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Bell bottom के हश्र से कोरोना संग जीने का सबक सीखने को तैयार नहीं बॉलीवुड

    • अनुज शुक्ला
    • Updated: 26 अगस्त, 2021 07:10 PM
  • 26 अगस्त, 2021 07:10 PM
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बॉलीवुड ने कई स्तरों पर महामारी की सच्चाई को अब तक स्वीकार नहीं किया है. उसके दुष्परिणाम दिखने लगे हैं. महामारी में फिल्मों की सुरक्षित शूटिंग के तरीके तो खोज लिए गए बावजूद उनके प्रदर्शन का ठोस और स्थायी मॉडल तैयार नहीं किया जा सका.

कोरोना महामारी की दो खौफनाक लहर जा चुकी है. तीसरे लहर की आशंकाएं हैं. केरल समेत कुछ राज्यों की खराब हालत का इशारा भी उसी की तरफ है. कोरोना के बाद की दुनिया अब एक अलग दुनिया है. मिले सबक साफ़ करते हैं कि दुनिया के तमाम हिस्सों में जबतक महामारी को पूरी तरह काबू नहीं कर लिया जाता, इसके संग जीने की आदत डालना ही बेहतर है. लगभग हो भी रहा है. कारोबार, दफ्तरों का स्वरूप, परिवहन के तरीके, काम करने की संस्कृति सबकुछ बदल चुका है. यहां तक कि रहन सहन, खान-पान के तरीके भी.

असर बॉलीवुड पर भी पड़ा. लेकिन मनोरंजन जगत ने कई स्तरों पर सच्चाई को अब तक स्वीकार ही नहीं किया है. अब उसके दुष्परिणाम दिखने लगे हैं. महामारी के साए में फिल्मों की सुरक्षित शूटिंग के तरीके तो खोज लिए गए बावजूद उनके प्रदर्शन का ठोस और स्थायी मॉडल तैयार नहीं किया जा सका है. इसी वजह से हाल में रिलीज हुई अक्षय कुमार स्टारर बेल बॉटम को बॉक्स ऑफिस पर बहुत नुकसान उठाना पड़ा है. दूसरे चरण के बाद अनलॉक में बेल बॉटम को 50 प्रतिशत क्षमता के साथ सिनेमाघरों में ही रिलीज करने का फैसला लिया गया. मनोरंजक फिल्म होने के बावजूद बॉक्स ऑफिस नतीजों ने बेल बॉटम के निर्माताओं को निराश किया है.

बेल बॉटम फिल्म निर्माताओं के लिए केस स्टडी है

बेल बॉटम का कारोबार सिर्फ थियेटर रिलीज के सपने देख रहे निर्माताओं के लिए तीखे सच की तरह है. फिल्म का कारोबार अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा. जबकि ओवरसीज में अच्छा कलेक्शन निकलकर आया. यह इस बात का भी संकेत है कि महामारी की दूसरी लहर के खौफ ने दर्शकों को सिनेमाघर जाने रोक दिया. जबकि 19 अगस्त को रिलीज हुई बेल बॉटम को मुंबई (महाराष्ट्र) बंद होने के बावजूद करीब 1600 से ज्यादा स्क्रीन मिले थे. अक्षय कुमार का स्टारडम, फिल्म का कंटेट और एडवांस बुकिंग के रुझानों से लगा था कि अक्षय की फिल्म विपरीत हालात में भी (कोरोना का साया और सिनेमाघरों में 50 प्रतिशत क्षमता के साथ फिल्म का प्रदर्शन) संतोषजनक कारोबार करके निकल जाएगी. मगर दुर्भाग्य से बेल बॉटम के पहले वीकएंड का...

कोरोना महामारी की दो खौफनाक लहर जा चुकी है. तीसरे लहर की आशंकाएं हैं. केरल समेत कुछ राज्यों की खराब हालत का इशारा भी उसी की तरफ है. कोरोना के बाद की दुनिया अब एक अलग दुनिया है. मिले सबक साफ़ करते हैं कि दुनिया के तमाम हिस्सों में जबतक महामारी को पूरी तरह काबू नहीं कर लिया जाता, इसके संग जीने की आदत डालना ही बेहतर है. लगभग हो भी रहा है. कारोबार, दफ्तरों का स्वरूप, परिवहन के तरीके, काम करने की संस्कृति सबकुछ बदल चुका है. यहां तक कि रहन सहन, खान-पान के तरीके भी.

