charcha me| 

होम -> सियासत

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 17 जून, 2022 07:17 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
  • Total Shares

उद्धव ठाकरे 15 जून को आदित्य ठाकरे (Aditya Thackeray Ayodhya Visit) को साथ लेकर अयोध्या जाने वाले थे. शिवसेना सांसद संजय राउत ने उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के ममता बनर्जी की मीटिंग में शामिल न हो पाने के पीछे पहले से ही ये मजबूरी जता दी थी - और वादे के मुताबिक राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार तय करने को लेकर बुलायी गयी ममता बनर्जी की मीटिंग में शिवसेना के प्रतिनिधि के तौर पर प्रियंका चतुर्वेदी और सुभाष देसाई पहुंचे भी.

अयोध्या दौरे का अपना कार्यक्रम तो राज ठाकरे ने मजबूरन रद्द कर दिया था, लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अयोध्या क्यों नहीं गये? संजय राउत ने अपडेट नहीं किया है. कोई तो वजह रही ही होगी. राज ठाकरे ने तो रैली करके साफ साफ बोल दिया था कि उनके खिलाफ साजिशें रची जा रही हैं, लेकिन वो किसी के जाल में नहीं फंसना चाहते.

और फिर आदित्य ठाकरे अकेले अयोध्या पहुंच गये. आदित्य ठाकरे का ऐसा ये पहला दौरा रहा. वैसे संजय राउत मौके पर वैसे ही डटे रहे जैसे वो उद्धव ठाकरे के दौरे को लेकर तमाम जरूरी इंतजामों में लगे रहते हैं.

संजय राउत और आदित्य ठाकरे दोनों ही अयोध्या दौरे को गैर राजनीतिक बताने की कोशिश करते दिखे, लेकिन हनुमानगढ़ी के महंत राजूदास ने शिवसेना नेताओं के दावे पर कड़ी आपत्ति जतायी है. हालांकि, राजूदास के आपत्ति का तरीका भी बीजेपी की साइड वाला लगता है. मतलब, स्पष्ट राजनीतिक विरोध.

किसी नेता का गैरराजनीति कार्यक्रम कैसा होता है: राजूदास का कहना है, संजय राउत ने कहा था कि आदित्य ठाकरे का दौरा राजनीतिक नहीं होगा, तो फिर अयोध्या को पोस्टरों से भर क्यों दिया गया? पूछने लगे, अयोध्या में हम सभी का स्वागत करते हैं, लेकिन 'भोंपू बजाकर और पोस्टर पाट कर आना क्या राजनीतिक दौरा नहीं है?'

राजूदास शिवसेना नेतृत्व से कुछ ज्यादा ही गुस्से में नजर आ रहे थे, 'ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिये जो हनुमान चालीस पढ़ने के लिए लोगों को जेल में डाल देते हैं.' हनुमानगढ़ी के महंत अमरावती से निर्दल सांसद नवनीत राणा को जेले भेजे जाने से ज्यादा खफा दिखे. नवनीत राणा के उद्धव ठाकरे के घर मातोश्री के सामने हनुमान चालीस पढ़ने के ऐलान को बीजेपी के सपोर्ट में शिवसेना के खिलाफ मुहिम के तौर पर समझा गया था.

मतलब, ये कि बहाने से ही सही आदित्य ठाकरे का दौरा भी बीजेपी समर्थकों को अच्छा नहीं लगा है, राजूदास के बयान से तो ऐसा ही लगता है. ये ठीक है कि राज ठाकरे की तरह बीजेपी के किसी सांसद ने आदित्य ठाकरे के अयोध्या दौरे का विरोध तो नहीं किया है, लेकिन किसी को अच्छा भी नहीं लगा है.

राजूदास जिन पोस्टरों की बात कर रहे हैं, उनमें से एक पर लिखा था - 'असली आ रहा है, नकली से सावधान.' दरअसल, शिवसेना ने ये पोस्टर राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के पोस्टर के रिएक्शन में लगाये थे. एमएनएस ने जगह जगह जो पोस्टर लगाये थे उस पर लिखा था, 'आ रहे हैं भगवाधारी...' पोस्टर पर शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे वाले अंदाज में राज ठाकरे की तस्वीर लगायी गयी थी. एक रैली में उद्धव ठाकरे ने भी पोस्टर का मजाक उड़ाया था.

