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Updated: 11 जून, 2021 12:32 PM
सर्वेश त्रिपाठी
सर्वेश त्रिपाठी
  @advsarveshtripathi
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कल से चर्चाओं का बाज़ार गरम है कि जितिन प्रसाद उत्तर प्रदेश में भाजपा का ब्राह्मण चेहरा हो सकते हैं. इस सब से यही बात फिर से साबित होती है कि मूल्य और सामूहिक लक्ष्यों से प्रेरित राजनीति की बड़ी बड़ी बातें सिद्धांत के स्तर पर ही सही हैं. चुनावी रणनीतियों में इनका प्रयोग उसी तरह होता है जैसे घर को सजाने में लोग गुलदस्तों का प्रयोग करते हैं. कल कांग्रेस के बड़े नेता और राहुल प्रियंका के करीबी माने जाने वाले जितिन प्रसाद भाजपा में शामिल हो गए. उन्होंने भाजपा में शामिल होने से पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और इसके बाद पीयूष गोयल की मौजूदगी में उन्होनें भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली. राजनीतिक हलकों में यह एक बड़ी घटना के रूप में लिया जा रहा है क्योंकि जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने को कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है. वहीं राजनीति के विश्लेषक और जानकर भाजपा के लिए आगामी विधानसभा में इसे ब्राह्मण वोट को साधने के दांव के रूप में भी देख रहे हैं. गौरतलब है कि जितिन प्रसाद कांग्रेस में बड़ी और मजबूत भूमिका में थे.

Jitin Prasad, BJP, Congress, Home Minister, Amit Shah, Brahman, Voteसवाल ये है कि क्या जितिन प्रसाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा का ब्राह्मण चेहरा होने वाले हैं 

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के रहने वाले दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीकॉम करने वाले जितिन प्रसाद को कांग्रेस में साल 2001 में युवा कांग्रेस में सचिव पद की जिम्मेदारी दी गई. इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में जितिन प्रसाद अपनी गृह सीट शाहजहांपुर से जीतकर लोकसभा पहुंचे. साल 2008 में जितिन प्रसाद पर भरोसा जताते हुए उन्हें मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय राज्य इस्पात मंत्री की जिम्मेदारी दी गई.

यही नहीं जितिन प्रसाद कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष समेत अभी हाल में बंगाल के विधानसभा चुनाव में बंगाल के चुनाव प्रभारी के महत्वपूर्ण भूमिका में थे. जितिन प्रसाद के पिता जितेंद्र प्रसाद को भी कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में गिना जाता था. जितेंद्र प्रसाद पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी और नरसिम्हा राव के सलाहकार भी रहे. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट करके जितिन प्रसाद के भाजपा में शामिल होने का स्वागत किया है.

यह माना जा रहा है कि जितिन प्रसाद को उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा को ध्यान में रखते हुए विधान परिषद की सदस्यता समेत संगठन में कोई बड़ा पद दिया जाए. कल से ही उपरोक्त घटनाक्रम को भाजपा के ब्राह्मण कार्ड के रूप में कल से ही मुख्य मीडिया से सोशल मीडिया पर हो रही चर्चाओं में सुना और देखा जा रहा है.

इससे पहले भी हम चुनावों के समय विभिन्न दलों द्वारा जाति और धर्म के कार्ड का इस्तेमाल करते हुए देखते आए है. दलित कार्ड ,यादव कार्ड, मुस्लिम कार्ड और न जाने क्या क्या! फ़िलहाल भारतीय राजनीति में और समाज में जिस जाति और धर्म का प्रयोग वोट बैंक बनाने के लिए किया जाता रहा है. कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दलों ने इसकी फसल भी काटी.

दलित और पिछड़े वर्गों में राजनीतिक और पहचान आधारित चेतना जिसके लिए अस्मितावादी चेतना शब्द भी प्रयोग में लाया जाता है का उभार पिछले तीन दशकों में भारतीय राजनीति व्यवस्था के केंद्र में है. धर्म और जाति के आधार पर हमनें दक्षिण भारत समेत उत्तर भारत में तुष्टिकरण की राजनीति भी देखी.

उत्तर प्रदेश में मायावती बसपा की बसपा और मुलायम सिंह यादव की सपा का राजनीतिक कैरियर भी इसी जातिगत समीकरणों और मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति पर खूब फला फूला. इसी तर्ज पर उत्तरप्रदेश में भाजपा ने भी कुर्मी, निषाद, राजभर, पासवान, मल्लाह आदि जातियों के वोट को अपने पाले में लाने के लिए इन जातियों के बड़े चेहरों को भी अपने पाले में करने में कोई कसर बाकी नहीं लगाई.

हालांकि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता की संख्या का सही अनुमान नहीं है लेकिन ब्राह्मणों के सामाजिक हैसियत और सरकारी पदों से लेकर शिक्षण संस्थाओं और मिडिया आदि महत्वपूर्ण जगहों पर उनकी पहुंच और संख्या के कारण ओपिनियन मेकिंग में इनकी प्रमुख भूमिका रेखांकित की जाती है. यही कारण है कि ब्राह्मणों को तुष्ट करने के लिए और अपने पाले में करने के लिए सपा, बसपा आदि दल परशुराम जयंती समेत उनके मंदिर आदि बनाने के हथकंडे भी आज़मा रहे हैं.

राहुल गांधी का जनेऊ पहनना भी इसी रणनीति का हिस्सा था. यह माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी के क्षत्रिय जाति और कार्यशैली सेब्राह्मण जाति अपने को उपेक्षित महसूस कर रही है. इसी कारण सपा और बसपा बकायदा ब्राह्मणों को अपनी तरफ मिलाने की होड़ कर रही है. संभवतः भाजपा भी इन्हीं कारणों से जितिन प्रसाद की साफ सुथरी छवि और उनके ब्राह्मण होने के साथ युवा होने की काबिलियत को ब्राह्मण मतों को एक जुट कर अपने पाले में रखने का प्रयास करे.

बाकी राजनीति के जानकारों को यह पता ही है कि जितिन प्रसाद का ऐसा कोई सामाजिक आधार नहीं है कि वे क्षेत्र विशेष में मतदाताओं के व्यापक वर्ग को अपनी नेतृत्व क्षमता से प्रभावित कर सके. फ़िलहाल जितिन प्रसाद के भाजपा में आने से भाजपा को कितना फ़ायदा होगा वह तो अगले वर्ष के विधानसभा चुनाव में सबके सम्मुख आ ही जाएगा.

लेकिन यह तथ्य तो निर्विवाद रूप से सत्य है कि भारत की लोकतांत्रिक राजनीति भले ही जनसंख्या के लिहाज़ से विशाल हो लेकिन राजनीतिक परिपक्वता के मामले में और मूल्यों पर आधारित राजनीति के हिसाब से अभी बड़ी नहीं हुई है. जाति, धर्म और चेहरा का झुनझुना थमा कर उसे कभी भी कोई भी राजनीतिक दल जब चाहे भेड़ों के झुंड में बदल सकता है.

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लेखक

सर्वेश त्रिपाठी सर्वेश त्रिपाठी @advsarveshtripathi

लेखक वकील हैं जिन्हें सामाजिक/ राजनीतिक मुद्दों पर लिखना पसंद है.

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