असर बॉलीवुड पर भी पड़ा. लेकिन मनोरंजन जगत ने कई स्तरों पर सच्चाई को अब तक स्वीकार ही नहीं किया है. अब उसके दुष्परिणाम दिखने लगे हैं. महामारी के साए में फिल्मों की सुरक्षित शूटिंग के तरीके तो खोज लिए गए बावजूद उनके प्रदर्शन का ठोस और स्थायी मॉडल तैयार नहीं किया जा सका है. इसी वजह से हाल में रिलीज हुई अक्षय कुमार स्टारर बेल बॉटम को बॉक्स ऑफिस पर बहुत नुकसान उठाना पड़ा है. दूसरे चरण के बाद अनलॉक में बेल बॉटम को 50 प्रतिशत क्षमता के साथ सिनेमाघरों में ही रिलीज करने का फैसला लिया गया. मनोरंजक फिल्म होने के बावजूद बॉक्स ऑफिस नतीजों ने बेल बॉटम के निर्माताओं को निराश किया है.

बेल बॉटम फिल्म निर्माताओं के लिए केस स्टडी है

बेल बॉटम का कारोबार सिर्फ थियेटर रिलीज के सपने देख रहे निर्माताओं के लिए तीखे सच की तरह है. फिल्म का कारोबार अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा. जबकि ओवरसीज में अच्छा कलेक्शन निकलकर आया. यह इस बात का भी संकेत है कि महामारी की दूसरी लहर के खौफ ने दर्शकों को सिनेमाघर जाने रोक दिया. जबकि 19 अगस्त को रिलीज हुई बेल बॉटम को मुंबई (महाराष्ट्र) बंद होने के बावजूद करीब 1600 से ज्यादा स्क्रीन मिले थे. अक्षय कुमार का स्टारडम, फिल्म का कंटेट और एडवांस बुकिंग के रुझानों से लगा था कि अक्षय की फिल्म विपरीत हालात में भी (कोरोना का साया और सिनेमाघरों में 50 प्रतिशत क्षमता के साथ फिल्म का प्रदर्शन) संतोषजनक कारोबार करके निकल जाएगी. मगर दुर्भाग्य से बेल बॉटम के पहले वीकएंड का घरेलू कलेक्शन करीब 15 करोड़ के आसपास ही दिखा. असल में इसे 40 करोड़ से ऊपर होना चाहिए था. निर्माताओं ने शायद ही इतने खराब कलेक्शन का गुणा गणित लगाया होगा.

सिर्फ़ कोरोना की वजह से बेल बॉटम बॉक्स ऑफिस पर कैसे धराशायी हो गई? पढ़ें

क्या महामारी के दौर में बेल बॉटम की रिलीज का मॉडल सही है?

बिल्कुल सही नहीं कहा जा सकता. यूएई या दूसरे ओवरसीज क्षेत्रों के मुकाबले भारत में महामारी की स्थितियां अलग थीं. पहले फेज में देश भयावहता से थोड़ा बचकर निकलने में कामयाब रहा था. लेकिन दूसरी लहर ने सबकुछ तहस नहस कर दिया. दवाइयों की किल्लत, अस्पतालों में अफरा तफरी, बड़े पैमाने पर हुई मौतों की तस्वीरें ताजा थीं. दो-तीन महीने पहले ही महामारी की भयावहता का नंगा नाच दिखा था. एक बड़े दर्शक वर्ग में महामारी का खौफ धंसकर बैठा था. बेल बॉटम के कलेक्शन में यह दिखता भी है. ओवरसीज में बेहद मामूली स्क्रीन के बावजूद कलेक्शन उम्मीद के मुताबिक़ बेहतर कहा जा सकता है. जबकि घरेलू कलेक्शन औसत से भी नीचे दिख रहा है.

बेल बॉटम के निर्माताओं ने कोरोना के लिहाज से फिल्म को रिलीज नहीं किया. सीधे थियेटर में रिलीज कर लगभग पारंपरिक मॉडल को ही फॉलो किया कि "पहले फिल्म थियेटर में दिखाई जाएगी और करीब चार हफ्तों बाद ओटीटी पर आएगी." ये तरीका तो फिल्म एग्जिबिटर के पक्ष में है, लेकिन मौजूदा स्थिति में निर्माताओं और दर्शकों के हित में बिल्कुल नहीं है. हुआ ये कि सिनेमाघर तक पहुंचने वाले "बहादुर" दर्शकों ने फिल्म तो देख ली, लेकिन वो दर्शक जो बेल बॉटम के लिए पैसा और वक्त खर्च करने के इच्छुक थे, सिनेमाघर तक पहुंचने का साहस ही नहीं जुटा पाए. उनके खौफ उस तर्क को भी बल दिया कि जब फिल्म एक महीने बाद ओटीटी पर मिल जाएगी तो अतिरिक्त पैसा खर्च करने और जोखिम उठाने का कोई तुक नहीं है. निर्माताओं ने इस पहलू को नजरअंदाज कर दिया. मध्य सितंबर से अमेजन प्राइम वीडियो पर बेल बॉटम के स्ट्रीम होने की संभावना है.