आदित्य ठाकरे जो भी दावा करें, लेकिन उनके अयोध्या दौरे से शिवसेना की रणनीति के साफ साफ संकेत तो मिल ही जाते हैं. अब सवाल ये उठता है कि क्या शिवसेना (Shiv Sena) के हिंदुत्व की राजनीतिक लाइन में कोई फेरबदल होने वाला है - और यही वजह है कि आदित्य ठाकरे को नये चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है? वो भी कट्टर हिंदुत्व की राजनीति के अरसे से केंद्र बने हुए सीधे अयोध्या से?

आदित्य ठाकरे का अयोध्या दौरा

बाल ठाकरे का राजनीतिक तेवर उनके बेटे उद्धव ठाकरे नहीं, बल्कि उसकी साफ साफ झलक भतीजे राज ठाकरे की राजनीतिक शैली में अक्सर देखने को मिली है. कभी पाकिस्तान के विरोध में क्रिकेट की पिच खोद डालना तो कभी किसी के मुंह पर कालिख पोत डालना और ऐसे ही न जाने शिवसैनिकों के कितने ऐतिहासिक कारनामे जगजाहिर रहे हैं.

aditya thackerayअब तक उदार हिंदुत्व की वकालत करने वाले पिता उद्धव ठाकरे के साथ कदम से कदम मिलाते हुए चलने वले आदित्य ठाकरे अयोध्या पहुंच कर भक्तिभाव में डूबे होने की नुमाइश क्यों करने लगे?

उद्धव ठाकरे की उदार शिवसेना: माना जाता है कि उद्धव ठाकरे ने कमान संभालने के साथ ही शिवसेना के उग्र हिंदुत्व वाले तेवर को उदार हिंदुत्व की राजनीति की तरफ बदलना शुरू कर दिया था. शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता जो लोक सभा के स्पीकर भी रहे, उद्धव ठाकरे के बारे में कहा करते थे - 'ये उदार तानाशाह की शैली है... यही बालासाहब का अंदाज था और उद्धव ने भी वैसी ही शैली को अपनाया है.'

हो सकता है, मनोहर जोशी को बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे में कुछ खास समानता दिखी हो, लेकिन सड़क पर शिवसैनिकों की बदली छवि को तो हर किसी ने महसूस किया ही है. वरना, उद्धव ठाकरे को कंगना रनौत के तू-तड़ाक करने के बाद क्या शिवसैनिकों को शांत बैठे देखने को मिलता? शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

शिवसेना को अपनी तरफ से उद्धव ठाकरे ने तो बीजेपी के साथ गठबंधन में रहते ही काफी हद तक बदल डाला था, लेकिन सही तस्वीर तब सामने आयी जब 2019 के महाराष्ट्र चुनाव के बाद बीजेपी-शिवसेना गठबंधन टूट गया - और सिर्फ टूटा होता तो अलग बात होती, उद्धव ठाकरे ने चार कदम आगे बढ़ कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन कर सरकार भी बना डाली.

बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ते वक्त चल रही तकरार के बीच उद्धव ठाकरे ने कहा था कि शिवसेना किसी के खिलाफ प्रतिशोध नहीं रखती, लेकिन लगे हाथ ये आगाह भी कर डाले थे कि अगर कोई उनके रास्ते में आता है तो वे उसे हटा देंगे. उद्धव ठाकरे का ऐसा ही तेवर हाल में नवनीत राणा के हनुमान चालीसा पढ़ने की घोषणा पर प्रतिक्रिया के रूप में भी दिखी थी - और कहीं कहीं अपने चचेरे भाई राज ठाकरे को चेतावनी देते हुए भी.

