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Updated: 13 जनवरी, 2021 06:52 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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होली और ईद को दोस्तों के साथ साथ दुश्मनों के बीच का फासला मिटाने वाला त्योहार माना जाता है - बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति, खिचड़ी के नाम से ज्यादा मशहूर, के दही-च्यूड़ा भोज का भी बरसों से यही रोल रहा है. अफसोस की बात ये है कि 2021 में ये आयोजन नहीं होने जा रहा है.

तीन साल पहले भी बिहार में मुख्यमंत्री तो नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ही थे, लेकिन सरकार महागठबंधन की थी. सरकार बने साल भर ही हुए थे और तनातनी इतनी तो हो ही चुकी थी कि लालू प्रसाद यादव के भोज से नीतीश कुमार दूरी बना लें, लेकिन 14 जनवरी, 2017 को राबड़ी देवी को खातिरदारी से नीतीश कुमार ने महरूम नहीं किया - और न ही लालू यादव को दही का टीका लगाने से. नीतीश कुमार को टीका लगाते हुए लालू यादव ने दावा किया था कि आगे से बीजेपी के जादू-टोने का असर नहीं होगा, लेकिन छह महीने भी नहीं बीते और एनडीए की नजर लगते ही नीतीश कुमार पाला बदल चुके थे.

खिचड़ी भोज रद्द किये जाने के पीछ वजह तो कोविड 19 ही बतायी जा रही है, लेकिन ये अकेला खतरा नहीं लगता - जो सबसे बड़ा खतरा महसूस हो रहा है, वो राष्ट्रीय जनता दल में संभावित तोड़-फोड़ को लेकर बीजेपी का दावा है. बीजेपी के बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव (Bhupender Yadav) ने दावा किया है कि खिचड़ी को खत्म होने वाले खरमास के बाद तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) की आरजेडी में टूट होना तय है.

भूपेंद्र यादव के दावे पर आरजेडी की तरफ से प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी का काउंटर अटैक भी आ चुका है - खरमास में ही खेल कर देंगे. अब तो खिचड़ी के साथ ही खरमास भी खत्म हो जाएगा - खेल कब होगा?

खरमास के बाद क्या होगा?

खरमास के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं होता और यही वजह रही होगी कि बीजेपी ने बाद का कार्यक्रम बनाया होगा. बीजेपी के ऑपरेशन लोटस में हमेशा दूसरे दलों की सरकार गिराने का ही काम नहीं होता, कभी कभी दूसरे दलों के जन प्रतिनिधि थोक भाव में पार्टी में आयातित भी होते हैं - और ये काम भी विधानसभा या लोक सभा तक ही सीमित नहीं है, राज्य सभा के सांसद भी ऐसे शिकार होते रहे हैं. चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी भी एनडीए छोड़ने के बाद ये सियासी स्वाद चख चुकी है.

बिहार में सबसे पहले चिराग पासवान ने ही नीतीश कुमार की सरकार के पांच साल पूरे करने पर सवाल उठाया था और मध्यावधि चुनाव होने का दावा भी किया था. फिर तेजस्वी यादव कहने लगे हैं कि छह महीने में नीतीश सरकार गिर जाएगी.

ऐसा बोल कर वो आरजेडी नेताओं और कार्यकर्ताओं को नये सिरे से चुनावी तैयारी के लिए हौसलाअफजाई करने की कोशिश कर रहे हैं. ये भी हो सकता है कि किला बचाने का एक उपाय भी हो. अभी कुछ ही दिन पहले आरजेडी की तरफ से श्याम रजक ने दावा किया था कि जेडीयू के 17 विधायक उनकी पार्टी में शामिल होने को तैयार बैठे हैं.

कांग्रेस को लेकर तो पार्टी के एक पूर्व विधायक ने पार्टी में बड़ी टूट का दावा कर डाला था. कांग्रेस नेता भरत सिंह का कहना था कि पार्टी के कई विधायक टूट कर जेडीयू में जा सकते हैं. कांग्रेस के पास फिलहाल 19 विधायक हैं.

