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Angutho Review: राजस्थानी सिनेमा को अमीरस पिलाती 'अंगुठो'

    • तेजस पूनियां
    • Updated: 19 अगस्त, 2023 07:23 PM
  • 19 अगस्त, 2023 07:23 PM
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इस शॉर्ट फिल्म के माध्यम से पहली बार सिनेमा में निर्देशन की कमान संभालने वाले कुनाल मेहता तारीफों, शाबाशियों तथा पीठ ठोके जाने के हकदार बनते हैं. कायदे से राजस्थान के सिनेमा में अंगुलियों पर पूरे गिने जा सकने योग्य भी फिल्म निर्देशक नहीं हैं.

साल 2017 में आई संजय मिश्रा, रणवीर शौरी अभिनीत और नीला माधव पांडा निर्देशित "कड़वी हवा" देखी है आपने? उस फिल्म में एक जगह संवाद आता है जब क्लास के सब बच्चे एक लड़के की शिकायत करते हुए कहते हैं कि मास्टर जी, यह कह रहा है कि साल में सिर्फ दो ही मौसम होते हैं गर्मी और सर्दी. तब मास्टर पूछता है बरसात का मौसम कहाँ गया? फिर उस बच्चे का जवाब देखने-सुनने को मिलता है ‘मास्साब, बरसात तो साल में बस दो-चार दिन ही पड़त’ बस इतना सुन सब बच्चे हंस पड़ते हैं. 

लेकिन इस हल्के-फुल्के से दिखने वाले सीन में भी कितना गहरा और कड़वा सच छुपा हुआ था उसे आप और हम भले न माने लेकिन कहीं-न-कहीं अच्छे से जानते जरूर हैं. नीला माधव पांडा की तरह राजस्थानी स्टेज ओटीटी एप्प पर आई फिल्म "अंगुठो" भी हमें वैसा ही एक सीन दिखाते हुए उसी सच से रूबरू करवाती है ठीक उसी तरह कड़वाहट के साथ. जब मांगू कहता है उसका कालू उससे पूछता रहा कि बरखा कैसे होती है बापू?

लेकिन इसमें कड़वाहट केवल पानी, हवा, पर्यावरण को लेकर ही नजर नहीं आती बल्कि कड़वाहट जाति की भी नजर आती है. यह सच है कि जाति नहीं जाती. राजस्थानी सिनेमा हाल के दौर में फिर से सांसे लेना शुरू हुआ है किंतु अभी तक उसके द्वारा ली जा रही सांसों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था. लेकिन अब कान-आँख खोलकर देख लो हरियाणवी स्टेज की चलाई हुई सिनेमा की मुहिम ने राजस्थान में इस फिल्म से अपनी सांसों को सुनाया है.

मैं लंबे अरसे से स्टेज के लिए लिखता रहा हूं. सिनेमा को लेकर राजस्थान और हरियाणा में जब ये लोग आए तब इन्हें काफी सहारे की जरूरत थी और अपन ने कायदे से अपनी समीक्षाओं में सहारा दिया भी. लेकिन उसके बाद इनका स्तर गिरता नजर आया तो काफी तीखी आलोचाएं भी लिखीं. फिर एक समय बाद लिखना ही बंद कर दिया. लेकिन यकीन जानिए एक मात्र बीस मिनट की इस...

साल 2017 में आई संजय मिश्रा, रणवीर शौरी अभिनीत और नीला माधव पांडा निर्देशित "कड़वी हवा" देखी है आपने? उस फिल्म में एक जगह संवाद आता है जब क्लास के सब बच्चे एक लड़के की शिकायत करते हुए कहते हैं कि मास्टर जी, यह कह रहा है कि साल में सिर्फ दो ही मौसम होते हैं गर्मी और सर्दी. तब मास्टर पूछता है बरसात का मौसम कहाँ गया? फिर उस बच्चे का जवाब देखने-सुनने को मिलता है ‘मास्साब, बरसात तो साल में बस दो-चार दिन ही पड़त’ बस इतना सुन सब बच्चे हंस पड़ते हैं. 