आदित्य को भी पसंद है नयी शिवसेना: एक बार इंटरव्यू में आदित्य ठाकरे ने भी कहा था कि आज की शिवसेना में हिंसा की कोई जगह नहीं है. 2019 के आम चुनाव के वक्त आदित्य ठाकरे अजमेर शरीफ दरगाह गये थे. असल में आदित्य ठाकरे भी उद्धव ठाकरे की उदार शिवसेना को ही अब तक आगे बढ़ाते रहे हैं - और ये सर्व स्वीकार्यता की राजनीति की कोशिश लगती है, ताकि शिवसेना को उनके भी वोट मिलें जो 'सबका साथ, सबका विकास' जैसे नारे के बावजूद अब तक बीजेपी को नहीं मिल पाते. पहले शिवसेना का भी बिलकुल वैसा ही हाल रहा है.

बीजेपी से सियासी रिश्ता तोड़ने के बाद से शिवसेना को कट्टर हिंदुत्व छवि और सेक्युलर मिजाज के बीच जूझते देखा जा रहा है. बीजेपी के पास भी उद्धव ठाकरे को घेरने के लिए एक ही दांव नजर आता है, लिहाजा वो उद्धव ठाकरे के कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने की मिसाल देते हुए उनके हिंदुत्व पर ही सवाल खड़ा करने लगी है - और उद्धव ठाकरे ये सुनते ही तिलमिला उठते हैं.

तभी तो महाराष्ट्र की अपनी गठबंधन सरकार के 100 दिन पूरे होने का जश्न मनाने भी उद्धव ठाकरे सदल बल अयोध्या ही पहुंचे थे. धारा 370 और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार चलाते हुए भी उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने केंद्र की बीजेपी सरकार के स्टैंड का ही सपोर्ट किया था.

उद्धव ठाकरे बीजेपी के खिलाफ अक्सर बेहद आक्रामक नजर आते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंचों पर भी उनको काफी सहज देखा जाता है. ऐसा ही वाकया मोदी के हाल के महाराष्ट्र दौरे में भी देखा गया था. आपको याद होगा जब उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बने छह महीने हो चुके थे और विधान परिषद का सदस्य बन पाना मुश्किल हो रहा था तो भी प्रधानमंत्री मोदी को ही फोन किये थे - और मोदी ने उद्धव ठाकरे को निराश भी नहीं होने दिया था.

गठबंधन साथियों के साथ सहज नहीं रहे उद्धव ठाकरे: अंदर की जो बात मालूम होती है, उसके हिसाब से उद्धव ठाकरे और बीजेपी के बीच तनातनी की वजह प्रधानमंत्री मोदी नहीं बल्कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अमित शाह ही लगते हैं. महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार बनने के दौरान एक चर्चा ये भी रही कि अगर अमित शाह ने एक बार मातोश्री का दौरा कर लिया होता तो बीजेपी-शिवसेना गठबंधन टूटने की नौबत शायद ही आयी होती.

ऐसा तो नहीं कि हाल के राज्य सभा चुनाव में देवेंद्र फडणवीस से मिली शिकस्त के कारण, लेकिन ऐसा महसूस किया जा रहा है कि गठबंधन साथियों के बीच निभा पाना उद्धव ठाकरे के लिए धीरे धीरे मुश्किल होता जा रहा है - एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले का राज्य सभा चुनाव में शिवसेना की हार को 'शर्मनाक' बताना भी ऐसा ही एक इशारा है.

बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह की धमकी के बाद राज ठाकरे के अपना दौरा रद्द करने के बाद उद्धव ठाकरे के कार्यक्रम के निर्बाध नजर आने से बीजेपी के साथ फिर से नजदीकियों के संकेत समझे जाने लगे हैं. मुद्दे की बात ये भी है कि उद्धव ठाकरे को भी पता है कि अगर फिर से वो बीजेपी के साथ हुए तो अमित शाह धीरे धीरे नीतीश कुमार जैसा हाल करने की कोशिश करेंगे - और आदित्य ठाकरे को अकेले अयोध्या भेजने की एक वजह तो यही लगती है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि उद्धव ठाकरे ने शिवसेना को उदार बनाने की कोशिश की और काफी हद तक सफल भी रहे, लेकिन लगता है वो जड़ों की ओर लौटने लगी है - शायद ये अब उनकी राजनीतिक मजबूरी बनती जा रही है. बीजेपी नेताओं का सुशांत सिंह राजपूत केस में आक्रामक होना, नितेश राणे का आदित्य ठाकरे को लगातार निशाना बनाना - धीरे धीरे उद्धव ठाकरे के लिए सिरदर्द बढ़ाता जा रहा है.

