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Updated: 15 सितम्बर, 2021 07:24 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुद्दे जनता से दूर होते जा रहे हैं - क्योंकि बहस राजनीतिक एजेंडे के इर्द-गिर्द सिमटती सी नजर आ रही है. आगे जो भी हो, फिलहाल तो ऐसा ही लगता है.

लोक पक्ष को अगर थोड़ी देर के लिए अलग रख कर भी देंखें तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही तकरार भी एक तरफा होती जा रही है. मौके तमाम मिल रहे हैं, लेकिन विपक्ष सत्ता पक्ष को घेर लेने वाली स्थिति में कम ही दिखाई पड़ रहा है - और सत्ता पक्ष की गलतियों को पर फोकस होने की जगह, विपक्ष सियासी चालों में फंस कर उन मुद्दों पर भी सफाई देता फिर रहा है जिन पर वो सत्ताधारी बीजेपी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) को कठघरे में खड़ा कर सकता है, बशर्ते जो दावे किये जाने रहे हैं वे हकीकत से मेल भी खा रहे हों.

ये तो पश्चिम बंगाल चुनावों के नतीजे आने के कुछ दिन बाद ही साफ हो चुका था कि यूपी चुनाव में इस बार भी 2017 जैसा ही शोर सुनाई देगा - श्मशान-कब्रिस्तान 2.0, लेकिन अब तो लगने लगा है कि बात इतनी बढ़ चुकी है कि चुनाव की तारीखों के ऐलान होते होते वे चीजें काफी पीछे छूट चुकी होंगी.

बिहार और बंगाल चुनाव तक तो पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की याद दिलाने से ही काम चल जाता रहा. अफगानिस्तान में हुए तमाम बदलावों के बाद तो लगा ज्यादा से ज्यादा पाकिस्तान के साथ तालिबान को जोड़ लिया जाएगा, लेकिन बात उससे भी काफी आगे बढ़ चुकी है.

ये भी समझ आ ही गया था कि 2019 के आम चुनाव की तरह संघ, वीएचपी जैसे हिंदूवादी संगठन और बीजेपी होल्ड तो नहीं ही करने वाले हैं, बल्कि बढ़ चढ़ कर क्रेडिट लेने और रूकावट डालने के नाम पर राजनीतिक विरोधियों को जी भर कर कोसने की कवायद भी चलती ही रहेगी.

लेकिन एक कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के आरोपों के जवाब में जिस अंदाज में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न सिर्फ रिएक्ट किया, बल्कि 'अब्बाजान' (Abbajaan) बोल कर समाजवादी नेता के पिता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को लपेट लिया - 2022 के विधानसभा चुनाव में मुद्दे और बहस की दशा और दिशा काफी हद तक साफ हो गयी.

और उसके बाद से ही चुनावी बहस अब्बाजान के इर्द-गिर्द ही घूमती नजर आ रही है - क्या वास्तव में विपक्ष के पास मुद्दों की कमी पड़ रही है या मुद्दों को प्रजेंट करने में कोई खास अड़चन आ रही है?

विपक्षी खेमे से योगी आदित्यनाथ को चुनौती देने के मामले में नेतृत्व करते समझे जाने वाले अखिलेश यादव जो दावे करते हैं, उसकी जगह सफाई में कही गयीं बातें ही क्यों ज्यादा सुनायी देती हैं? बड़ा सवाल ये है कि यूपी चुनाव में एजेंडा कौन सेट कर रहा है - और क्या वो लोकहित में सही है?

एजेंडा बीजेपी ही क्यों सेट कर रही है?

उत्तर प्रदेश में अभी अब्बाजान पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चल ही रहा था कि बीच में किसान नेता राकेश टिकैत भी कूद पड़े - और AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी को बीजेपी का चचाजान तक बता डाला है.

बागपत में भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने समझाने की कोशिश की कि किसान तो अपना फैसला ले चुका है, लेकिन बीजेपी के चचाजान ओवैसी के आ जाने से उसे कोई दिक्कत नहीं होगी क्योंकि वो धर्म के नाम पर बांटने का प्रयास करेंगे जो बीजेपी चाहती है - लेकिन किसान अपनी मांगे पूरी नहीं किये जाने से बीजेपी को सत्ता से बाहर करने का फैसला ले चुके हैं.

yogi adityanath, akhilesh yadavमौके ऐसे ही गंवाते रहे अखिलेश यादव तो योगी आदित्यनाथ महफिल यूं ही लूट लेंगे!

अगस्त, 2021 के शुरू में लखनऊ में इंडिया टुडे के एक ही कार्यक्रम में अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ आगे पीछे ही गेस्ट बन कर पहुंचे थे. योगी आदित्यनाथ सरकार को कोरोना संकट के दौरान कामकाज के लिए प्रधानमंत्री न सिर्फ क्लीन चिट दिये, बल्कि तारीफों के भी पुल बांधते रहे. कानून व्यवस्था को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी योगी आदित्यनाथ की पीठ थपथपाते ही रहते हैं.

बातचीत में ये बातें उठने पर अखिलेश यादव ने दावा किया, 'भारतीय जनता पार्टी झूठा प्रचार कर रही है कि उत्तर प्रदेश का लॉ एंड ऑर्डर बेहतर है - झूठ बोलने में भाजपा नंबर वन है.' अखिलेश यादव रुके नहीं बल्कि गिनाने शुरू कर दिये, 'बीजेपी हमेशा झूठ बोलती है... बेरोजगारी के मामले में उत्तर प्रदेश नंबर 1 है... कुपोषण के मामले में उत्तर प्रदेश नंबर 1 है... भूखमरी से मरने वाली मौत के मामले में उत्तर प्रदेश नंबर वन है... आपकी सरकार ने एक भी बिजली का प्लांट नहीं लगाया... आपकी सरकार ने किसानों की कर्जमाफी नहीं की... आपने सिर्फ शिलान्यास अपने नाम किये हैं - अभी तक उद्घाटन नहीं कर पाये और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे का क्रेडिट भी ले लिये.'

जब योगी आदित्यनाथ पहुंचे तो अखिलेश यादव के आरोपों की तरफ ध्यान खींचा गया. फिर क्या था योगी आदित्यनाथ अलग ही शुरू हो गये और एक ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया कि उसके बाद तो नयी बहस का छिड़ जाना पक्का हो गया - अब्बाजान. जाहिर है योगी आदित्यनाथ को इसे आगे तो बढ़ाना ही बस एक सही मंच की तलाश थी.

योगी आदित्यनाथ बोले, 'देखिये... हमने कहा था रामलला हम आएंगे, मंदिर वही बनाएंगे... ये हमी ने कहा था और हमने कितना सच किया है... आज जब अयोध्या में राम जन्मभूमि की भव्य मंदिर निर्माण का कार्य शुभारंभ हो चुका है,' - और फिर फौरन ही बोल पड़े, 'उनके अब्बाजान तो कहते थे कि परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा.'

योगी आदित्यनाथ ने अपना एजेंडा आगे बढ़ा दिया - और अखिलेश यादव एक ही बात पर कई बार बोल चुके हैं. पहले तो सिर्फ इतना ही कहा था कि वो उनके पिता के बारे में कुछ न कहें, वरना उनके पास भी योगी आदित्यनाथ के पिता के बारे में बोलने के लिए बहुत कुछ मिल जाएगा.

उसके बाद जब समाजवादी पार्टी की तरफ से आपत्ति जतायी गयी तो, बीजेपी ने सवाल खड़े कर दिये कि अखिलेश यादव को तो उनके पिता टीपू कहते हैं, तो उस पर क्यों नहीं आपत्ति जताते. टीपू नाम याद दिलाकर बीजेपी ने टीपू सुल्तान की ही तरफ इशारा किया था.

अब योगी आदित्यनाथ जहां भी जा रहे हैं, करीब करीब अपने पुराने रौ में अयोध्या में बन रहे राम मंदिर का जिक्र जरूर करते हैं और ऐसे अंदाज में पेश करते हैं कि लोगों के कानों में अब्बाजान गूंजने ही लगे.

ऐसे ही एक मौके पर योगी आदित्यनाथ ने सवाल किया, 'जिन लोगों ने रामसेवकों पर गोलियां चलवाईं, वे राम मंदिर बनवाएंगे?'

योगी आदित्यनाथ का ये कहना भर होता है कि बीजेपी के वोटर तक संदेश पहुंच जाता है क्योंकि गोलियां चलवाने का जिक्र अब्बाजान को भूलने न देने के लिए ही होता है. बीच बीच में अखिलेश यादव को संतों और मंदिरों के दर्शन की तस्वीरें शेयर करते भी देखा जाता है, लेकिन योगी आदित्यनाथ ये समझाना शुरू कर देते हैं के किये लोग फर्जी राम भक्त और कृष्ण भक्त हैं - और बोल भी देते हैं, अखिलेश यादव जैसे नेता मुस्लिम वोट बैंक को नाराज न करने के डर से मंदिर नहीं जाते थे.

मालूम नहीं अखिलेश यादव और उनके सलाहकार समझ पाते भी हैं कि नहीं कि योगी आदित्यनाथ तो बस उकसा कर अपनी बातों में उलझाये रखना चाहते हैं. बिलकुल जैसा वो चाहते हैं, अखिलेश यादव की तरफ से भी वैसी ही हरकतें शुरू हो जाती हैं. मुश्किल ये है कि जो चीजें अखिलेश यादव नजरअंदाज कर सकते हैं उस पर सफाई देने लगते हैं और जिन मुद्दों पर योगी आदित्यनाथ की सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं उस पर बस दो लाइन बोल कर आगे बढ़ जाते हैं.

अखिलेश यादव भी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला कर राकेश टिकैत की तरह ही आने वाले चुनावों में बीजेपी की हार का दावा करते हैं, 'भारतीय जनता पार्टी की सरकार का जाना तय है... इसीलिए सरकार के मुखिया की भाषा बदल गई है.' और फिर दावा करते हैं, 'उनकी भाषा इसीलिए बदल गई है क्योंकि उत्तर प्रदेश की जनता अब बदलाव चाहती है... खुशहाली चाहती है... जिस तरह से काम समाजवादी सरकार में हो रहे थे... जनता वो सब दोबारा चाहती है.'

अभी अखिलेश यादव को लोग समझने की कोशिश कर रहे होते हैं कि कुशीनगर में योगी आदित्यनाथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाली स्टाइल में सवाल-जवाब शुरू कर देते हैं, 'क्या ये राशन 2017 के पहले भी मिलता था?'

और तत्काल ही बगैर किसी बहाने के अपने एजेंडे पर आ जाते हैं, '...क्योंकि तब तो अब्बाजान कहने वाले राशन हजम कर जाते थे... तब कुशीनगर का राशन नेपाल पहुंच जाता था... बांग्लादेश पहुंच जाता था.'

मौका को विपक्ष को भी पूरा मिल रहा है

जिस तरीके से केंद्रीय गृह मंत्री लखनऊ दौरे में यूपी के कानून व्यवस्था के बारे में समझा गये थे, योगी आदित्यनाथ अब जहां भी जा रहे हैं बस दोहरा देते हैं. अलीगढ़ के कार्यक्रम में योगी आदित्यनाथ का भाषण चल रहा था, 'पहले उत्तर प्रदेश की पहचान अपराध और गड्ढों से होती थी... पहले हमारी बहनें और बेटियां सुरक्षित नहीं थीं... यहां तक कि भैंस और बैल भी सुरक्षित नहीं थे. आज ऐसा नहीं है.' योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषण में बस पशुओं की सुरक्षा का मामला जोड़ दिया है, बाकी सब वही है.

अलीगढ़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी योगी आदित्यनाथ और अमित शाह की बातों को ही एनडोर्स किया, 'एक दौर था जब शासन प्रशासन गुंडों और माफियाओं की मनमानी से चलता था - लेकिन अब वसूली करने वाले माफिया राज चलाने वाले सलाखों के पीछे हैं.'

जब अखिलेश यादव से मीडिया ने रिएक्शन चाहा तो अखिलेश यादव ने बीजेपी सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर डाला, लेकिन उसके आगे वो और उनकी टीम सभी शांति से बैठे हुए हैं. अखिलेश यादव का रिएक्शन था, 'मैंने सुना नहीं... लेकिन अगर प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा है तो उन्हें डायल 100 का डेटा मंगाना चाहिये... देखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में अपराध कौन बढ़ा रहा है - और कम से कम मुख्यमंत्री जी को निर्देश देकर जायें कि टॉप-टेन माफिया उत्तर प्रदेश के कौन हैं?'

अखिलेश यादव कह रहे हैं कि डेटा मंगाना चाहिये. बहुत अच्छी बात है. लेकिन वो खुद ये काम क्यों नहीं करते? अखिलेश यादव की टीम सामने आकर क्यों नहीं बताती कि हकीकत क्या है - और कैसे गुमराह किया जा रहा है? अगर यही काम बीजेपी को करना होता तो अब तक कोहराम मच चुका होता. सोशल मीडिया और मीडिया से लेकर गली मोहल्लों तक.

अगर वास्तव में ऐसा है - डायल 100 का डेटा कुछ बताने की स्थिति में है जिसे मिल कर छुपाने कोशिश हो रही है तो अखिलेश यादव को बताना चाहिये. अगर वो नहीं बताते तो यही समझ में आएगा कि बस जबानी दावे किये जा रहे हैं.

अखिलेश यादव कहते हैं, 'ये तो सबको पता है... उत्तर प्रदेश के वो मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपने मुकदमे वापस लिए हैं... एनसीआरबी का डेटा क्या कहता है कि लूट, डकैती, महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध, हत्याएं, सबसे ज़्यादा कहां हैं? मानवाधिकार आयोग से सबसे ज्यादा नोटिस किसको मिले हैं?' - और फिर जोड़ देते हैं, 'मैंने पहले भी कहा था कि झूठ बोलने का सबसे अच्छा प्रशिक्षण केंद्र भारतीय जनता पार्टी चलाती है.'

अखिलेश यादव ये बातें लोगों को तरीके से क्यों नहीं बताते या समझाने की कोशिश करते. अगर वो तरीके से समझाते, डेटा के साथ खुद ही सामने आते तो उस पर अलग से बहस भी होती - मीडिया भी कवर करता. फैक्ट चेक वाले भी दूध का दूध और पानी का पानी कर देते.

कानून व्यवस्था ही नहीं, कोरोना वायरस की बदइंतजामी को लेकर विपक्ष क्या सरकार को घेर नहीं सकता था - क्या मोदी-शाह के क्लीन चिट देने से ही बात खत्म हो जाती है?

वो तो लोगों को भी पता है कि हकीकत क्या है. कम से कम वे लोग तो हकीकत से वाकिफ हैं ही जिन्हें कोरोना संकट काल में सड़कों पर ऑक्सीजन से लेकर अस्पतालों में एक बेड तक के लिए भटकना पड़ा है - लेकिन अखिलेश यादव या मायावती या प्रियंका गांधी वाड्रा या फिर असदुद्दीन ओवैसी ही खुद को विकल्प के तौर पर पेश क्यों नहीं करते. विकल्प के तौर पेश करने का मतलब महज कुछ ट्वीट या बयानबाजी नहीं है, यकीन भी होना चाहिये.

अखिलेश यादव ने प्रेस कांफ्रेंस बुला कर योगी सरकार के विज्ञापन में पश्चिम बंगाल के फ्लाईओवर की तस्वीर का मुद्दा उठाया और उसके बहाने कामकाज पर सवाल भी, 'अभी तक ये सरकार नाम बदल रही थी... रंग बदल रही थी... समाजवादियों के काम पर अपना नाम लिख रही थी... अब तो दूसरे प्रदेशों के और दुनिया के दूसरे हिस्सों से भी फोटो चुराकर अपना काम बताने में सरकार आगे बढ़ रही है.'

अखिलेश यादव सहित विपक्षी खेमे के तमाम नेताओं को मुद्दों पर फोकस होकर जनता की अदालत में अपनी बात कहने से ही बात बन सकती है, वरना - सत्ता पक्ष के एजेंडे पर सफाई देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा.

ये धारणा धीरे धीरे बनने लगी थी कि यूपी में सत्ताधारी बीजेपी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अखिलेश यादव चैलेंज करने की स्थित में हो सकते हैं. अब तक तो देखने में यही आया है कि मायावती के साथी सतीश चंद्र मिश्रा अयोध्या पहुंच कर ब्राह्मण सम्मेलन कर रहे हैं और अरविंद केजरीवाल के साथी मनीष सिसोदिया और संजय सिंह राष्ट्रवाद के एजेंडे के साथ तिरंगा यात्रा - लेकिन अखिलेश यादव कैसे योगी आदित्यनाथ को चैलेंज करेंगे, समझा जाना बाकी है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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