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Updated: 03 दिसम्बर, 2020 12:26 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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बिहार में बहार है, लेकिन बीजेपी की - और 'नीतीशे कुमार' भी हैं, लेकिन वो भी अब बीजेपी के ही लगते हैं. नीतीश कुमार के बरसों के साथी रहे सुशील मोदी भी अब पूरी तरह बीजेपी के हो रहे हैं. पहले बीजेपी वाले ही सुशील मोदी को 'ऑफ द रिकॉर्ड' जेडीयू का नेता बताते भी थे और मानते भी थे.

सुशील मोदी राज्य सभा का चुनाव लड़ रहे हैं. सुशील मोदी के बीजेपी उम्मीदवार होने के चलते चिराग पासवान ने भी आगे कदम न बढ़ाने का फैसला किया है. चिराग पासवान चाहते थे कि उनके पिता रामविलास पासवान की सीट उनकी मां को मिले - बीजेपी ने तो नहीं, लेकिन आरजेडी ने रीना पासवान को महागठबंधन की तरफ से राज्य सभा का प्रत्याशी बनाने की पेशकश की थी. चिराग पासवान ने तेजस्वी यादव के बेशकीमती प्रस्ताव को भी बीजेपी के नाम पर आभार सहित ठुकरा दिया है.

चिराग पासवान के ताजा फैसले से सुशील मोदी काफी राहत महसूस कर रहे होंगे. निश्चित तौर पर वो सुन कर डरे तो होंगे ही क्योंकि रीना पासवान के मैदान में उतरने पर एकतरफा की जगह चुनाव मुकाबले में तब्दील हो जाता. अब अगर सुशील मोदी की पटना राजधानी में रिजर्वेशन कंफर्म हो गया तो तय है कि वो दिल्ली शिफ्ट हो जाएंगे. अब दिल्ली में सरकारी बंगला कैसा मिलता है, देखना होगा. दिल्ली के सरकारी बंगले कई टाइप के होते हैं और मंत्री बन जाने की सूरत में साइज बड़ी हो जाती है.

सुशील मोदी को नीतीश कुमार से दूर करने की ये सियासी कवायद एक तरीके से जेडीयू नेता के राजनीतिक कॅरियर में बीजेपी की तरफ से आखिरी से पहले वाली कील जैसी ही समझी जानी चाहिये. 2013 में एनडीए छोड़ने और 2015 में लालू यादव से चुनावी गठबंधन करके नीतीश काफी ताकतवर हो गये थे, हालांकि, ये बात बीजेपी को तब समझ में आयी जब बिहार चुनाव के नतीजे आये थे और मार्गदर्शक मंडल से भी विरोध की आवाजें उठ खड़ी हुईं.

ज्यादा दिन नहीं लगे और 18 महीने में ही महागठबंधन टूट गया और जो लालू यादव के साथ नीतीश कुमार (Nitish Kumar and Lalu Yadav) मिल कर एक और एक ग्यारह वाली ताकत हासिल कर चुके थे - टूटते ही दोनों के दोनों बिखर गये. लालू यादव फिर से जेल पहुंच गये और नीतीश कुमार बीजेपी खेमे में नजरबंद से हो गये. बिहार की राजनीति में गरीबों और वंचितों के नेता लालू यादव और सुशासन बाबू की छवि हासिल कर चुके नीतीश कुमार की बर्बादी की स्क्रिप्ट लिखने वाले बीजेपी नेता का नाम है - भूपेंद्र यादव. ये भूपेंद्र यादव (Bhupender Yadav) ही हैं जिनके बेहतरीन पूर्वानुमान, दूरगामी सोच और सटीक रणनीति की बदौलत बीजेपी लालू यादव की राजनीति को तब तक चैन से नहीं देना चाहती जब तक समोसे में आलू है - और उनके 'भाई जैसे दोस्त' नीतीश कुमार के साथ भी वैसे ही खातिर-भाव में कोई कमी नहीं रखने वाली लगती है. भूपेंद्र यादव और नित्यानंद राय (Nitya Nand Rai) बिहार चुनाव में अमित शाह के आंख, नाक और कान बने रहे - और जब जरूरत पड़ी तो मुंह भी.

