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Updated: 25 अक्टूबर, 2019 07:28 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राजनीति में सबसे बड़े सबक चुनावों में ही मिलते हैं. महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव नतीजों में सबक बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए है. बीजेपी के लिए विशेष रूप से क्योंकि जल्द ही उसे दिल्ली, बिहार और झारखंड चुनावों में भी हाथ आजमाने हैं.

आम चुनाव के ही तेवर को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी ने राष्ट्रवाद का मुद्दा आगे बढ़ाया और आखिर तक टिकी रही. ये तो नहीं कहा जा सकता कि लोगों ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया, लेकिन इतना जरूर है कि ये बार बार नहीं चलने वाला.

रही बाद तोड़-फोड़ वाली राजनीति की तो इसमें भी मामला 50-50 ही रहने वाला है - महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे मिसाल हैं.

आने वाले चुनाव - दिल्ली, बिहार और झारखंड!

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी नेतृत्व के लिए कई मामलों में अलर्ट हैं - खास तौर पर इसलिए भी क्योंकि जल्द ही बीजेपी अगले विधानसभा चुनावों की तैयारी तेज करने वाली है. तेज तैयारी, इसलिए क्योंकि नयी बीजेपी पूरे साल चुनावी तैयारी कर रही होती है.

2014 में बीजेपी का विजय अभियान आम चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और आधा जम्मू-कश्मीर तक जारी रहा, लेकिन इस बार उसमें रोड़े खड़े हो गये हैं. झारखंड में चुनाव अभी कराये नहीं गये हैं और जम्मू-कश्मीर में हालात माकूल नहीं बताये जा रहे हैं. हालांकि, विधानसभा चुनाव के नतीजों के दिन 24 अक्टूबर को ही जम्मू-कश्मीर में ब्लॉकों के चुनाव कराये गये हैं. नतीजे भी आ चुके हैं और वे बीजेपी के लिए जरा भी उत्साहजनक नहीं हैं.

पांच साल पहले बीजेपी को दिल्ली विधानसभा चुनाव से झटके लगने शुरू हुए थे, लेकिन इस बार पहले ही शुरू हो गये हैं. चुनावी पैटर्न पहले जैसा ही रहा है, मोदी लहर के साथ ही बीजेपी पिछली बार विधानसभा चुनावों में भी उतरी थी. फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार बीजेपी के पास मुख्यमंत्री के चेहरे थे, पिछली बार ऐसे चेहरे कांग्रेस के पास थे.

narendra modi, amit shah, jp naddaमहाराष्ट्र-हरियाणा चुनाव के नतीजे बीेजेपी के अच्छे दिनों के लिए अलर्ट हैं!

झारखंड चुनाव : अव्वल तो झारखंड में भी महाराष्ट्र और हरियाणा के साथ ही चुनाव होने वाले थे, लेकिन आम आदमी पार्टी का कयास है कि उसे दिल्ली के साथ कराया जा सकता है. बिहार का नंबर उसके बाद आता है. 2015 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को दिल्ली और बिहार दोनों में ही हार का मुंह देखना पड़ा था.

अब तक तो यही सुनने में आया है कि झारखंड में भी क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी फैक्टर खड़ा हुआ है. ऐसे में बीजेपी ने अगर राष्ट्रवाद के सहारे एक बार फिर स्थानीय समस्याओं से ध्यान बंटाने की कोशिश की तो नतीजे उलटे पड़ेंगे इसमें शक की कम ही गुंजाइश है. ये बात अलग है कि हरियाणा में बहुमत से चूक जाने के बावजूद बीजेपी वोटों की हिस्सेदारी में 3 फीसदी का इजाफा और सबसे बड़ी पार्टी बने रहने को भी बड़ी उपलब्धि बता रही है. ये भी ठीक है कि वो निर्दलीयों की मदद से सरकार बनाने में कामयाब हो रही है - लेकिन ये भी ध्यान रहे एक ही जुगाड़ हर बार काम नहीं करता.

दिल्ली चुनाव : दिल्ली में बीजेपी के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती नजर आ रही है. इसलिए नहीं कि वो पिछली बार हार गयी थी, बल्कि, इसलिए क्योंकि दिल्ली बीजेपी में अब भी बहुत कुछ बदला नहीं है. गुटबाजी जहां की तहां ही है. आम चुनावों में इसलिए ज्यादा महसूस नहीं हुआ क्योंकि तब हर तरह सर्जिकल स्ट्राइक और मोदी-मोदी वाला माहौल रहा.

दिल्ली में आप के तीसरे स्थान पर खिसक जाने से भी बीजेपी को बहुत निश्चिंत रहने की जरूरत नहीं है. आम चुनाव के नतीजों ने अरविंद केजरीवाल को भूल सुधार का मौका मुहैया करा दिया और तभी से वो नये सिरे से चुनावी तैयारियों में जुट चुके हैं. आम आदमी पार्टी ने अपनी रणनीतियों में भी काफी बदलाव किया है - मोदी सरकार पर निजी हमलों की जगह उम्मीद भरी तारीफें होने लगी हैं और केंद्र के कदमों पर बड़ी ही नपी तुली प्रतिक्रिया आ रही है. दिल्ली की अवैध कालोनियों को नियमित करने के मोदी सरकार के फैसले पर आप की प्रतिक्रिया से इसे समझा जा सकता है.

बिहार चुनाव : आम चुनाव में तो बिहार में भी राष्ट्रवाद, पाकिस्तान और सर्जिकल स्ट्राइक से काम चल गया, लेकिन उसके बाद चमकी बुखार और बाढ़ से बेहाल बिहार के लोग नेताओं का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

ऐसा भी संभव नहीं है कि बीजेपी सारी जिम्मेदारियां मुख्यमंत्री के कंधे पर थोप कर पल्ला झाड़ लेगी - क्योंकि चुनाव में एनडीए का चेहरा तो नीतीश कुमार ही होंगे.

बिहार में हुए उपचुनाव के नतीजों को बीजेपी और जेडीयू चाहें तो एक अच्छे फीडबैक के तौर पर ले सकते हैं. समस्तीपुर लोकसभा सीट तो पासवान परिवार की थी और बनी हुई है. पहले राम विलास पासवान के भाई सांसद रहे, अब उनके भतीजे प्रिंस सांसद बन गये हैं. बड़ी बात ये है कि पांच विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में एनडीए के हिस्से में सिर्फ एक सीट आई है - और आम चुनाव में खाता भी नहीं खोल पायी आरजेडी ने दो सीटें जीत ली हैं.

एक जैसे जुगाड़ बार बार नहीं चलेंगे

1. राष्ट्रवाद मुद्दा है, लेकिन उसकी भी सीमा है : ये तो कतई नहीं कहा जा सकता कि लोगों ने बीजेपी के राष्ट्रवाद के मुद्दे को खारिज कर दिया है. कम से कम नतीजों से तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता. हां, नतीजे ही ये भी बता रहे हैं कि राष्ट्रवाद, धारा 370 या पाकिस्तान जैसे मुद्दे चुनावी थाली का जायका बढ़ा सकते हैं, लेकिन उसमें मूल तत्व बेहद जरूरी हैं और उन्हें नजरअंदाज करने का खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा - ये तय है.

2. तोड़-फोड़ में चांस 50-50 ही है : चुनावों के समय बीजेपी दूसरे दलों के नेताओं को बड़ी तेजी से तोड़ कर लाती रही है और बदले में उन्हें ओहदे भी गिफ्ट करती रही है - लेकिन ये हर जगह नहीं चलता. सतारा का नतीजा सबसे बड़ा उदाहरण है. वैसे महाराष्ट्र में ऐसे 19 उम्मीदवार चुनाव हार गये हैं.

3. ये डबल रोल हानिकारक तो नहीं : अमित शाह अब भी बीजेपी अध्यक्ष हैं, लेकिन गृह मंत्री होने के चलते उनके हिस्से के 24 घंटे का एक बड़ा भाग सरकारी कामकाज में देना पड़ता है. कहने को तो जेपी नड्डा कार्यकारी अध्यक्ष बनाये गये हैं - लेकिन बड़े फैसले तो वो ले नहीं सकते. वैसे भी अमित शाह के लिए कोई छोटा फैसला भी नहीं होता. कहीं ये डबल रोल बीजेपी को भारी तो नहीं पड़ने लगा है?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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