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पैतृक संपत्ति में बेटियों को बराबर का हिस्सा देने का फैसला क्यों अधूरा है, जानिए...

    • अंकिता जैन
    • Updated: 17 अगस्त, 2020 02:33 PM
  • 17 अगस्त, 2020 02:33 PM
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बेटियों को पैतृक संपत्ति (Parental Property rights) में बराबरी का अधिकार मिलने की बात की है. लेकिन सवाल ये है कि क्या इतना भर काफी है? जवाब है नहीं. बात तो तब है जब लड़कियों को पिता की संपत्ति में हिस्से के अलावा उनके वो अधिकार भी मिलें जिनका अब तक हमारे समाज ने हनन किया है.

'जिन पुत्रों के यहां पुत्र नहीं होते उन्हें संपत्ति में अधिकार (Rights In Property) नहीं मिलना चाहिए, वरना घर की संपत्ति भी बेटी (Daughters) के ब्याह के साथ पराए घर चली जाती है.' पुत्रियों के पिता को कही जाने वाली ये बातें आज भी उतनी ही सच हैं जितनी सच बाल-विवाह, दहेज प्रथा, और बेटियों का बेचे जाने की घटनाएं हैं. मैं बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिलने के पक्ष में हूं लेकिन सिर्फ 'संपत्ति' नहीं उनके 'अधिकार' भी. फिर बेटियों को हर आदर्शवाद से ऊपर उठकर शादी के मंडप तक हर क़िस्म के दृश्य-अदृश्य दहेज का विरोध करना चाहिए. वरना कर्ज़ लेकर/अपनी सारी जमापूंजी लगाकर/हैसियत से अधिक ख़र्च कर बेटी ब्याहने वाले पिता से पैतृक संपत्ति में अधिकार मांगना क्या न्यायोचित होगा?

पिता की संपत्ति में हिस्से के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश की बेटियों को बड़ी राहत दी है

साथ ही फिर बेटियों को वृद्धावस्था में माता-पिता की सेवा करने के कर्तव्य में भी बराबरी से हिस्सा लेना होगा, यह बात भी सुप्रीमकोर्ट को कहनी थी. ताक़ि पत्नी से उसकी पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलने की उम्मीद लगाए बैठे पति और उसके माता-पिता, 'बहु' के माता-पिता को भी साथ रखने की, या बहु को बेटे समेत उनके घर रहने की बात भी सहज रूप से कर सकें (जोकि सामाजिक बनावट में संभव नहीं लगता), बहु सालाना सुस्ताने नहीं बल्कि आवश्यकता पड़ने पर कितनी भी बार दायित्व निभाने जा सके.

बेटियां भी सिर्फ प्रॉपर्टी के लिए नहीं माता-पिता के प्रति बराबरी की ज़िम्मेदारी बांटने के लिए भी आवाज़ उठाएं.

ये ना हो कि माता-पिता पुत्र के घर में या वृद्धाश्रम में दुर्गति झेल रहे हों और पुत्री सब कुछ देखते हुए भी कहे 'मेरे तो हाथ बंधे हैं', 'तुमाए घर की तुमई जानो.' कोई...

'जिन पुत्रों के यहां पुत्र नहीं होते उन्हें संपत्ति में अधिकार (Rights In Property) नहीं मिलना चाहिए, वरना घर की संपत्ति भी बेटी (Daughters) के ब्याह के साथ पराए घर चली जाती है.' पुत्रियों के पिता को कही जाने वाली ये बातें आज भी उतनी ही सच हैं जितनी सच बाल-विवाह, दहेज प्रथा, और बेटियों का बेचे जाने की घटनाएं हैं. मैं बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिलने के पक्ष में हूं लेकिन सिर्फ 'संपत्ति' नहीं उनके 'अधिकार' भी. फिर बेटियों को हर आदर्शवाद से ऊपर उठकर शादी के मंडप तक हर क़िस्म के दृश्य-अदृश्य दहेज का विरोध करना चाहिए. वरना कर्ज़ लेकर/अपनी सारी जमापूंजी लगाकर/हैसियत से अधिक ख़र्च कर बेटी ब्याहने वाले पिता से पैतृक संपत्ति में अधिकार मांगना क्या न्यायोचित होगा?

पिता की संपत्ति में हिस्से के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश की बेटियों को बड़ी राहत दी है

साथ ही फिर बेटियों को वृद्धावस्था में माता-पिता की सेवा करने के कर्तव्य में भी बराबरी से हिस्सा लेना होगा, यह बात भी सुप्रीमकोर्ट को कहनी थी. ताक़ि पत्नी से उसकी पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलने की उम्मीद लगाए बैठे पति और उसके माता-पिता, 'बहु' के माता-पिता को भी साथ रखने की, या बहु को बेटे समेत उनके घर रहने की बात भी सहज रूप से कर सकें (जोकि सामाजिक बनावट में संभव नहीं लगता), बहु सालाना सुस्ताने नहीं बल्कि आवश्यकता पड़ने पर कितनी भी बार दायित्व निभाने जा सके.

बेटियां भी सिर्फ प्रॉपर्टी के लिए नहीं माता-पिता के प्रति बराबरी की ज़िम्मेदारी बांटने के लिए भी आवाज़ उठाएं.

ये ना हो कि माता-पिता पुत्र के घर में या वृद्धाश्रम में दुर्गति झेल रहे हों और पुत्री सब कुछ देखते हुए भी कहे 'मेरे तो हाथ बंधे हैं', 'तुमाए घर की तुमई जानो.' कोई भी अधिकार बिना दायित्व के नहीं मिलता. बहनों को सिर्फ़ प्रॉपर्टी पर नहीं ज़िम्मेदारी में भी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए.

बेटियां परायाधन, बेटियों से लेते नहीं बस देते हैं, बेटियों को जितना दोगे उतनी बरक़त होगी, ब्याह में लड़की वालों से दिलवाए जाने वाले लिफ़ाफ़े और तोहफ़े, विवाह में लड़की के परिवार पर पड़ा ख़र्च, इस सब में भी बराबरी होनी चाहिए, इनमें एकाधिकार क्यों रहे?

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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