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Updated: 15 अप्रिल, 2019 11:03 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujkumarmaurya87
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समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां ने जया प्रदा पर जो बयान दिया है, उसने विवाद जरूर पैदा किया है, लेकिन इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. भारतीय राजनीति में महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं होती ही रहती हैं. इन घटनाओं को देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय राजनीति महिलाओं के लिए नहीं है. और समाजवादी पार्टी तो बिल्कुल नहीं. आजम खां जैसे नेता के मुंह से किसी महिला के लिए अपशब्द सुनकर तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वो हमेशा से ही इसी तरह की भद्दी बातें करते रहे हैं. आपको बता दें कि आजम खां ने जनता को संबोधित करते हुए कहा था- 'आप लोगों ने 10 साल जिनसे अपना प्रतिनिधित्व कराया, उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लगे, मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनके नीचे का अंडरवियर खाकी रंग का है.' 

पार्टी कोई भी ही, सबने महिलाओं का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. राजनीतिक हमले करने में नेताओं ने महिलाओं के चरित्र तक पर सवाल उठा दिए. भाजपा ने सोनिया गांधी तक पर विवादित बयान दिया, तो वहीं मायावती के खिलाफ भी अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया. आम आदमी पार्टी भी महिलाओं का शोषण करने के आरोप में कई बार घिरी. सोमनाथ भारती ने तो कई बार सरेआम महिलाओं का अपमान किया है. शशि थरूर और दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस नेताओं ने भी महिलाओं का अपमान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. यानी हर पार्टी के लिए राजनीति ही सर्वोपरि है, महिला की आबरू से उन्हें कोई मतलब नहीं. हां वो बात अलग है कि अगर बदजुबानी की रैंकिंग हो तो समाजवादी पार्टी और खासकर आजम खां को पहला स्थान ही मिलेगा.

महिला, राजनीति, लोकसभा चुनाव 2019, आजम खां, जया प्रदाआजम खां ने जया प्रदा पर जो बयान दिया है, उसे लेकर अब विवाद पैदा हो गया है.

आजम खां की जुबान तो हमेशा से गंदी है !

आजम खां ने तो स्मृति ईरानी पर भी गंदा कमेंट किया था. कभी उनका नाम पीएम मोदी के साथ गलत तरीके से जोड़ा तो कभी उन्हें नाचने वाली सुंदरी तक कह डाला. बढ़ते रेप के मामलों की वजह मोबाइल फोन बताया था. बीवियों को मनोरंजन का साधन तक बोल दिया था. वह बोल चुके हैं कि औरतों को कड़ी निगरानी में घर में रखना चाहिए. अब जिस शख्स के विचार इतने गंदे हों, तो उससे और उम्मीद भी क्या की जा सकती है.

महिला आरक्षण बिल भी राजनीति की भेंट चढ़ गया

अगर बात की जाए महिला आरक्षण बिल की तो हर पार्टी चुनावी मौसम में इसकी बात जरूर करती है, लेकिन बाद में सारी बातें हवा हो जाती हैं. यूं लग रहा है जैसे महिला आरक्षण बिल भी बस एक मुद्दा पर है, जिसके नाम पर चुनाव में वोट बटोरे जाते हैं. राज्यसभा में ये बिल पारित हो चुका है, लेकिन लोकसभा में इस पर सहमति नहीं बन रही है. वैसे अगर सिर्फ भाजपा और कांग्रेस ही चाह लेते तो भी ये बिल पारित हो जाता. दरअसल, चाहते तो दोनों हैं, लेकिन ये भी चाहते हैं कि उसका क्रेडिट दूसरी पार्टी को ना मिले, इसी राजनीति के चक्कर में महिला आरक्षण बिल अधर में लटका है. आपको बता दें अगर ये बिल पारित हो जाता है तो लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी.

सिर्फ ताकतवर महिलाएं ही आती हैं राजनीति में

अगर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को ही देख लें तो ये साफ हो जाएगा कि सिर्फ ताकतवर या फिर रुतबे वाली महिलाएं ही राजनीति में आती हैं. बात भले ही सोनिया-मेनका की हो, मायावती हो या फिर डिंपल यादव की, सभी ने राजनीतिक में कदम अपने रुतबे की बदौलत ही रखा है. अगर कोई नई महिला राजनीति में कदम रखना चाहेगी तो उसे बेशक बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. और राजनीति में आना भी तो सुरक्षित नहीं है, जब तक आजम खां जैसे नेता इस राजनीति में हैं.

महिलाओं का हो रहा 'इस्तेमाल'

देखा जाए तो भारतीय राजनीति में महिलाएं अपना अहम रोल नहीं निभा रही हैं, बल्कि पार्टी उनका इस्तेमाल वोट बटोरने के लिए करते ही. पार्टियां अक्सर महिला उम्मीदवारों को सिर्फ दुनिया को दिखांे के लिए चुनावी मैदान में उतारती हैं. पार्टियां दिखांा चाहती हैं कि उनके दिल में महिलाओं के लिए कितनी इज्जत है और इसी बहाने से अपने ही किसी करीबी को राजनीति में ले आते हैं. या फिर उन महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा जाता है जिनकी लोकप्रियता बहुत अधिक है. इन सबके अलावा, भारतीय राजनीति में महिलाओं का इस्तेमाल मर्यादा मर्दन के लिए हो रहा है.

नागालैंड में तो महिला आरक्षण के खिलाफ हुई थी हिंसा

जहां एक ओर महिला आरक्षण बिल अधर में लटका हुआ है, वहीं नागालैंड के स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को आरक्षण देने का सुप्रीम कोर्ट की ओर से आदेश तक जारी हो गया था. इसके तहत 33 फीसदी आरक्षण महिलाओं को मिलना था, जिसकी मांग नागा मदर्स संगठन ने की थी. लेकिन इसका विरोध इतना अधिक हुआ कि उसने हिंसा का रूप ले लिया. इस हिंसा में तो कई लोगों की मौत तक हो गई थी.

सपा नेता आजम खां की बदजुबानी पर सपा की प्रवक्ता जूही सिंह ने कहा है कि पार्टी उनके बयान का समर्थन नहीं करती है. ऐसा बयान देना उचित नहीं है, हर किसी को बदजुबानी बंद करनी चाहिए. सुषमा स्वराज ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि 'मुलायम भाई आप समाजवादी पार्टी के पितामह हैं, आपके सामने द्रौपदी का चीरहरण हो रहा है. आप भीष्म की तरह मौन साधने की गलती ना करें.' उन्होंने ट्वीट में अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव को भी टैग किया है. जया बच्चन को भी सुषमा स्वराज ने टैग किया है. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव और मुलायम सिंह आजम खां के बयान का विरोध करते हैं या नहीं और करते हैं तो क्या कहते हैं.

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