही करनी चाहिए.

ये ही सब वो वजहें हैं जो देवेंद्र फडणवीस को लगता है कि महाराष्ट्र में बीजेपी गठबंधन को खुला और खाली चुनावी मैदान मिल गया है, जिसमें गठबंधन की जीत के अलावा कोई और नतीजा नामुमकिन है - और ये बात उद्धव और आदित्य ठाकरे भी समझ चुके हैं. अब इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामना के संपादकीय में क्या क्या लिखा जाता है - क्योंकि बकौल देवेंद्र फडणवीस वो सामना पढ़ते ही नहीं.

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