हालांकि, नीतीश ने जेडीयू की राज्य परिषद की बैठक में चुनाव हारे हुए नेताओं से कहा कि वे बेफिक्र होकर अपने इलाके में ऐसे जायें और जनता की सेवा करें जैसे वे ही चुनाव जीते हों - और इस बात को लेकर भी निश्चिंत रहे कि सरकार पांच साल चलेगी ही. साथ में ये भी बता दिया कि एनडीए नेताओं के दबाव में वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, वरना इस बार उनका कतई मन नहीं था.

bhupender yadav, tejashwi yadav, nitish kumarखरमास का खेल तो खत्म हुआ - और तो बिहार में खिचड़ी ही पकेगी!

बिहार बीजेपी प्रभारी भूपेंद्र यादव हैदराबाद में बीजेपी की जीत सुनिश्चित करने और बिहार चुनाव की थोड़ी थकान मिटाने के बाद पटना पहुंचे तो प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष संजय जायसवाल और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात से पहले जेडीयू के नये नवेले अध्यक्ष आरसीपी सिंह से भी मिले. मुलाकात के बाद जब नीतीश कुमार मीडिया के सामने आये तो बताया था कि मंत्रिमंडल विस्तार पर कोई चर्चा नहीं हुई, 'राजनीति पर कोई चर्चा नहीं हुई' - हां, सरकार के कामकाज पर चर्चा हुई है. तभी नीतीश कुमार ने बताया कि पहले कभी मंत्रिमंडल विस्तार में देर नहीं हुई क्योंकि सब कुछ उनको खुद करना होता रहा. अब वो बात नहीं है. मतलब, ऐसे समझें कि बीजेपी जब तक चाहेगी नहीं जो हैं उनसे ही काम चलाना पड़ेगा.

बाद खबर आयी तो मालूम हुआ कि नीतीश कुमार के राजनीति पर कोई चर्चा नहीं हुई बताने का मतलब ये रहा कि चर्चा तोड़ फोड़ पर हुई थी. कांग्रेस को लेकर भी और आरजेडी को लेकर भी. साथ ही चर्चाओं में राज्यपाल कोटे से मनोनीत होने वाले विधान परिषद की सीटों को लेकर और जीतनराम मांझी की सक्रियता पर भी बात हुई थी. जब इतना सब कुछ हुआ तो मंत्रिमंडल विस्तार जैसी महत्वपूर्ण चीज पर चर्चा न हो, सुनने में थोड़ा अजीब लगता है. हो भी सकता है, अब मंत्रिमंडल विस्तार कांग्रेस और आरजेडी की टूट फूट से ज्यादा महत्वपूर्ण तो हो नहीं सकता. और अगर ऐसा होता है तो नये मेहमान तो सीधे कैबनेट के वादे के साथ ही तशरीफ भी रखेंगे - और अगर वाकई ऐसा है तो मंत्रिमंडल विस्तार की पहले से चर्चा वक्त की बर्बादी ही कही जाएगी.

लेकिन आरजेडी के टूट की खबर निकल कर आयी है भूपेंद्र यादव की बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ हुई बैठक से. भूपेंद्र यादव 10 दिसंबर, 2021 को पटना जिला कार्यसमिति की बैठक के आखिरी सत्र को संबोधित कर रहे थे, 'आरजेडी में लालू के परिवारवाद से नेताओं में बौखलाहट है... संक्रांति के बाद उनकी पार्टी टूट से नहीं बच पाएगी.'

भूपेंद्र यादव का कहना रहा कि मकर संक्रांति के बाद तेजस्वी यादव अपनी पार्टी को बचा सकें तो बचा लें वरना उनकी पार्टी में टूट होना तय है. भूपेंद्र यादव पर पलटवार के लिए मोर्चा संभाला आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने और बताया कि बीजेपी की चेतावनी महज गीदड़ भभकी भर है.

