charcha me| 

होम -> सियासत

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 26 जुलाई, 2021 12:12 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
  • Total Shares

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा हो रही है और वो भी अयोध्या (Ayodhya Assembly Seat) से - वो भी ऐसी सूरत में जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कार्य (Ram Mandir Construction) चल रहा है, जिसे हिंदुत्व की राजनीति की पराकाष्ठा समझा जा रहा है.

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ फिलहाल विधान परिषद के सदस्य हैं - और खबर है कि योगी के साथ साथ उनके कई कैबिनेट साथियों को भी 2022 में होने जा रहे विधानसभा के चुनाव मैदान में उतारने का विचार कर रही है. साथ ही, यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह का नाम भी ऐसे संभावित उम्मीदवारों के साथ लिया जा रहा है.

योगी आदित्यनाथ को लेकर अयोध्या या फिर गोरखपुर से चुनाव लड़ने की संभावना जतायी जा रही है. गोरक्षपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ गोरखपुर संसदीय सीट से लगातार पांच बार लोक सभा सांसद रहे हैं. जब से योगी गोरखपुर से सांसद बनने लगे तब से सिर्फ एक बार उपचुनाव में बीजेपी के हाथ से सीट निकल गयी थी और इसीलिए बीजेपी ने 2019 के आम चुनाव में रविकिशन शुक्ला को टिकट दिया. फिलहाल भोजपुरी फिल्म एक्टर रवि किशन ही गोरखपुर से सांसद हैं.

बीजेपी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा जिन नेताओं को चुनाव मैदान में उतार सकती है, वे हैं - डिप्टी सीएम केशव मौर्य, डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और कैबिनेट मंत्री महेंद्र सिंह. महेंद्र सिंह के कुंडा सीट से चुनाव लड़ने की संभावना जतायी गयी है. ऐसे ही केशव मौर्य के कौशांबी और दिनेश शर्मा के लखनऊ से.

योगी आदित्यनाथ के विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा उनके अयोध्या दौरे से ठीक पहले और बीएसपी की ब्राह्मण सम्मेलन के दो दिन बाद शुरू हुई है. योगी आदित्यनाथ इन दिनों उन जगहों के दौरे पर हैं जहां जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही कोई न कोई उद्घाटन करने वाले हैं. मोदी के वाराणसी दौरे से पहले योगी वहां चल रहे काम की प्रोग्रेस जानने के लिए भी कई बार गये थे. अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी से बीजेपी के विधानसभा चुनाव कैंपेन की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री योगी की खूब तारीफ की थी - यहां तक कि कोरोना संकट के दौरान के उनके काम की भी जो अब तक सवालों के घेरे में है.

बड़ा सवाल ये है कि योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव लड़ने की चर्चा क्यों छेड़ी गयी है - क्या वास्तव में बीजेपी के भीतर ऐसा कोई गंभीर मंथन चल रहा है या फिर विपक्ष की उन धार्मिक स्थलों की तरफ राजनीतिक निगाह के चलते जिन पर बीजेपी अपना पूरा हक जताती आयी है.

पहले पंचायत चुनावों में बीजेपी के अयोध्या के साथ साथ काशी और मथुरा में भी खराब प्रदर्शन की बात सामने आयी थी - और ये भी समझा गया कि बीजेपी के जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख के परोक्ष चुनाव जीत लेने को पंचायत सदस्यों के प्रत्यक्ष चुनाव से जोड़ा नहीं जा सकता. खास बात ये रही कि अखिलेश यादव ने अयोध्या, काशी और मथुरा तीनों जगह समाजवादी पार्टी के समर्थन वाले उम्मीदवारों की जीत के दावे किये थे.

अयोध्या के बाद बीएसपी नेता सतीशचंद्र मिश्रा ने काशी, मथुरा और चित्रकूट में ब्राह्मण सम्मेलन कराने की घोषणा कर रखी है - क्या बीजेपी को बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलन में 'जय श्रीराम' के नारे लगाये जाने से कोई चिंता हो रही है?

योगी का अयोध्या से चुनाव लड़ना!

राम जन्मभूमि क्षेत्र से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विधानसभा चुनाव लड़ने की खबर से सबसे ज्यादा खुश अयोध्या के विधायक वेद प्रकाश गुप्त नजर आ रहा हैं - ऐसा होने वो अपने लिए सौभाग्य तो बता ही रहे हैं, कह रहे हैं कि वो तो 2017 से ही इंतजार में बैठे हैं. योगी आदित्यनाथ जब मुख्यमंत्री बने उस वक्त गोरखपुर से सांसद रहे और बाद में विधान परिषद के सदस्य बन गये. बीजेपी विधायक वेद प्रकाश गुप्त ने तो बोल दिया है कि वो योगी आदित्यनाथ के लिए अपनी सीट छोड़ने के लिए तैयार हैं.