शिवसेना अपने स्टैंड पर कायम रहेगी या बदलेगी?

ये तो साफ है कि शिवसेना को आगे ले जाने की जिम्मेदारी अब आदित्य ठाकरे के कंधों पर ही आ चुकी है. और ये काम सामने खड़ी चुनौतियों से जूझते हुए करना है. परिवारवाद की राजनीति में विरासत को संभालना और उसे आगे बढ़ाने की अलग ही चुनौती होती है - और वो भी तब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परिवारवाद की राजनीति के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हों.

आदित्य ठाकरे की चुनौतियां: जिस मोड़ पर आदित्य ठाकरे को उद्धव ठाकरे शिवसेना को हैंडओवर करने की सोच रहे हैं, वहां पहले से ही चुनौतियों का अंबार लगा हुआ है - और कदम कदम पर मौजूदा दौर में सबसे मजबूत राजनीतिक दल बीजेपी से लड़ना है.

1. उद्धव ठाकरे फिलहाल उदार हिंदुत्व की राजनीतिक लाइन पर चलते हुए कांग्रेस और एनसीपी के साथ सामंजस्य बना कर चल रहे हैं, लेकिन टिके रहना मुश्किल होने लगा है - अगर आदित्य ठाकरे आदित्य ठाकरे भी उसी लाइन पर कायम रखने का फैसला करते हैं तो नये सिरे से तैयारी करनी होगी.

2. आदित्य ठाकरे के सामने एक विकल्प ये भी है कि शिवसेना की पुरानी कट्टर हिंदुत्व की राजनीतिक लाइन पर लौट कर बीजेपी से मुकाबले की तैयारी करें - तब ये भी हो सकता है, मौजूदा गठबंधन साथी पीछे छूट जायें - और बीजेपी मजबूर होकर ढाई-ढाई साल वाले मुख्यमंत्री के फॉर्मूले को मान ले.

बीजेपी को महाराष्ट्र की राजनीति में बने रहने के लिए शिवसेना या शिवसेना जैसे ही किसी सपोर्ट सिस्टम की सख्त जरूरत है - ऐसा करने के लिए वो राज ठाकरे को पीछे से सपोर्ट करती है, लेकिन शिवसेना जैसा भरोसा नहीं जमता तो ऐसे भी संकेत देने की कोशिश होती है कि बीजेपी शरद पवार की पार्टी एनसीपी के साथ भी हाथ मिला सकती है.

3. आदित्य ठाकरे के लिए पहले तो शिवसेना को महाराष्ट्र में सबसे बड़ी और मजबूत राजनीतिक पार्टी बनाने की चुनौती है. ऐसे में जबकि कांग्रेस महाराष्ट्र में भी अस्तित्व बचाये रखने के लिए जूझ रही है, राज ठाकरे राजनीति में पांव जमाने के लिए जूझ रहे हैं और शरद पवार किसी के लिए भी खुला मैदान छोड़ने के लिए तैयार न हों - आदित्य ठाकरे को अपनी काबिलियत साबित करनी होगी.

इन्हें भी पढ़ें :

बाल ठाकरे की विरासत पर 'राज' की तैयारी से BJP-शिवसेना झगड़ा और बढ़ेगा!

राज ठाकरे की भी आ सकती है बारी, अगर पवार के दबाव में आ गये उद्धव ठाकरे

संघ और बीजेपी की 'कट्टर हिंदुत्व की राजनीति' कमजोर तो नहीं पड़ने लगी?

#आदित्य ठाकरे, #अयोध्या, #शिवसेना, Aditya Thackeray Ayodhya Visit, Shiv Sena, Uddhav Thackeray

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय