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Updated: 23 जनवरी, 2022 10:38 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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अमित शाह (Amit Shah) ने डोर टू डोर कैंपेन कैराना से शुरू किया है. बीजेपी नेता के ऐसा करने के कई कारण हैं. बीजेपी लंबे अरसे से कैराना से पलायन का मुद्दा उठाती रही है. 2018 के उपचुनाव में बीजेपी की हार की वजह से भी कैराना चर्चा में रहा - लेकिन गोरखपुर और फूलपुर की तरह 2019 में बीजेपी ने बदला भी ले लिया था.

केंद्रीय गृह मंत्री ने कैराना से पलायन का मुद्दा फिर से उठाया है. ऐसा ही योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने भी कुछ ही दिन पहले किया था. ये बात अलग है कि बीजेपी के ही नेता रहे हुकुम सिंह खुद ही कैराना की घटनाओं को कानून व्यवस्था का मुद्दा बता चुके हैं. पहले हुकुम सिंह ने ही कैराना में पलायन को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की थी.

बीजेपी ने हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को ही कैराना से विधानसभा उम्मीदवार बनाया है. मृगांका सिंह 2018 के कैराना संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में भी बीजेपी प्रत्याशी थीं, लेकिन विपक्ष के सपोर्ट से चुनाव लड़ने वाली समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार की जीत हुई थी.

कैराना की अहमियत: कैराना में 10 फरवरी को वोटिंग होनी है, लिहाजा शुरुआत अमित शाह ने कैराना से ही की है. कैराना से जो बात निकली है दूर तक जाएगी ही, कम से कम बीजेपी तो ऐसा ही मान कर चल रही है.

हिंदुओं के पलायन के बहाने बीजेपी का कैराना को भी एक मॉडल के तौर पर पेश करती रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दौरे के बाद एक चुनावी रैली में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की टिप्पणी थी, 'बाबा योगी अगर उत्तराखंड से पलायन नहीं किए होते तो यूपी के पांच साल खराब नहीं हुए होते,' - और यही वजह है कि अमित शाह, अखिलेश यादव के साथ साथ मायावती से भी उनकी सरकारों में हुए काम का हिसाब देने को कह रहे हैं.

पश्चिम यूपी में बीजेपी के प्रति किसानों की नाराजगी के बीच कैराना हल्की सी राहत दे सकता है. यही वजह है कि पश्चिम यूपी का काम अमित शाह ने अपने हाथ में ले रखा है. बाकी यूपी का दो तिहाई हिस्सा राजनाथ सिंह और जेपी नड्डा के बीच आधा आधा बंटा हुआ है. योगी आदित्यनाथ वाले हिस्से की जिम्मेदारी बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के पास है जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इलाका रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के हवाले है - वैसे भी वो वाराणसी से काट कर बनाये गये चंदौली से ही आते हैं.

बाकी बातों के बीच अमित शाह के मेरठ में दिये भाषण में एक ऐसी बात सुनने को मिली है जो योगी आदित्यनाथ के खिलाफ भले न हो, लेकिन फेवर में तो नहीं ही लगती है - और वो है यूपी के लोगों से वोट मांगने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फ्रंट पर प्रोजेक्ट न करना, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के नाम पर वोट मांगना. ये वही योगी आदित्यनाथ हैं जो देश भर में बीजेपी के स्टार प्रचारक और हिंदुत्व की राजनीति के आइकॉन बने रहते हैं.

योगी के नाम पर वोट मांगने में क्या दिक्कत है?

ऐसा भी नहीं कि यूपी चुनाव में अमित शाह ने पहली बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पीछे कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगा है - बीजेपी के चुनाव कैंपेन के शुरुआती दौर में ही अमित शाह ने लखनऊ रैली में उत्तर प्रदेश के लोगों से मोदी के नाम पर वोट देने की अपील की थी.

yogi adityanath, amit shah, narendra modiक्या यूपी में योगी आदित्यनाथ को सत्ता विरोधी लहर से बचाने के लिए बीजेपी नेतृत्व अलग तरकीब अपना रहा है?

लेकिन लखनऊ रैली में मोदी के नाम पर अपील और मेरठ में वोट मांगने के लहजे में काफी फर्क है. लखनऊ में तो अमित शाह ने वोट योगी आदित्यनाथ का नाम लेकर ही मांगा था, बस ये जोड़ दिया था कि यूपी के लोग ऐसा इसलिए करें ताकि 2024 के आम चुनाव में भी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने की गारंटी बनी रहे - मेरठ में तो ऐसा लगा जैसे योगी आदित्यनाथ कहीं मैदान में ही नहीं हों.