लेकिन इस हल्के-फुल्के से दिखने वाले सीन में भी कितना गहरा और कड़वा सच छुपा हुआ था उसे आप और हम भले न माने लेकिन कहीं-न-कहीं अच्छे से जानते जरूर हैं. नीला माधव पांडा की तरह राजस्थानी स्टेज ओटीटी एप्प पर आई फिल्म "अंगुठो" भी हमें वैसा ही एक सीन दिखाते हुए उसी सच से रूबरू करवाती है ठीक उसी तरह कड़वाहट के साथ. जब मांगू कहता है उसका कालू उससे पूछता रहा कि बरखा कैसे होती है बापू?

लेकिन इसमें कड़वाहट केवल पानी, हवा, पर्यावरण को लेकर ही नजर नहीं आती बल्कि कड़वाहट जाति की भी नजर आती है. यह सच है कि जाति नहीं जाती. राजस्थानी सिनेमा हाल के दौर में फिर से सांसे लेना शुरू हुआ है किंतु अभी तक उसके द्वारा ली जा रही सांसों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था. लेकिन अब कान-आँख खोलकर देख लो हरियाणवी स्टेज की चलाई हुई सिनेमा की मुहिम ने राजस्थान में इस फिल्म से अपनी सांसों को सुनाया है.

मैं लंबे अरसे से स्टेज के लिए लिखता रहा हूं. सिनेमा को लेकर राजस्थान और हरियाणा में जब ये लोग आए तब इन्हें काफी सहारे की जरूरत थी और अपन ने कायदे से अपनी समीक्षाओं में सहारा दिया भी. लेकिन उसके बाद इनका स्तर गिरता नजर आया तो काफी तीखी आलोचाएं भी लिखीं. फिर एक समय बाद लिखना ही बंद कर दिया. लेकिन यकीन जानिए एक मात्र बीस मिनट की इस शॉर्ट फिल्म ने फिर से स्टेज एप्प डाउनलोड करने पर मजबूर सा कर दिया है.

कहानी है राजस्थान के उदयपुर जिले के सुदूर ग्रामीण इलाके गोडान की. सुनसान बीहड़ के माफिक इस इलाके में तीन साल से पानी का एक कतरा तक आसमान से नहीं गिरा है. गांव के एक जाति से पिछड़े व्यक्ति मांगू और उसके परिवार को इसलिए गांव छोड़कर जाना पड़ा कि उसके बेटे ने ऊंची जाति के आदमी और गाँव के सरपंच के कुंए से पानी भरने की कोशिश की. लेकिन क्या वो पानी भर पाया? क्या मांगू का बेटा अपने बेटे की प्यास बुझा पाया? क्या गाँव में लंबे अकाल के बाद फिर से बरसात पड़ी? या किसी को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ा? ऐसी कई सारी बातों के जवाब यह शॉर्ट फिल्म मात्र बीस मिनट में देती नजर आती है.

इस शॉर्ट फिल्म के माध्यम से पहली बार सिनेमा में निर्देशन की कमान संभालने वाले "कुनाल मेहता" तारीफों, शाबाशियों तथा पीठ ठोके जाने के हकदार बनते हैं. कायदे से राजस्थान के सिनेमा में अंगुलियों पर पूरे गिने जा सकने योग्य भी फिल्म निर्देशक नहीं हैं. कुछ हैं तो वे राजस्थान छोड़ बाहर जा बैठे हैं और गाहे-बगाहे ही यहाँ नजर आते हैं. खैर "अंगुठो" का निर्देशन करने के अलावा निर्देशक कुनाल ने इसका स्क्रीनप्ले भी लिखा है और "मुरलीधर वैष्णव" की इसी नाम से लिखी गई हिंदी कहानी को उन्होंने अडॉप्ट करते हुए राजस्थानी भाषा में बनाया है.