जब भूपेंद्र यादव ने ड्राइविंग सीट संभाली

2017 में भूपेंद्र यादव उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी थे और नतीजे आने के कुछ ही महीने बाद बिहार गठबंधन टूट चुका था. नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी में भूपेंद्र यादव मुख्य भूमिका में तो नहीं थे, लेकिन हैसियत ऐसी भी नहीं थी कि उनकी राय कोई मायने नहीं रखती हो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह तो चाहते ही थे कि नीतीश कुमार जैसे भी हो सके लालू यादव से अलग हों, लेकिन एनडीए नीतीश कुमार की घर वापसी में सबसे बड़ी भूमिका रही उनके बेहद खास दोस्त अरुण जेटली की जो तब की मोदी सरकार में कैबनेट मंत्री थे.

नीतीश कुमार के महागठबंधन छोड़ने के करीब साल भर पहले ही बिहार बीजेपी की कमान नित्यानंद राय को थमायी गयी. सिर्फ इसलिए नहीं कि भूपेंद्र यादव को बिहार में भी अपने काम के लिए कोई यादव नेता ही मिला, बल्कि इसलिए कि यादवों के बीच से आने वाला एक लोहा ही लालू यादव जैसे बिहार के सबसे मजबूत लोहे को काट सके. 2019 के आम चुनाव के दौरान मोदी लहर में बगैर कोई गलती किये नित्यानंद राय के क्षेत्रीय नेतृत्व में बीजेपी वे सभी सीटें जीतने में कामयाब रही जिन पर पार्टी ने उम्मीदवार खड़े किये थे.

bhupender yadav, nityananad raiभूपेंद्र यादव और नित्यानंद राय की जोड़ी बीजेपी की स्क्रिप्ट के मुताबिक नीतीश कुमार और लालू यादव की राजनीति के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं.

नित्यानंद राय को इनाम में दिल्ली में मंत्री पद मिला और कुछ दिन बाद बिहार की कमान वैश्य समुदाय से आने वाले डॉक्टर संजय जायसवाल को थमायी गयी. 2020 के विधानसभा चुनाव में ये दोनों ही नेता बीजेपी के लिए बड़े काम के साबित हुए, सिर्फ एक सीट कम आने की वजह से बीजेपी नंबर वन पार्टी तो नहीं बन सकी, लेकिन चुनाव से पहले नीतीश कुमार की जैसी घेरेबंदी की रणनीति तैयार की गयी थी वो तो बेहद सफल रही.

बिहार बीजेपी में मठाधीश बन बैठे सुशील मोदी और प्रेम कुमार जैसे नेताओं को एक खास दायरे में बांध कर नयी पीढ़ी के नेताओं को सामने लाने का भी श्रेय भूपेंद्र यादव की ही सधी रणनीति और सख्ती के साथ उस पर अमल का ही नतीजा मान जा रहा है.

भूपेंद्र यादव ने जिस काबिलियत का प्रदर्शन किया है, चुनावी मशीन और चाणक्य के नाम की शोहरत हासिल कर चुके केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सिर्फ बिहार प्रभारी ही नहीं बनाया, बल्कि बीजेपी के चुनावी मिशन की ड्राइविंग सीट पर बिठा दिया है - तभी तो पटना में ऑपरेशन पूरा होते ही भूपेंद्र यादव को हैदराबाद की फ्लाइट का टिकट पकड़ा दिया जाता है.

