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गुस्सा नहीं सहानुभूति दिखाइए, चमकी बुखार से बच्चे नहीं सरकार पीड़ित है !
करीब एक दशक से चमकी बुखार से मौत का तांडव जारी है. लेकिन सरकार इसकी वजह जानने में विफल रही है. सरकार यह भी बता पाने में विफल है कि यह रोग क्या है. इसका इलाज क्या हो सकता है. इसकी दवा क्या है.
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विगत 21 जून को एलजेपी प्रमुख रामविलास पासवान का राज्यसभा सदस्य का नामांकन था. तब पत्रकारों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से चमकी बुखार से बच्चों की मौत को लेकर सवाल उठाया. वे नाराज हो गए. नसीहत दे डाली कि 'आप लोग मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हैं. रिटर्निंग ऑफिसर की पीठ पर खड़े हो रहे हैं. चलिए हटिए. बाहर निकलिए.' मार्शल के जरिए मीडियाकर्मी को बाहर का रास्ता दिखाया.
इसके एक दिन पहले सीएम लू पीड़ितों का हाल लेने गया पहुंचे थे तब भी मीडिया के सवालों को टाल गए. यही नहीं, 19 जून को डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी से पत्रकारों ने सवाल किया, तब सुशील मोदी ने भी पत्रकारों को यह कहते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया कि यह बैंकिंग समिति की बैठक है. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन जब प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे तब केन्द्रीय राज्य मंत्री अश्विनी चैबे की औंघते हुए तस्वीर वायरल हुई. यही नहीं, बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय इसी बिमारी को लेकर महत्वपूर्ण बैठक कर रहे थे, लेकिन उसमें वह पूछ रहे थे कि 'कितना विकेट गिरा'.
नीतीश कुमार पत्रकारों के सवालों के जवाब देने से बच रहे हैं
दरअसल, चमकी बुखार बच्चे को नहीं है. इस बुखार से सरकार ग्रसित है. अब सोचने वाली बात यह है कि आखिर यह कौन सी बीमारी है जिसके बारे में बिहार सरकार बोलने की स्थिति में नहीं है. सीएम और डिप्टी सीएम से जब कोई सवाल करता है तब वे क्रोधित हो जाते हैं. करीब एक दशक से चमकी बुखार से मौत का तांडव जारी है. लेकिन सरकार इसकी वजह जानने में विफल रही है. सरकार यह भी बता पाने में विफल है कि यह रोग क्या है. इसका इलाज क्या हो सकता है. इसकी दवा क्या है.
लेकिन पीड़ित बच्चों के परिजन और सरकार में एक बड़ी समानता यह है कि जिस तरह से चमकी बुखार से राहत के लिए पीड़ित परिवार बारिश होने का इंतजार करते हैं, सरकार भी उसी बारिश का इंतजार करती है ताकि तापमान में नमी हो. क्योंकि ऐसा देखा गया है कि तापमान में गिरावट के बाद पीड़ितों की तादाद में कम हो जाती है.
मौजूदा समय में मौत का सिलसिला जारी है. 2019 में 160 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है. इससे अधिक बच्चे प्रभावित हैं. 2010 से यह सिलसिला तेज है. 2010 में 24, 2012 में 120, 2013 में 39, 2014 में 90, 2015 में 11, 2016 में 4, 2017 में 11 और 2018 में सात बच्चे की मौत हो चुकी है. कई गुना अधिक लोग पीड़ित हुए. कई की रोशनी चली गई. बोलचाल में लोग इसे मस्तिष्क ज्वर, एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिन्ड्राम (एइएस) या फिर जपानी इंसेफेलाइटिस कहते हैं.
दरअसल, इस रोग के शिकार लोग जिस तरह बेबस और लाचार हैं, सरकार भी ऐसे ही लाचार है. उसे कुछ सूझ नहीं रहा. इतने लंबे अंतराल में सरकार इस रोग से निदान का कोई फॉर्मूला नहीं खोज पाई. जाहिर तौर पर सरकार के पास जवाब नहीं है. बीच में कुछ महीने जीतन राम मांझी को छोड़ दें तो 2005 से लगातार नीतीश कुमार बिहार के सीएम रहे हैं. करीब कुछ महीने राजद को छोड़ दें तो जेडीयू की बीजेपी सहयोगी रही है. सुशील मोदी डिप्टी सीएम रहे हैं.
सरकार ने हर साल आने वाली इस माहमारी को लेकर कोई सार्थक प्रयास नहीं किए
सरकार दावे और घोषणाएं करती रही है फिर भी मौत का सिलसिला जारी रहा. असल में जब मौतें होती हैं तब सरकार सक्रिय होती है. फिर इस रोग के शिकार बच्चे और पीड़ित के दर्द को सरकार भूल जाती रही है. इसका दोष किस पर दें. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन जब बिहार आए तो 2014 की बात को दोहरा गए. उसके कई दिनों बाद सीएम नीतीश और डिप्टी सीएम गए तो पहले की तरह घोषणाओं की लंबी लिस्ट छोड़ आए.
देखें तो, लंदन के एक जर्नल में लीची को इसकी वजह बताया गया. सरकार भी लीची लीची करने लगी. लेकिन लीची तो बिहार और बिहार के बाहर लोग खाते और उपज करते हैं, लेकिन मुजफ्फरपुर और उसके आसपास की लीची पर तोहमत लगाकर लोग क्यों बचना चाहते हैं. दरअसल, जिस तरह चमकी बुखार से पीड़ित बच्चों के परिवार विचलित हैं, लगता है बिहार सरकार भी उसी बुखार से ग्रसित हो गया है. वह विचलित हो गया है. उसे कुछ सूझ नहीं रहा है.
यह तो चमकी बुखार का लक्षण ही कहा जाएगा कि बिहार के मुखिया नीतीश कुमार 20 जून को लू से प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करने वाले थे. यह अलग बात है कि सोशल मीडिया पर ट्रोल होने के बाद हवाई सर्वेक्षण को रद्द कर दिया और गया में बैठक कर लौट आए.
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तो क्या वाकई Lychee जानलेवा बन चुकी है, जो बच्चों को मौत के घाट उतार रही है?