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Updated: 04 सितम्बर, 2017 03:29 PM
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डोकलाम विवाद भले ही सुलझ गया है, लेकिन इसमें भूटान को क्‍या मिला ? चीन और भारत के बीच तो सुलह हो गई. लेकिन कहीं भारत की तरफ झुककर भूटान ने चीन से दुश्‍मनी तो नहीं मोल ले ली ? चीन यदि भूटान से बदला लेने के लिए कोई नई चाल चलता है, जिसका सीधा नाता भारत से जुड़ा न हो तो क्‍या भारत भूटान का साथ देगा ? अब ये सवाल भूटान के भीतर उभरने लगे हैं. बहस हो रही है कि डोकलाम के लिए भारत ने इतनी तत्‍परता तभी दिखाई, क्‍योंकि मामला उसकी सुरक्षा से जुड़ा था. बात सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर पड़ रहे खतरे की थी. लेकिन चीन लगातार भूटान की सीमा के भीतर अतिक्रमण करता रहा है. यदि निकट भविष्‍य में ऐसी स्थिति आई तो क्‍या भारत भूटान की मदद करेगा ?

चीन की धूर्तता

1990 में चीन भूटान के लिए एक पैकेज डील लेकर आया था. इसमें चीन ने भूटान को डोकलाम के बदले भूटान में ही मौजूद एक विवादित क्षेत्र देने को राजी हो गया था.  जिसे भूटान ने भारत के सुरक्षा हितों को ध्‍यान में रखकर ठुकरा दिया था. इसके बाद चीन ने दोबारा 1996 में कुछ नई शर्तों को जोड़कर डोकलाम को अपने कब्जे में लेने की पेशकश की. इससे पूरे डील में भूटान को ना सिर्फ एक बड़े क्षेत्र पर अपना अधिकार मिल जाता, बल्कि वर्षों से चीन के साथ चला आ रहा सीमा विवाद भी खत्म हो जाता. इस समझौते से भूटान और चीन के रिश्ते को नया आयाम मिल सकता था, जो की अब अमेरिका से लेकर रूस तक को प्राप्त है. लेकिन डोकलाम में भारत की सुरक्षा चिंताओं के कारण भूटान ने उस ऑफर को फिर से ठुकरा दिया.

भूटान के द्वारा 1996 में चीन के प्रस्ताव को ठूकराए जाने के बाद वो और भी अक्रामक हो गया. चीनी सरकार ने बॉर्डर इलाकों में रोड बनवाना शुरू कर दिया. और भूटानी सीमा में आनेवाले क्षेत्रों में अतिक्रमण करने लगा. 2005 के नेशनल असेंबली में भूटान की सरकार ने चीन की एक और चाल को उजागर किया. सरकार के अनुसार चीन भूटान के सीमा से लगते 6 सड़कों का निर्माण करा रहा था. जिसमें से चार तो भूटान के सीमा से काफी अंदर प्रवेश कर चुका था. भूटान के कड़े विरोध के बाद चीन को झुकना पड़ा और उसे सड़क निर्माण रोकना पड़ा. 'फूटगांग रिज' भूटान की सीमा में चीन के द्वारा जबरन कब्जा कर के बनाया गया रोड है. चीन, भारत, डोकलाम, भूटानभारत और भूटान के प्रधानमंत्रीभारत का स्वार्थ

पिछले दिनों एक जुमला बहुत चर्चित हुआ है कि 'भारत ने एक पुराने समझौते के तहत अपने पड़ोसी देश भूटान की मदद के लिए डोकलाम में सैन्य कार्रवाई की है.' लेकिन यह बिल्कुल निराधार है. डोकलाम में भारत की मैजूदगी का कारण उसकी खुद की सुरक्षा है, ना कि भूटान की. भारत ने भूटान में चीनी घूसपैठ का कभी विरोध नहीं किया. यहां तक भूटानी क्षेत्रों में चीन के सड़क बनाने का भी नहीं. मामला साफ है कि वो क्षेत्र डोकलाम की तरह भारत के मतलब का नहीं था. भारत और भूटान के बीच कभी भी सुरक्षा समझौता नहीं हुआ है. दोनों देशों के बीच 1949 और दोबारा 2007 में हुए दोस्ताना समझौते में कही भी सुरक्षा का जिक्र नहीं है. भूटान के पास भारतीय सुरक्षा मदद को 'ना' बोलने का पूरा अधिकार है, जो भारत के लिए इस मामले को और भी पेचीदा बना सकता है. सीधे तौर कहे तो भूटान अपनी फिक्र किए बिना भारत के साथ निस्वार्थ भाव से खड़ा है.

भूटान की बेचारगी

जिस डोकलाम को लेकर इतना विवाद चल रहा है, उसमें भूटान की कोई दिलचस्पी नहीं है. भूटान के लिए यह क्षेत्र न तो कोई रणनीतिक महत्व रखता है, और ना ही आर्थिक महत्व. साल के ज्यादातर समय डोकलाम में बर्फ जमी रहती है. जिसके कारण इस इलाके में खेती भी नहीं की जा सकती है. चीन भूटान के एक बड़े हिस्से पर अपना दावा पेश करता आया है. जो कि 1958 के जवाहर लाल नेहरू के दौरे के समय भूटान के हिस्से का हुआ करता था. अनेक हथकंडो के जरिए दशकों से चीन इस छोटे देश पर डोकलाम को लेकर दबाव बनाता आया है.

हालिया क्रम में भी भूटान के पास इस मामले में भारत को अपनी लाचारगी दिखाकर चीन के समझौते को कबूल करने का विकल्प था. लेकिन इस बार भी भूटान भारत पक्ष में मजबूती के साथ खड़ा रहा. यहां तक कि भूटानी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर के अपना समर्थन दिया. चीन के दबाव के बावजूद भूटान का कदम सराहनीय था.

वैसे तो चीन और भूटान के बीच सालाना तौर पर सीमा को लेकर बातचीत होती है. लेकिन फिलहाल 25वां सीमा सम्मेलन नहीं होने के बाद भी अभी तक चीन का कुछ स्पष्ट रूख सामने नहीं आया है. जब बातचीत फिर से बहाल होगी तो इस पूरे मामले पर चीन का रूख निश्चित तौर पर कड़ा होगा.

डोकलाम विवाद पर भूटान के रूख पर उसके ही देश के कुछ वर्ग के लोगों ने विरोध जताया. भूटान के इस कदम से कुछ लोग को तो यहां तक लग रहा है कि दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ जाएगा. युवा वर्ग ने तो सोशल मीडिया के जरीए भी सरकार पर घरेलू दवाब बनाया. खासतौर से अब, जब 2018 के राष्ट्रीय चुनावों में महज एक साल बाकी है.

( 'द भूटानीज' अखबार के संपादक तेनजिंग लामसेन के लेख का संपादित अंश )

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