राजस्थान से आने वाले भूपेंद्र यादव, दरअसल, संगठन में काम करने के लिए नितिन गडकरी की खोज हैं. 2010 में बीजेपी अध्यक्ष रहते नितिन गडकरी ने ही भूपेंद्र यादव को पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाया था. 2013 में बीजेपी के राजस्थान का चुनाव जीतने में भूपेंद्र यादव की महत्वपूर्ण भूमिका रही जब वो चुनावी वॉर रुम की रणनीति तैयार कर रहे थे. फिर झारखंड (2014) विधानसभा चुनाव, यूपी (2017) विधानसभा और गुजरात (2017) विधान सभा के बाद 2020 के बिहार चुनाव से पहले महाराष्ट्र चुनाव में भी भूपेंद्र यादव का अहम रोल रहा. भले ही सुशांत सिंह राजपूत केस के चुनावी मुद्दा बनने की उम्मीद में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को बिहार का चुनाव प्रभारी बनाया गया था, लेकिन दोनों के कामकाज में पुराना अनुभव काफी फायदेमंद साबित हुआ. नतीजे तो यही बता रहे हैं.

ब्लू प्रिंट तैयार है - देखिये आगे आगे होता है क्या

पटना बीजेपी के बुजुर्ग नेताओं की मठाधीशी और बिहार की जमीनी स्तर राजनीति समझने के बाद भूपेंद्र यादव ने बीजेपी नेतृत्व से विचार विमर्श के बाद एक डबल बैरल सियासी हथियार भी मोर्चे पर तैनात कर दिया - नित्यानंद राय. बिहार का ऐसा नेता जिसका नीतीश कुमार के साथ न दोस्ती न दुश्मनी वाला रिश्ता हो - लेकिन वो न तो सुशील मोदी जैसा नीतीश कुमार के फायदे की ही सोच रखता हो - और न ही गिरिराज सिंह की तरह हर वक्त नीतीश कुमार को डैमेज करने के बारे में सोचता रहता हो.

नित्यानंद राय के साथ ज्यादा से ज्यादा मीटिंग हो सके, ये सोच समझ कर ही अमित शाह ने पूरा वक्त रहते अपना परम सहयोगी बना लिया - नित्यानंद राय फिलहाल गृह राज्य मंत्री और इस तरह अमित शाह के डिप्टी हुए.

बिहार में सबसे पहले 8 जून की अमित शाह की डिजिटल रैली की शुरुआत करने वाले ही नहीं, सारे कर्ताधर्ता नित्यानंद राय ही रहे - और कोरोना संक्रमण और खराब सेहत की वजह से दिल्ली में बैठे बैठे अमित शाह वर्चुअली नित्यानंद राय के रूप में पटना में ही डेरा डाले रहे, लगता तो ऐसा ही है.

भूपेंद्र यादव और नित्यानंद राय की इस जोड़ी ने वो सब कर डाला है जो मोदी-शाह के मन में रहा होगा. विधानसभा चुनाव में जेडीयू से ज्यादा सीटें जीत कर उन पर नकेल कस देना कोई बायें हाथ का खेल नहीं रहा, लेकिन भूपेंद्र यादव और नित्यानंद राय ने ऐसी ही मंशा से कोशिश की और कर के दिखा भी दिया है.

अब जब जेडीयू से जरूरत से भी ज्यादा बीजेपी की सीटें आ गयीं तो नीतीश कुमार की सारी मनमानियां खत्म हो गयीं. पिछलग्गू सुशील मोदी को सियासी सर्जरी के बाद अलग करना तो तय था, लेकिन ऑपरेशन की डेट का इंतजार रहा. ये सर्जरी भी वैसी ही मुश्किल रही जैसे जुड़वा बच्चों के सिर और धड़ अलग करना होता है. अलग हो भी गये और एक ही इलाके में रहें ये तो और भी खतरनाक साबित हो सकता है. पहले दोनों जहां मिल कर खेलते रहे - अब तो अलग होकर खुल कर खेल सकते हैं, ऐसी आशंकाएं रहीं, लिहाजा राज्य सभा का उम्मीदवार बनवाकर भूपेंद्र यादव ने वो चाल भी चल दी - अब जीत गये तो भी आडवाणी बन जाने की काफी संभावना है - और हार गये तो पार्टी में राम माधव जैसी पोजीशन पर विचार किया जा सकता है. सुशील मोदी काफी टेक सैवी माने जाते हैं जिन्हें फैक्ट और हर मामले में बारीकियां पसंद हैं. फिलहाल पटना में चर्चा है कि सुशील मोदी को वित्त मंत्रालय तो नहीं मिल सकता जो बरसों से वो बिहार में संभालते रहे, लेकिन रामविलास पासवान की सीट जीतने के बाद उनका खाद्य आपूर्ति मंत्रालय या कृषि मंत्रालय भी मिल सकता है. फिलहाल कृषि मंत्रालय नरेंद्र सिंह तोमर के पास है. मध्य प्रदेश उपचुनावों में तो तोमर किसी जनरल की तरह मैदान-ए-जंग में भेज दिये गये थे और छिटपुट हार के साथ जीत कर लौटे हैं, लेकिन किसान आंदोलन नींद हराम कर रखी है. मोदी सरकार किसानों की आय दुगुनी करने की स्कीम पर पिछली पारी से ही तैयारी कर रही है, लेकिन तब जो हाल राधामोहन सिंह का रहा, अभी नरेंद्र सिंह तोमर का उससे भी बुरा हाल हो रखा है.

बिहार में आगे की योजनाओं को हकीकत में बदलने के मकसद के साथ हाई कमान ने भूपेंद्र यादव की मदद के लिए तीन सहयोगी भेजे हैं, जिनमें दो हैं - हरीश द्विवेदी और अनुपम हाजरा. हरीश द्विवेदी के जिम्मे बिहार चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 12 रैलियों को मैनेज करना रहा और उसमें वो सफल रहे. हरीश द्विवेदी के साथ बिहार के सह प्रभारी बनाये गये अनुपम हजारा पश्चिम बंगाल से आते हैं. वो जाधवपुर से लोक सभा का चुनाव भी लड़े थे लेकिन हार गये. हालांकि, बेलापुर से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर पहले सांसद रह चुके हैं.

भूपेंद्र यादव को ये दोनों ही सहयोगी दूरगामी सोच के तहत दिये गये हैं. दोनों को भूपेंद्र यादव के निर्देशन में बिहार में काम करना है. अनुपम हजारा पश्चिम बंगाल से आते हैं और कभी ममता बनर्जी के बेहद खास और भरोसेमंद हुआ करते थे - जहां छह महीने बाद ही चुनाव होने जा रहे हैं. अनुपम हजारा को दूसरा मुकुल रॉय भी समझा जा सकता है. हरीश द्विवेदी यूपी से आते हैं जहां 2022 में विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं.

क्या ऐसा नहीं लगता जैसे बीजेपी नेतृत्व ने चुन कर दोनों को भूपेंद्र यादव की देखरेख में कमांडो ट्रेनिंग के लिए भेजा हो - और जब तक चुनाव की तारीख आएगी वे मोर्चे पर तैनाती के लिए पूरी तरह तैयार हो चुके होंगे - प्रशिक्षित कमांडो तो किसी भी मुश्किल स्थिति को काबू कर अपने पक्ष में नतीजे हासिल करने के लिए किसी भी मौके पर भेज दिये जाते हैं.

अब जबकि इतना सब हो रहा है तो नित्यानंद राय के मन में कभी गिरिराज सिंह या उपेंद्र कुशवाहा की तरह एक दिन बिहार का चीफ मिनिस्टर बन जाने का ख्याल नहीं आता होगा? क्या मोदी-शाह के मन में भी ऐसे ख्यालात आते होंगे? अगर ये सब कपोल कल्पित ऑब्जर्वेशन से कुछ ज्यादा है तो सोने में सुहागा तो पहले से मिला हुआ था - अब तो बस सुगंध की ही बारी है.

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#बिहार, #नीतीश कुमार, #लालू प्रसाद, Nitish Kumar And Lalu Yadav, Bhupender Yadav, Nitya Nand Rai

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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