मृत्युंजय तिवारी बोले, 'हमारी चुनौती है भाजपा को... बिहार में अगर सरकार को बचा सके तो बचा ले. भाजपा ज्यादा छटपट करेगी तो खरमास में ही आरजेडी खेल कर देगी और भाजपा को तहस-नहस कर देगी - ये आरजेडी की तरफ से खुली चुनौती है.'

खरमास खत्म हो चला है और इस हिसाब से आरजेडी के धमकी की मियाद भी पूरी हुई - और अब तो भूपेंद्र यादव का बताया हुआ समय आ रहा है - सवाल वही है खरमास के बाद क्या होगा?

RJD में टूट के साइड इफेक्ट

सामान्य तौर पर देखा जाये तो आरजेडी में किसी तरह की टूट होने की स्थिति में एनडीए ही मजबूत होगा, लेकिन बड़ा सवाल ये भी है कि एनडीए के मजबूत होने की स्थिति में क्या नीतीश कुमार भी मजबूत होंगे - तब क्या होगा जब एनडीए तो मजबूत हुआ लेकिन नीतीश कुमार पहले के मुकाबले ज्यादा कमजोर हो गये?

असल बात तो ये है कि आरजेडी के टूटने का नीतीश कुमार को डबल नुकसान हो सकता है - एक, एनडीए छोड़ कर महागठबंधन में जाने का उनका विकल्प खत्म हो जाएगा - और दो, आरजेडी छोड़ कर विधायक अगर बीजेपी में शामिल हो जाएंगे तो बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी ही नहीं बनेगी. ऐसा हुआ तो जेडीयू और बीजेपी में सीटों के नंबर का फासला भी काफी ज्यादा बढ़ जाएगा. बीजेपी नीतीश कुमार के साथ अभी तो मनमानी कर ही रही है, बदली हुई परिस्थितियों में तो नीतीश कुमार चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाएंगे.

आरजेडी के टूट कर कमजोर हो जाने की स्थिति में तो जेडीयू के साथ मिल कर सरकार बनाने लायक नंबर रहेगा ही नहीं, फिर नीतीश कुमार के पास जाने का कोई विकल्प भी नहीं होगा. बीजेपी से चुनावों में जो चूक हो गयी है उसकी बदौलत आरजेडी मजबूत हो गया है. बीजेपी ने अपना सारा ध्यान नीतीश कुमार को कमजोर करने में लगा दिया. लगता है अब बीजेपी अपने लिए भूल सुधार करना चाह रही है.

कांग्रेस के विधायकों के टूटने की बात भी अगर आग नहीं तो धुआं तो है ही. फिर भी कांग्रेस विधायकों को तोड़ कर जेडीयू में नीतीश कुमार नहीं लेना चाहते हैं - क्योंकि जैसे बीजेपी ने अरुणाचल में जेडीयू के विधायकों को तोड़कर अपने में मिला लिया, वैसे ही अगर नीतीश कुमार बिहार में कांग्रेस के साथ करें तो आगे से कांग्रेस के साथ दुश्मनी और बढ़ जाएगी, नतीजा ये होगा कि एनडीए के बाहर नीतीश कुमार के लिए कुछ बचा भी न होगा.

वैसे नीतीश कुमार के लिए अभी राहत की बात ये है कि भूपेंद्र यादव ने आरजेडी विधायकों के बीजेपी में शामिल होने का दावा नहीं किया है. बल्कि कहा है कि एनडीए में शामिल होंगे - नीतीश कुमार चाहें तो कोई जो वक्त मिला है उसमें कोई नयी रणनीति तैयार कर सकते हैं.

हालांकि, भूपेंद्र यादव के एनडीए कहने का मतलब भी बीजेपी ही समझना चाहिये, क्योंकि चिराग पासवान भी तो एनडीए के नाम पर नीतीश कुमार को ही नुकसान पहुंचाये थे.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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