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Updated: 07 जून, 2020 01:29 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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अमित शाह (Amit Shah) की डिजिटल रैली (Digital Rally) को बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी का बिगुल समझा जा रहा है. हालांकि, तकनीकी तौर पर ये कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की दूसरी पारी के एक साल पूरे होने के उपलक्ष्य में हो रहा है. बताते हैं कि ऐसे कार्यक्रम महीना भर चलते रहेंगे, लेकिन बिहार से शुरुआत में भी तो संदेश छिपा ही है.

बीजेपी ने अमित शाह की वर्चुअल रैली को बिहार जनसंवाद नाम दिया है. जब देश में सारा कामकाज और राजनीति भी वर्चुअल हो रहा हो तो चुनावी मुहिम ऐसे शुरू क्यों नहीं हो सकती? केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस प्रोग्राम में पूरी कोशिश है कि वास्तविक रैली का फील आये - और उसी हिसाब से तैयारियां चल रही हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव के समय पर होने को लेकर अब भी अगर कोई आशंका हो तो वो कम हो जानी चाहिये, या कहें कि खत्म ही हो जानी चाहिये. जब तक महाराष्ट्र में विधान परिषद की खाली पड़ी 9 सीटों का चुनाव नहीं हुआ था ऐसी आशंका बनी हुई थी कि बिहार चुनाव का समय भी हो सकता है टल जाये. अब तो 19 मई राज्य सभा के भी चुनाव होने जा रहे हैं - मध्य प्रदेश में उपचुनावों की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं.

मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 29 नवंबर को खत्म हो रहा है. अब जबकि कोरोना महामारी के चलते चुनाव आयोग की चुनाव कराये जाने पर रोक जैसी कोई चीज नहीं है, फिर तो मान कर चलना चाहिये कि बिहार विधानसभा के चुनाव समय पर ही होने चाहिये - ऐसे में अमित शाह की डिजिटल रैली भी तो चुनाव को लेकर एक मजबूत इशारा कर ही रही है.

चुनावी रैली क्यों न समझें

7 जून को शाम 4 बजे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के 'बिहार जनसंवाद' कार्यक्रम के लिए व्हाट्सऐप, फेसबुक, एसएमएस, ट्विटर और टेलीग्राम सहित सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म के जरिये बीजेपी कार्यकर्ताओं को लिंक भेजा जा रहा है.

'बीजेपी फॉर बिहार लाइव' कार्यक्रम के जरिये 72 हजार बूथों के साथ साथ 45 जिलों के 9547 शक्ति केंद्रों, 1099 मंडलों में बीजेपी कार्यकर्ता अमित शाह का संबोधन सुन पायें, ऐसी तैयारी हो रही है. ये 72 हजार बूथ बिहार विधानसभा के 243 विधानसभा क्षेत्रों में फैले हुए हैं.

बीजेपी की तैयारियों के बीच बताया तो यही गया है कि हर विधानसभा क्षेत्र में 4 से 5 हजार लोगों को इस कार्यक्रम से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है - साथ ही साथ, ये भी सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी सूरत में 50 से ज्यादा लोग किसी भी जगह इकट्ठा न हो पायें.

बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी का कहना है कि चूंकि लॉकडाउन की स्थिति बनी हुई है इसीलिए डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल किया जा रहा है. कहते हैं, वैसे भी एक रैली में 40 से 50 लाख रुपये खर्च होते हैं, लेकिन इसमें तो 1 लाख भी नहीं लगेगा - बिहार में जनसंख्या 12 करोड़ है और मोबाइल फोन 9 करोड़.'

अमित शाह अभी तक कोरोना वायरस से जंग और लॉकडाउन को लेकर मुख्यमंत्रियों और अधिकारियों से ऐसी वर्चुअल मीटिंग करते रहे, लेकिन लोगों से सीधे संवाद का हाल फिलहाल ये पहला कार्यक्रम है. 2014 के आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गूगल हैंगआउट पर लोगों से सीधा संवाद किया था और ऐसा करने वाले वो अपने समकालीन नेताओं में पहले रहे हैं.

nitish kumar, amit shahअमित शाह की रैली बिहार विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी के अभियान की शुरुआत है

अमित शाह सबसे पहले बिहार के लोगों से ही सीधा संवाद कर रहे हैं. शुरुआत तो कहीं से भी होनी ही थी. ऐसा भी नहीं है कि बिहार में कोरोना संकट पर पूरी तरह काबू पा लिया गया हो, टेस्टिंग के हिसाब से बिहार में कोरोना संक्रमण की संख्या में इजाफा ही दर्ज हुआ है.

बिहार से ऐसे संवाद की शुरुआत की चुनाव के अलावा कोई वजह तो समझ नहीं आ रही है. या तो अमित शाह महाराष्ट्र के लोगों से संवाद करते जहां सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमण के शिकार लोग हैं. वो गुजरात के लोगों से भी ऐसा कर सकते थे. वो आते भी वहीं से हैं और गुजरात के ही गांधी नगर लोक सभा सीट से सांसद हैं. दिल्ली, तमिलनाडु या ऐसा कोई दूसरा राज्य भी हो सकता था.

अगर ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के एक साल पूरे होने के उपलक्ष्य में होने वाला कार्यक्रम है, फिर तो बेहतर होता शुरुआत उत्तर प्रदेश से होती. प्रधानमंत्री मोदी का निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी भी तो यूपी में ही पड़ता है. प्रधानमंत्री ने तो 21 दिन के संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा के बाद वाराणसी के लोगों से ही संवाद किया था.