मात्र बीस मिनट की फिल्म अपने पहले शॉट और साउंड के साथ आने वाले कविवर रहीमदास के दोहे "रहिमन पानी राखिए" से शुरु होती है और पूरे बीस मिनट तक आपको पलक तक झपकने का अवसर नहीं देती. कायदे से यह फिल्म काफ़ी देर तक आपको अपनी जद से बाहर नहीं आने देती. और जब कोई सिनेमा इस कदर आपके भीतर बैठ जाए, घर कर जाए तो उस सिनेमा का कभी साथ नहीं छोड़ना चाहिए.

रहीमदास जी ने अपने इस दोहे में समझाया था कि पानी से मतलब विनम्रता से है. और इस दोहे का अर्थ है मनुष्य में हमेशा विनम्रता होनी चाहिए. जिस तरह से पानी के बिना आटे का और चमक के बिना मोती का कोई महत्व नहीं रह जाता है. उसी तरह मनुष्य भी बिना विनम्रता के आभाहीन हो जाता है और उसके मूल्यों का पतन हो जाता है.

ठीक ऐसा ही यह फिल्म चरितार्थ करती है अपने निर्देशन से, इसमें किए गए कलाकारों के अभिनय से, साउंड, कलरिंग, बी.जी.एम., कास्ट्यूम, कास्टिंग, सॉन्ग कंपोजिशन और गायकी से. फिल्म की पूरी टीम कुनाल मेहता, बुरहान हब्शी, जिगर नगादा, अरवा साबू, गौरव सदोरिया, चिया शर्मा, साहिल शर्मा, रमेश नगादा, पायल मेनारिया, कार्तिक जोशी, रतन सिंह, गुरुदत्त व्यास, निकिता कुलकर्णी, रितेश गोहिया, यशवंत राव, आत्मन झा, फातिमा हब्शी इत्यादि के अलावा निर्माता स्टेज एप्प एवं प्रोडक्शन हाउस "मनसा वाचा कर्मणा" सभी इस फिल्म से दिल जीत ले जाते हैं.

दरअसल यह फिल्म अपने प्रोडक्शन हाउस के नाम को भी सार्थक करती है जिसमें मनसा-मन से, वाचा-वचन से, कर्मणा- कर्म से सच्चा और अच्छा सिनेमा झलकता है. राजस्थानी सिनेमा को ऐसे कलाकारों की सख्त आवश्यकता है. अभिनय के मामले में सभी अपना बेहतरीन काम करते नजर आते हैं लेकिन खास तौर से मांगू के किरदार में साहिल शर्मा प्रभावित करते हैं. अपनी आँखों, हाव-भावों और अभिनय से वे "कड़वी हवा" में संजय मिश्रा के निभाए किरदार की याद दिलाते हैं.

एकमात्र छोटा सा दोहा और उसमें चंद लाइन जोड़ कर लिखा गया गाना जितना सुंदर लगता है उससे भी कहीं ज्यादा वह कर्णप्रिय महसूस होता है. स्टेज एप्प ओटीटी यदि ऐसे उम्दा प्रोजेक्ट लेकर भविष्य में हाजिर होते हैं तो वह दिन दूर नहीं होगा जब फिर से राजस्थानी सिनेमा घर-घर देखा, सराहा ही नहीं जाएगा बल्कि अन्य प्रदेशों में भी उसकी तूती बोलती नजर आएगी. गर्व कीजिए कि आप उस दौर में हैं जब राजस्थान के सिनेमा को पुनर्जीवित करने के लिए ऐसे निर्देशक बाहर आ रहे हैं. अपने पहले ही निर्देशन से कुनाल मेहता इतना विश्वास तो जीतते नजर आते हैं कि अब उन्हें इस फिल्म से और ऊपर उठकर काम करते देखना दर्शकों को पसंद आएगा.

अपनी रेटिंग:- 4.5 स्टार

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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