2019 में मिल चुका है मोदी को वोट: अमित शाह समझा रहे हैं कि ये चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का चुनाव नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश का भाग्य तय करने का चुनाव है - लेकिन सवाल ये है कि क्या योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश का भाग्य तय करने में सक्षम नहीं हैं या फिर बीते पांच साल में भी वो ऐसा नहीं कर पाये हैं?

अमित शाह बोले, 'जब-जब भी मैं मेरठ आता हूं... तब-तब ऊर्जा प्राप्त करता हूं... ये भूमि महाभारत काल से संदेश देती आई है... यूपी भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है... अगर राज्य का हर व्यक्ति खुश नहीं है, तो इसका मतलब है कि देश खुश नहीं होगा.' बात बिलकुल सही है.

फिर अमित शाह कहते हैं, 'प्रत्‍याशी, मंत्री या मुख्‍यमंत्री को मत देखिये... मोदी जी की तरफ देखिये - और उत्‍तर प्रदेश को उत्‍तम प्रदेश बनाने के लिए मोदी जी को वोट दीजिये.'

मान लेते हैं, लेकिन पांच साल पहले भी तो उत्तम प्रदेश बनाने के लिए ही लोगों ने बीजेपी को वोट दिया था - और तब भी मोदी के नाम पर ही दिया था क्योंकि तब तो योगी आदित्यनाथ सीन में कहीं थे ही नहीं.

वोट देने को लेकर अमित शाह यूपी के लोगों से कह रहे हैं, 'भारत माता का चित्र - और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा देख कर दीजिये.'

आखिर भारत माता के चित्र और मोदी के चेहरे के बीच में या आगे पीछे योगी आदित्यनाथ क्यों नहीं हैं - सबसे बड़ा सवाल यही है और ये भी कि अगर योगी आदित्यनाथ नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं?

यूपी के लोग 2014 के आम चुनाव में मोदी के नाम पर वोट दिये, 2017 के विधानसभा चुनाव में मोदी के नाम पर वोट दिये, फिर 2019 के आम चुनाव में भी मोदी के नाम पर वोट दिये - लेकिन जब पांच साल से योगी आदित्यनाथ यूपी के मुख्यमंत्री हैं तो लोग उनको क्यों इग्नोर करेंगे?

जब यूपी देश में बेस्ट है: यूपी में चुनावी बिगुल बजाते हुए बनारस की उसी धरती से योगी आदित्यनाथ को कर्मयोगी कह कर बुलाया और कोरोना कंट्रोल के वाराणसी मॉडल का नाम तक नहीं लिया. फिर भी दावा किया कि कोरोना संकट काल में योगी आदित्यनाथ का काम शानदार रहा - कुछ ही दिन पहले उत्तर प्रदेश के लिए योगी आदित्यनाथ को UPYOGI के तौर पर प्रोजेक्ट किया.

चाहे वो विकास के काम रहे हों या फिर कानून-व्यवस्था के मामले में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह यूपी के हर दौरे में अलग अलग तरीके से समझा चुके हैं कि यूपी में हर मामले में देश में बेस्ट है - लेकिन अगर ऐसा है तो क्या वो योगी आदित्यनाथ की वजह से नहीं है?

और अगर यूपी में लोगों से एमएलए, मंत्री और मुख्यमंत्री के नाम पर वोट मांगने में कोई खतरा समझ में आ रहा है, फिर तो योगी आदित्यनाथ को लेकर प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह दोनों के दावों पर सहज तौर पर संदेह पैदा होता है - है कि नहीं?

योगी को मोदी से पीछे रखने की रणनीति क्यों?

मान लेते हैं कि इंडिया टुडे और सी वोटर के 'मूड ऑफ द नेशन' सर्वे में योगी आदित्यनाथ के मुकाबले प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज को ज्यादा लोगों ने बेहतर बताया है - और योगी की तुलना में मोदी को बेहतर बताने वालों की तादाद भी ज्यादा है.

सर्वे में शामिल, करीब 49 फीसदी लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन को लेकर संतोष जता रहे हैं, लेकिन करीब 17 फीसदी लोग ऐसे भी हैं जो योगी सरकार के कामकाज से थोड़े असंतुष्ट बताये जा रहे हैं - हां, 34 फीसदी लोगों ने खुल कर योगी आदित्यनाथ के कामकाज को लेकर असंतोष भी जाहिर किया है.

प्रधानमंत्री मोदी को बेहतरीन बताने वाले ऐसे 75 फीसदी लोग हैं, लेकिन यूपी में पिछले पांच साल में जो कोरोना संकट के अलावा भी हो जो हाल प्रत्यक्ष तौर पर देखने को मिला है, उसमें 49 फीसदी लोगों का संतोष कम भी तो नहीं कहा जा सकता.

योगी सीएम हैं या मोदी के मैनेजर: योगी आदित्यनाथ का नाम बस तभी लिया जा रहा है जब अखिलेश यादव और मायावती सरकारों से तुलना करनी होती है - और वो भी सुन कर ऐसा लगता है जैसे बीजेपी ने यूपी में मुख्यमंत्री नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए कोई 'मैनेजर' रख दिया था, जो उनके मनमाफिक काम करता रहा - और आगे भी ऐसे ही होना है.

क्या ये सब सुन कर ऐसा नहीं लगता है जैसे जैसे सूबे की सरकार चलाने में योगी आदित्यनाथ का कोई योगदान ही न हो? कोई भूमिका ही न रही हो? जैसे योगी आदित्यनाथ में सरकार चलाने की कोई काबिलियत ही न हो?

ऐसे तमाम सवाल हैं जो बरबस उठ खड़े हो रहे हैं. अरे, ऐसे आरोप तो योगी आदित्यनाथ के कुछ विरोधी और ओपी राजभर जैसे नेता लगाते रहे हैं. ये कह कर कि योगी आदित्यनाथ सिर्फ नौकरशाहों के इशारों पर दस्तखत करते रहे हैं - जैसे कोई रबर स्टांप मुख्यमंत्री हों.

ऐसे तो कभी हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर और झारखंड में रघुबर दास को भी नहीं प्रोजेक्ट किया गया होगा - यहां तक कि बिहार चुनाव में भी नीतीश कुमार को भी ऐसे नहीं डाउनप्ले किया गया.

फिर योगी आदित्यनाथ के साथ ऐसा क्यों हो रहा है?

ये कौन सी रणनीति का हिस्सा है: क्या ये योगी आदित्यनाथ के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर की काट के तौर पर किसी खास रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है?

2019 के आम चुनाव में भी प्रधानमंत्री मोदी लोगों को कुछ ऐसा ही समझाने की कोशिश कर रहे थे कि लोग अपने इलाके के सांसदों को लेकर सोच विचार में न पड़ें, बल्कि ये सोच कर बीजेपी को वोट दें कि वो सीधे मोदी को मिल रहा है. 2014 के आम चुनाव के आखिरी दौर में भी ब्रांड मोदी को कुछ कुछ ऐसे ही प्रोजेक्ट किया गया - भाइयों और बहनों मेरी तरफ देखो... मुझे वोट दो!

1. क्या बीजेपी नेतृत्व ने ये स्ट्रैटेजी कहीं स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके साथ पार्टी छोड़ कर सियासी दुश्मन समाजवादी पार्टी में चले गये नेताओं के दुष्प्रभाव को न्यूट्रलाइज करने का कोई तरीका तो नहीं खोजा है?

2. ऐसा तो नहीं कि लखीमपुर खीरी हिंसा में निशाने पर आये केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी या ऐसे दूसरी कमजोर कड़ियों के बचाव के लिए ये तरकीब निकाली गयी हो?

3. कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्नाव जैसे इलाके में कांग्रेस उम्मीदवार आशा सिंह का प्रभाव कम करने और बलात्कारी कुलदीप सेंगर की करतूतों को इलाके के लोगों के दिमाग से हटाने के लिए ये नुस्खा खोजा गया है?

4. क्या ये सब योगी आदित्यनाथ के साथ मोदी-शाह के टकराव का साइड इफेक्ट भी हो सकता है? योगी आदित्यनाथ की जिद को लेकर पूर्व नौकरशाह अरविंद शर्मा प्रकरण में बीजेपी नेतृत्व की नाराजगी तो महसूस की ही गयी है - और वो इतनी आसानी से खत्म भी नहीं होने वाली है.

ऐसा क्यों लगता है कि ऐसी ही खास परिस्थितियों में योगी आदित्यनाथ को बिना मतलब चुनाव मैदान में उतार दिया गया हो - औरे जैसे गोरखपुर और आस पास के इलाकों तक समेट कर रखने की कोशिश हो?

5. क्या ये योगी आदित्यनाथ को डिस्क्रेडिट करने की कोई कवायद भी हो सकती है? जैसा व्यवहार 2020 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार के साथ हुआ और चुनाव नतीजे आने के बाद योगी आदित्यनाथ को ये बताया और जताया जा सके कि बीजेपी ने यूपी चुनाव उनके नाम पर नहीं जीता है - लिहाजा वो अपने हद में रहें.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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