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Updated: 12 अगस्त, 2016 07:40 PM
विनीत कुमार
विनीत कुमार
  @vineet.dubey.98
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'मैं अब वोट नहीं डालता. न 2004 में डाला और न 2009 में. अब मुझे सिस्टम में कोई भरोसा नहीं रहा.' ये शब्द अशोक परमार उर्फ अशोक मोची के थे, 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान. आप सोच रहे होंगे कौन अशोक? तो अब 2002 का गुजरात दंगा याद कीजिए. उस शख्स की तस्वीर याद है न आपको....हाथ में लोहे की रॉड, सिर पर बंधा भगवा कपड़ा और बेहद उग्र मुद्रा.

सियासत कभी किसी की नहीं होती. यह केवल आपका इस्तेमाल करना जानती है. ये बात अशोक परमार से बेहतर कौन समझ पाएगा. वही अशोक परमार- बजरंग दल का पूर्व सदस्य. दंगों के दौरान और बाद में जिसकी तस्वीर पूरी दुनिया के अखबारों और पत्रिकाओं में छपी. लेकिन अब अशोक गोरक्षकों के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे. दूसरे शब्दों में कहें तो गुजरात की बीजेपी सरकार के खिलाफ! मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वह गुजरात में चल रहे 'दलित अस्मिता यात्रा' में शामिल होंगे.

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ऊना में दलितों की पिटाई के खिलाफ ये यात्रा पांच अगस्त को अहमदाबाद से शुरू हुई थी. 15 अगस्त को इसे ऊना पहुंचना है. अशोक कुछ मुस्लिम युवकों के साथ सावरकुंडला में इस यात्रा से जुड़ेंगे.

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 गुजरात दंगों के दौरान अशोक की ये तस्वीर तब मुंबई मिरर के साथ काम कर रहे सेबास्टियन डिसूजा ने ली थी...

कितना अजीब है! अशोक की ये तस्वीर जब दुनिया के सामने आई थी तो गोधरा कांड के बाद उस दौर में वे हिंदुओं के गुस्से के 'चेहरे' के तौर दिखाए गए. हिंसा का एक बदसूरता चेहरा.

लेकिन बदला क्या. अशोक तब भी मोची का काम करते थे, आज भी करते हैं. 41 साल के हो चुके अशोक आज बेघर हैं. अविवाहित हैं और फुटपाथ पर अपनी जिंदगी काट रहे हैं. ये जरूर है कि उनकी जिंदगी में कोर्ट-कचहरी का सिलसिला शुरू हो गया. 2005 में सेशन कोर्ट ने सबूतों के आभाव में उन्हें क्लिन चिट दिया. लेकिन, दिलचस्प ये कि गुजरात सरकार इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट चली गई...और वहां केस अभी चल ही रहा है. अशोक के साथ एक और तस्वीर जो गुजरात दंगों के दौरान दुनिया की नजरों में आई, वो थी- कुतुबुद्दीन अंसारी की. आंखों में आंसू हैं और कुतुबुद्दीन हाथ जोड़ कर माफी मांग रहे हैं..

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2002 के दंगों में कुतुबुद्दीन अंसारी की एक फोटो...

लेकिन समय बदला! अशोक और कुतुबुद्दीन 2014 में चुनाव के दौरान एक साथ और एक मंच पर नजर आए. दोनों ने एक-दूसरे को भाई माना. जिन पर गुजरती है, वो आगे जाकर समझते हैं कि वोट वैंक की सियासत में उनका किस प्रकार इस्तेमाल किया गया. अशोक और कुतुबुद्दीन इसी का उदाहरण हैं.

हाल ही में अशोक ने मीडिया से बात करते हुए बीजेपी सरकार पर निशाना साधा था और कहा था कि गुजरात में गरीबों और दलितों के लिए कुछ नहीं बदला है. सोचिए, रोज कमाने और खाने वाले एक शख्स को दंगों के दौरान तब हाथ में डंडा किसने पकड़ाया होगा. जिसके पास दो जून की रोटी नहीं, उसे 'धर्म' की लड़ाई में कूदने के लिए किसने उकसाया होगा.

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 जब साथ नजर आए अशोक (बाएं) और कुतुबुद्दीन (बीच में)

2014 में चुनाव के दौरान भी जब गुजरात के विकास की बात होती थी तो अशोक ने मुंबई मिरर से बात करते हुए कहा था- 'गुजरात में विकास कहां है. ऐसी बातें करना भी शर्मनाक है. मैं अब भी लाल दरवाजा के पास फुटपाथ पर रहता हूं. मेरी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि शादी कर सकूं और इसलिए अब भी अकेला हूं.' कहने की जरूरत नहीं, कि तब वो किस पर निशाना साध रहे थे. यही नहीं, अशोक ने गुजरात दंगों के लिए माफी तक मांगी और मीडिया की सुर्खियों में आए.

बहरहाल, दंगों के दौरान हिंदू वोटों को समेटने की कोशिश थी अब गाय पर बहस को जन्म देकर भी यही कोशिश हो रही है. लेकिन अशोक परमार जैसों ने कहानी के हर पन्ने को खोल दिया है. आप अपने हिसाब से इसके मायने खोजते रहिए...

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लेखक

विनीत कुमार विनीत कुमार @vineet.dubey.98

लेखक आईचौक.इन में सीनियर सब एडिटर हैं.

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