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Updated: 12 नवम्बर, 2019 03:32 PM
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अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने से BJP झारखंड चुनाव को लेकर फिर से बेफिक्र हो गयी लगती है. महाराष्ट्र और हरियाणा के बुरे अनुभव के बाद बीजेपी सतर्क हो गयी थी. दोनों राज्यों में राष्ट्रवाद का मुद्दा तकरीबन रिजेक्ट हो जाने के चलते बीजेपी को चुनाव जिताने वाले कुछ और कारगर उपायों की तलाश रही - अयोध्या में राम मंदिर बनाने को लेकर अदालत के फैसले (Ayodhya Verdict) ने एक झटके में बीजेपी की चिंताएं खत्म कर दी है.

बीजेपी उम्मीदवारों की आयी पहली सूची देखकर ही लग रहा है कि बीजेपी झारखंड चुनाव में जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो चुकी है. चुनाव प्रचार में ये जरूर देखना होगा कि बीजेपी किन मुद्दों पर ज्यादा जोर दे रही है?

सत्ता विरोधी फैक्टर से बेफिक्र

सत्ता विरोधी फैक्टर झारखंड (Jharkhand Assembly Election) में भी बीजेपी की रघुवर दास सरकार पर वैसे ही लागू होता है, जैसे महाराष्ट्र और हरियाणा की हालत रही. हरियाणा में तो दुष्यंत चौटाला ऐसे मिल गये जैसे किस्मत खुल गयी हो, लेकिन महाराष्ट्र में चुनावी गठबंधन कर जीत और बहुमत हासिल करने के बाद भी बीजेपी सरकार नहीं बना सकी है. अब तो न्योता मिलने के बाद भी बीजेपी ने राज्यपाल से कह दिया है कि वो सरकार बनाने में असमर्थ है.

झारखंड विधानसभा चुनाव की तैयारी भी बीजेपी में वैसे ही चल रही है, जैसे महाराष्ट्र और हरियाणा को लेकर हुई थी. झारखंड में भी विपक्षी दलों के कई नेता भगवा ओढ़ कर 'जय श्रीराम' बोलने लगे हैं. बीजेपी ज्वाइन करने वालों में तो 6 विधायक बाबूलाल मरांडी की पार्टी छोड़ कर ही आये हैं. 2014 में बीजेपी ने खुद 37 जबकि गठबंधन सहयोगी AJSU ने 5 सीटें जीती थी.

narendra modi and raghubar dasबुलंद हौसले के साथ झारखंड चुनाव में उतर रही है बीजेपी...

झारखंड को लेकर एक खास ट्रेंड देखने को मिला है. झारखंड की जनता हमेशा नये चेहरों को तरजीह देती रही है. ऐसा देखा गया है कि ज्यादातर विधायक दोबारा चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंच पाते.

1. विधानसभा चुनाव 2005 : झारखंड की पहली विधानसभा में चुन कर आये 81 विधायकों में से 50 दोबारा विधानसभा का मुंह नहीं देख सके. बाकी दलों के साथ बीजेपी का भी वैसा ही अनुभव रहा - बीजेपी के 32 विधायकों में से 19 हार गये और सिर्फ 13 ही दोबारा जीत हासिल कर सके.

2. विधानसभा चुनाव 2009 : झारखंड के विधानसभा के 81 विधायकों में से 61 विधायक 2009 में चुनाव हार गये थे. महज 20 ही विधायक दोबारा विधानसभा पहुंचने में सफल हो पाये.

3. विधानसभा चुनाव 2014 : पिछली बार 2014 के विधानसभा चुनाव में 81 विधायकों में से 55 विधायकों एक बार फिर से जनता ने खारिज कर दिया था.

माना जा रहा था कि सत्ता विरोधी फैक्टर से बचने के लिए बीजेपी ज्यादातर विधायकों के टिकट काट सकती है. वैसे भी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के चुनाव जीतने का ये पुराना और सबसे कारगर नुस्खा रहा है. आम चुनाव में भी बीजेपी ने पूरे देश से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांग लिये - ताकि बीजेपी सांसदों के खिलाफ अगर लोगों में कोई गुस्सा हो तो वो आड़े न आये.

झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 के लिए बीजेपी ने 52 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है - और इस सूची की खासियत ये है कि इसमें 30 मौजूदा विधायकों को दोबारा मौका मिला है. साफ है बीजेपी को अब सत्ता विरोधी लहर की फिक्र नहीं रही. पहले ये माना जा रहा था कि बीजेपी बाकी चुनावों की तरह झारखंड में भी टिकट काटने की नीति कायम रखेगी - लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

निश्चित तौर पर बीजेपी को ये आत्मविश्वास अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ होने के बाद आया है. मान कर चलना होगा बीजेपी चुनावों में अयोध्या मामले का बढ़ चढ़ कर श्रेय लेने वाली है.

कुछ सीटों पर पेंच बरकरार है

बीजेपी की पहली सूची में मुख्यमंत्री रघुवर दास जमशेदपुर ईस्ट और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा चक्रधरपुर से चुनाव लड़ेंगे. बीजेपी की इस लिस्ट में 6 महिलाओं को भी उम्मीदवार बनाया गया है.

बीजेपी ने अभी लोहरदगा और चंदनकियारी सीटों पर उम्मीदवार नहीं उतारा है. दरअसल, इन दोनों सीटों पर बीजेपी की गठबंधन सहयोगी आजसू अपना दावा जता रही है. आजसू की दलील है कि भले ही वो ये सीटें हार गयी हो लेकिन ये उसकी परंपरागत सीटें हैं - और बीजेपी का कहना है कि चूंकि उन सीटों के मौजूदा विधायक बीजेपी में शामिल हो गये हैं, इसलिए बीजेपी को टिकट देने का हक बनता है.

लोहरदगा और चंदनकियारी के अलावा सुदेश महतो के आजसू ने चार और सीटों पर दावेदारी पेश कर रखी है - सिसई, टुंडी, हटिया और मांडु. बीजेपी की पहली सूची में चार में दो पर उम्मीदवार घोषित कर दिये गये हैं. बीजेपी ने हटिया से नवीन जायसवाल और मांडु से जेपी पटेल को उम्मीदवार बनाया है.

ऐसा भी नहीं बीजेपी के पिटारे में धारा 370 जैसे राष्ट्रवादी और अयोध्या जैसे हिंदुत्व के मुद्दे हैं, NRC के अलावा कॉमन सिविल कोड भी है. बीजेपी के पास अब खुद को वादे की पक्की साबित करने के तमाम उदाहरण हैं. धारा 370 को हटाकर कर तो बीजेपी ने चुनावी वादा पूरा कर ही दिया है, अयोध्या का फैसला भी उसके वादों की फेहरिस्त की शोभा बढ़ाने लगा है. ये सब करने के बाद बीजेपी बड़े दावे के साथ कह सकती है कि वो NRC लागू करने के साथ कॉमन सिविल कोड को लेकर भी संसद में कानून लाएगी ही - और इतना सब होने के बाद बीजेपी की बात पर लोगों के यकीन न करने की कोई वजह नहीं बचेगी.

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