बॉलीवुड के लिए बेहतर मॉडल क्या हो सकता है? 

कायदे से निर्माताओं को थियेटर डिस्ट्रीब्यूटर्स से बात करना था. हालांकि इस तरह के मॉडल में एक आशंका बनी रहती है कि जब दर्शकों को फिल्म उनके घर में ही देखने को मिल सकती है तो भला वो थियेटर में क्यों आएंगे? लेकिन इस तथ्य को कैसे भुलाया जा सकता है कि कार्य व्यवहार के साथ कारोबार के तौर तरीके महामारी के मुताबिक़ ही चलाने होंगे. क्योंकि ये कोई हफ्ते दो हफ्ते की बात नहीं है. यह सब कब ख़त्म होगा इसकी भी समय सीमा तय नहीं है. नुकसान से अच्छा तो यही था कि "थियेटर और ओटीटी के जॉइंट मॉडल" पर आगे बढ़ा जाता. सलमान खान की राधे: योर मोस्ट वांटेड भाई भले ही कंटेंट के लिहाज से खारिज हो गई, मगर महामारी के बीच एक अच्छे बिजनेस मॉडल के साथ रिलीज हुई. पे पर व्यू का मॉडल.

पे पर व्यू के मॉडल में राधे निर्माताओं और हर तरह के दर्शक के पक्ष में थी. फिल्म के लिए आप निश्चित भुगतान करिए और उसे एक बार ओटीटी या टीवी जहां भी मन करे, देखिए. राधे की वजह से जी 5 का सब्सक्रिप्शन बहुत बढ़ा. फिल्म को देखा भी खूब गया. अगर बेल बॉटम के लिए ये तरीका अपनाया गया होता तो निर्माताओं को सबसे खराब दौर में भी बेहतरीन मुनाफा कमाने का सुनहरा मौका मिलता. हां यह भी सच्चाई है कि थियेटर के साथ ओटीटी और डीटीएच रिलीज में सिनेमाघर वितरकों को नुकसान हो सकता था. लेकिन थियेटर एग्जिबिशन में निर्माताओं की तुलना में उनकी शेयरिंग को थोड़ा बढ़ाकर इसे संतुलित करने का विकल्प था जो माहौल के हिसाब से जरूरी था.

अमिताभ बच्चन की चेहरे भी बेल बॉटम के आत्मघाती मॉडल पर ही लॉन्च हो रही है. कुछ और निर्माता भी ऐसा ही जानलेवा रिस्क ले रहे हैं. जो रिस्क नहीं लेना चाहते वो फिल्मों की रिलीज शेड्यूल टालकर एक अलग किस्म का जोखिम उठा रहे हैं. फिल्मों को डम्फ करने और भविष्य में कारोबारी क्लैश में फंसने का. बेल बॉटम के कारोबारी नतीजों के हर पहलू को देखते हुए बॉलीवुड को फिल्म वितरण के नए तरीके आजमाना होगा. परम्पराओं की पूछ पकड़े रहने का एक मतलब डूब जाना भी होता है.

अच्छा कंटेंट होने के बावजूद बेल बॉटम की नाकामी का असर समूचे फिल्म कारोबार पर पड़ता दिखाई दे रहा है. कई बड़े प्रोजेक्ट जो रिलीज के इंतज़ार में हैं उन्हें टाल देने भर से बॉलीवुड की समस्या का हल नहीं होने वाला. और कितनी फिल्मों का शेड्यूल खिसकाया जा सकता है? 2020 से ही दर्जनों फ़िल्में करीब-करीब बनकर तैयार हैं. जितनी फ़िल्में बनकर तैयार हैं, उतनी ही पाइप लाइन में हैं और लगभग उतनी ही नई फ़िल्में अनाउंस भी हो रही हैं. रिलीज शेड्यूल टालने का मतलब है कि अरबों रुपये डम्फ कर देना. ये तो इंडस्ट्री के कारोबार को बर्बाद करने जैसा होगा. थियेटर में फिल्मों को वक्त चाहिए होता है. एक साथ फ़िल्में रिलीज नहीं की सकतीं. उन्हें गैप की जरूरत होती है. इस तरीके में तो नुकसान के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा. बड़े बैनर तो गुंजाइश बना लेंगे. लो और मीडियम बजट की फिल्मों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा.

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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