फिर भी अगर अमित शाह के इस लोक संवाद कार्यक्रम की शुरुआत बिहार से ही हो रही है तो ये मान कर चलना चाहिये कि बिहार में विधानसभा चुनाव के टलने का अब कोई स्कोप नहीं बचा है. लॉकडाउन के चार चरण के बाद अनलॉक का पहला चरण है और जैसे जैसे हालात सामान्य होने लगेंगे अनलॉक भी खत्म हो जाएगा.

अब तो हालात के सामान्य होने को अर्थव्यवस्था से ही जोड़कर देखा जा रहा है क्योंकि कोरोना वायरस संक्रमण की संख्या तो तेजी से बढ़ रही है. लॉकडाउन लागू करते वक्त प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि 'जान है तो जहान है' लेकिन जैसे ही थोड़ा समय गुजरा स्लोगन बदल दिये - जान भी जहान भी. फिलहाल तो सारी व्यवस्था इसी स्लोगन के इर्द गिर्द घूम रही है.

अमित शाह की रैली के साथ ही नीतीश कुमार भी जे़डीयू कार्यकर्ताओं के साथ वर्चुअल संवाद की तैयारी कर रहे हैं - और ठीक उसी वक्त बिहार की अंदरूनी राजनीति भी डिजिटल शक्ल ले चुकी है.

लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान का एक ताजा बयान बिहार में चर्चा के केंद्र में है. चिराग पासवान ने बिहार में एनडीए के नेता को लेकर अपनी बात अमित शाह की रैली से दो दिन पहले कही है.

चिराग पासवान ने कहा है कि बिहार में एनडीए का नेता कौन होगा ये बीजेपी तय करेगी. वैसे तो चिराग पासवान की इस बात का कोई मतलब नहीं है क्योंकि खुद अमित शाह ही एक से ज्यादा बार कह चुके हैं कि बिहार में विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में और पूरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा. फिर भी झारखंड चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू चुनाव मैदान में उतरी थी, लेकिन ये भी देखा गया कि बाद में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और अमित शाह ने एक चुनावी रैली में मंच भी साझा किया.

माना जा रहा है कि जब अमित शाह बिहार के लोगों से मुखातिब होंगे - नीतीश कुमार को एनडीए के अगले मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में भी प्रोजेक्ट करेंगे. ये नीतीश कुमार के नेतृत्व पर एक औपचारिकता मात्र होगी.

चुनावी तैयारियों में सभी जुट गये हैं

अमित शाह की रैली से बिहार में विपक्षी दल आरजेडी के भी कान खड़े हो गये हैं - और ठीक उसी वक्त तेजस्वी यादव ने 'गरीब अधिकार दिवस' मनाने की घोषणा कर रखी है. महागठबंधन के नेताओं की भी जगह जगह मीटिंग होने लगी है - और एक तैयारी तो ऐसी भी चल रही है कि कैसे कांग्रेस के नेतृत्व में आरजेडी को दूर रख कर महागठबंधन खड़ा किया जाये. मुश्किल ये है कि आरजेडी को हटा देने के बाद जीतन राम मांझी, उपेद्र कुशवाहा और मुकेश साहनी जैसे नेता बच रहे हैं जिनका जनाधार क्या है सबको पता है. जीतन राम मांझी एक बार फिर बड़े बड़े दावे कर रहे हैं. मसलन, नीतीश कुमार को महागठबंधन ज्वाइन करने तक का न्योता दे रहे हैं. ऐसे ही हवाई दावे मांझी 2015 में भी कर रहे थे, लेकिन चुनाव नतीजे आये तो चारों खाने चित्त नजर आये.

जिस तरीके से डिजिटल रैली होने जा रही है, जेडीयू से निकाले जाने और फिर लॉकडाउन लागू हो जाने के बाद प्रशांत किशोर भी वर्चुअल राजनीति कर रहे हैं. ट्विटर के जरिये वो कभी नीतीश कुमार तो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोरोना वायरस से जंग में खामियां बताकर घेरते रहे हैं.

जैसे प्रशांत किशोर चुनाव को देखते हुए बात बिहार की मुहिम चला रहे थे, बेगूसराय से सीपीआई के टिकट पर लोक सभा का चुनाव लड़ चुके कन्हैया कुमार भी राज्यव्यापी यात्रा पर निकले हुए थे. लॉकडाउन लागू हो जाने के बाद ये सारे कार्यक्रम बंद हो गये.

द प्रिंट वेबसाइट ने हाल ही में पूछा था - सवाल उठ रहे हैं कि लॉकडाउन के दौरान लेफ्ट के चेहरे कन्हैया कुमार कहां हैं?

जवाब में कन्हैया कुमार का कहना रहा, ‘मेरा मन करता है कि कहूं कि मैं स्वास्थ्य मंत्री के साथ लूडो खेल रहा हूं.’ फिर कन्हैया कुमार ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों के बारे में भी बताया, ‘लॉकडाउन में किसी तरह की रैली या धरना तो संभव नहीं है. कोरोना काल में परंपरागत राजनीति की कोई जगह तो रही नहीं. ऐसे में हम बेगूसराय के लोगों की मदद कर रहे हैं. फॉर्म भरवाने हों या उनके खाने-पीने के इंतजाम करने हों. अगर रेलें भटक रही हैं तो सवाल रेल मंत्री से होगा ना. ना कि विपक्ष से.’

ये तो साफ है कि बिहार में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपने अपने तरीके से तैयारियों में जुट गया है. गौर करने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अमित शाह बिहार के 72 हजार बूथों पर लाइव होंगे - आखिर बूथ लेवल चुनाव प्रबंधन ही तो अमित शाह की कामयाबी का सबसे कारगर नुस्खा है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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