राजनीतिक दलों के किसी बड़े नेता के क्षेत्र विशेष से चुनाव लड़ने का बड़ा फायदा ये होता है कि आस पास की सीटों पर भी उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. चुनाव क्षेत्र के इर्द गिर्द के लोग भी खुद को नेता से जुड़ा महसूस करते हैं और अपनी तरफ से योगदान के रूप में संबंधित राजनीतिक दल के पक्ष में वोट करते हैं.

yogi adityanathअयोध्या से तो योगी आदित्यनाथ को तभी चुनाव लड़ने को तैयार होना चाहिये जब निर्विरोध चुने जाने की सूरत बने!

दूसरी सूरत ये होती है कि राजनीतिक दल को अगर अपने नेता की जीत को लेकर शक शुबहे होते हैं तो किसी ऐसे क्षेत्र की तलाश होती है जहां जीत की गारंटी हो - लेकिन योगी आदित्यनाथ के साथ तो ऐसा है नहीं.

रही बात अयोध्या विधानसभा क्षेत्र या उसके आस पास के इलाकों की - तो क्या बीजेपी को चुनाव जीतने के लिए योगी आदित्यनाथ की जरूरत हो सकती है. ये अपनेआप में बड़ा सवाल खड़ा करता है.

जिस अयोध्या में पहले से ही बहुप्रतिक्षित राम मंदिर के निर्माण का कार्य प्रगति पर हो, वहां योगी आदित्यनाथ ही क्यों नरेंद्र मोदी की भी वोट खींचने के लिए कोई जरूरत हो सकती है क्या? और अगर लोगों की नाराजगी हदें ही पार कर चुकी हो तो क्या अयोध्या-काशी और क्या मथुरा - जनता तो किसी की कहीं भी मिट्टी पलीद कर सकती है.

आने वाले विधानसभा चुनाव चाहे यूपी के हों या फिर बाकी चार राज्यों के बीजेपी की बात होते ही सीधे उसके तार पश्चिम बंगाल चुनाव से जुड़ जाते हैं. बंगाल ने जो जख्म दिये हैं, बीजेपी के लिए लंबे समय तक उससे उबरना मुश्किल हो सकता है, कम से कम तब तक नहीं ही जब तक कि वैसी ही भरपायी न हो जाये.

जिस तरह से योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रियों या प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष को चुनाव लड़ाये जाने की बात हो रही है, बीजेपी ऐसे कई प्रयोग हाल ही में खत्म हुए पश्चिम बंगाल चुनाव में कर चुकी है.

बीजेपी के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सिर्फ शुभेंदु अधिकारी की जीत ही ऐसी रही जिस पर वो चाहे तो संतोष करे या गम भुलाने के लिए खुशी से फूले न समाये वरना न बंगाली भद्रलोक को राज्य सभा सांसद रहे स्वपनदास गुप्ता पसंद आये - और न ही केंद्रीय मंत्री रहते बाबुल सुप्रियो.

अब अगर उत्तर प्रदेश या दूसरे राज्यों में विधानसभा चुनावों में बीजेपी बंगाल जैसे प्रयोग करने का इरादा कर चुकी है तो कम से कम दो बार शांति के साथ और मिलजुल कर कदम बढ़ाने से पहले जरूर सोचना चाहिये.

यूपी में चुनाव बाद सत्ता में वापसी की बात भले ही चुनौतीपूर्ण लगे, लेकिन योगी आदित्यनाथ तो यूपी क्या इतनी हैसियत तो रखते ही हैं कि हिंदुत्व की राजनीति को पसंद करने वाली आबादी या फिर जहां नाथ पंथ के अनुयायी रहते हैं उनके वोट तो योगी को आसानी से मिल सकते हैं - भले ही वो कर्नाटक का कोई इलाका हो, त्रिपुरा हो या देश का कोई और ही हिस्सा क्यों न हो.

किसी बात का डर है क्या

मायावती की तरफ से बीएसपी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा तो अयोध्या जाकर ब्राह्मण सम्मेलन करने के साथ अगला पड़ाव काशी बता भी चुके हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव को तो वाराणसी का अपना ऐसा ही मिलता-जुलता कार्यक्रम ही रद्द करना पड़ा है.

अब अखिलेश यादव की तरफ से कहा जा रहा है कि यूपी चुनाव जीतने के बाद ही वो काशी विश्वनाथ का दर्शन करने बनारस जाएंगे. हुआ ये था कि अखिलेश यादव को सावन के पहले सोमवार को काशी विश्वनाथ के दर्शन और अभिषेक के लिए बुलाया गया था. तभी प्रचारित कर दिया गया समाजवादी पार्टी नेता यादव समाज के साथ काशी विश्वनाथ का दुग्धाभिषेक करने जा रहे हैं. बाद में बुलाने वालों की ही तरफ से कुछ लोगों ने स्थिति स्पष्ट की कि ये निजी तौर पर होने वाले आयोजन का हिस्सा होगा और उसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश ठीक नहीं होगी.

अयोध्या के ब्राह्मण सम्मेलन में सबसे ज्यादा ध्यान देने वाला बयान तो सतीश चंद्र मिश्रा के देर होने की सफाई वाला रहा. सतीश चंद्र मिश्रा करीब दो घंटे की देर से ब्राह्मण सम्मेलन में पहुंचे थे - लेकिन उसमें भी एक राजनीतिक ऐंगल निकाल लिये.

बीएसपी महासचिव ने जोर देकर बताया कि उनको देर इसलिए हो गयी क्योंकि वो सम्मेलन से पहले रामलला और हनुमानगढ़ी में दर्शन करने गये थे - और फिर सरयू तट पर आरती में भी शामिल हुए.

दलितों की पार्टी के नेता के ब्राह्मणों के नाम पर आयोजित एक जातीय सम्मेलन में हिंदुत्व की राजनीति का संदेश देने की ये बड़ी ही सोची समझी कोशिश लगती है - दलित वोट बैंक में हिस्सेदारी कम होने की भरपायी मायावती लगता है बीजेपी के हिंदुत्व की लाइन पर आगे बढ़ कर राजनीति करने की कोशिश कर रही हैं.

मौका देख कर बीएसपी नेता विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी को भी सवालों के कठघरे में खड़ा किये अयोध्या आंदोलन से जुड़े पिछले तीस साल का हिसाब भी मांग लिये.

सतीश चंद्र मिश्रा का कहना रहा, 'हर जगह से ये चंदा लिये... अब फिर चंदा मांग रहे हैं. भगवान राम के लिए आप झोला लेकर घूम रहे हैं... एक साल में मंदिर की नींव भी नहीं बन पा रही है. मंदिर बनेगा या नहीं, ये आज भी प्रश्न है - इनका असली चेहरा पहचानिये.'

अयोध्या में बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलन में जो नारे लगे उन पर भी गौर किया जाना जरूरी लगता है - जय भीम तो बीएसपी के कार्यक्रमों में लगने वाला आम नारा है. फिर ब्राह्मणों के लिए जय परशुराम का नारा भी लगाया गया, लेकिन गौर करने वाली बात रही कि 'जयश्रीराम' और 'जय भारत' के नारे भी लगे.

जय भारत के नारे का मतलब हुआ बीजेपी के राष्ट्रवाद के एजेंडे में घुसने की कोशिश और जय श्रीराम का मतलब हिंदुत्व की राजनीति में हिस्सेदारी जमाने की कवायद. साथ में अयोध्या, मथुरा, काशी और चित्रकूट में भी यही दोहराये जाने की घोषणा भी.

अव्वल तो योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव लड़ने का आइडिया ही बड़ा अजीब लगता है - जब बीजेपी अयोध्या मुद्दे को होल्ड कर आम चुनाव जीत सकती है. सिर्फ जीतने की ही कौन कहे 2014 के मुकाबले 2019 में पहले से ज्यादा सीटें जीत सकती है, फिर अयोध्या को लेकर डरने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

और अगर राम मंदिर निर्माण से बने माहौल में भी बीजेपी को वोट नहीं मिलने की आशंका है, तो क्या गारंटी है कि योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव मैदान में उतर जाने से कोई फर्क भी पड़ेगा.

अगर बीजेपी को लग रहा है कि कोरोना संकट में योगी सरकार के कामकाज से लोगों की नाराजगी भारी पड़ सकती है, तो ऐसी नाराजगी की भरपायी भला योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव लड़ने से हो सकती है क्या?

मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से पहले अयोध्या में दिवाली मनाते रहे हैं. अयोध्या नामकरण का क्रेडिट भी योगी आदित्यनाथ के खाते में ही जुड़ा है. साल भर पहले ही राम मंदिर के लिए प्रधानमंत्री मोदी के साथ भूमि पूजन भी कर चुके हैं - फिर चुनाव लड़ने के बारे में सोचने की भी जरूरत क्यों आ पड़ी है? क्या महज इसलिए कि बीएसपी ने अयोध्या में ब्राह्मण सम्मेलन कर लिया है - और वहां जय श्रीराम के नारे लगाये गये हैं?

इन्हें भी पढ़ें :

यूपी चुनाव का प्रचार शुरू, योगी के लिए थी मोदी की 'बनारस रैली'

उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले योगी को जनसंख्या नीति की जरूरत क्यों आ पड़ी, जानिए...

...तो क्या RSS खुद को बदल रहा है?

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय