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Updated: 16 जनवरी, 2021 02:45 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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तो साहब ख़बरों के इस दौर में एक खबर आई है कि Uttar Pradesh की राजधानी Lucknow से. लखनऊ में शराब खरीदने के मामले में महिलाएं पुरुष के मुकाबले बीस  हो गई हैैं. खबर में कितना दम है, ये तो भगवान ही जाने. शराबखानों के बाहर बैठकर पता नहीं कौन गिनती कर रहा था कि कितनी महिलाओं ने शराब खरीदी, और कितनी पुरुषों ने. लेकिन, पुरुषों की इस दुनिया में महिलाओं के शराब खरीदने की बात तो वैसे भी गले नहीं उतरनी थी. और लखनवी अदब का तो अलग ही तुर्रा है. सो खबर का आना भर था और एक शोर बरपा हो गया. तमाम तरह की बातें हो रही हैं. कल्चर की दुहाई दी जा रही है और सबसे बड़ी बात कहा तो यहां तक जा रहा है कि अदब और तमीज़ तहज़ीब के मरकज के रूप में लखनऊ की दुर्गति हो रही है. मतलब जैसे हाल हैं 'महिलाओं के शराब खरीदने के मामले में 20 होने पर वो सब कुछ हो रहा है जो एक समाज के रूप में हमारा दोगला चेहरा दिखा रहा है.

बात एकदम सीधी और साफ है. आलोचना सिर्फ इसलिए हो रही है क्योंकि महिलाओं को शराब खरीदते देख पुरुषों का नशा खराब हुआ है. वो तमाम लोग जो मामले को लेकर मोर्चा खोले हैं उनका दुख शराब नहीं है बल्कि कष्ट का कारण ये है कि आखिर कैसे महिलाएं शराब खरीद रही हैं.

Woman, Liquor, Lucknow, UP, Culture, Civilization, Satireलखनऊ में स्त्री पुरुष के बीच शराब को खुलासा हुआ है वो विचलित करने वाला है

बताते चलें कि लखनऊ वो शहर है जिसका शुमार Tier 3 शहर में होता था लेकिन पूरे देश की तरह विकास क्योंकि लखनऊ में भी हुआ इसलिए अब धीरे धीरे ही सही शहर Tier 2 शहर की तरफ कदम बढ़ा रहा है. शहर आगे बढ़ रहा है तो जाहिर है लोग मॉडर्न भी बनेंगे और जैसा आजकल का माहौल है आदमी तब मॉडर्न होता है जब वो जाम से जाम लड़ाए. बस ये बात है और लखनऊ / लखनऊ की महिलाएं हैं.

लखनऊ की महिलाएं भी शायद यही सोच रही हों कि वो तभी विकासशील से विकसित कहलाएंगी जब वो एक सहेली से वोदका और दूसरी संग टकीला के शॉट लड़ाएगी. जैसा लखनऊ का माहौल है शहर भर में चाहे वो अलीगंज हो या फिर इंदिरानगर, गोमतीनगर महानगर शहर भर में ठेकों या सभ्य भाषा में कहें तो मॉडल शॉप्स की भरमार है दिन का कोई भी पहर हो पियक्कड़ों का तांता लगा रहता है.

कुछ शराबी तो ऐसे हैं कि जब तक अंगूर की बेटी इनके गले से उतरकर उसे तर नहीं करती इन्हें लगता ही नहीं कि सुबह हुई है और दिन शुरू हुआ है. अब बताइये जिस शहर में पियक्कड़ भाइयों का लेवल इतना हाई हो वो किसी की लुगाई को अगर बियर का केन या फिर ओल्ड मॉन्क का क्वार्टर खरीदते देखे तो उसका बीपी भी हाई होगा और कोलेस्ट्रॉल भी बढ़ेगा.

ये तो हो गई बेहद सामान्य सी बातें याब अगर उन बातों को, जिनमें लखनऊ को अदब के अलावा तमीज और तहज़ीब का मरकज कहा गया है उसका जिक्र करें तो ये उपलब्धि अगर आज शहर का सीना 56 इंच करती है तो इसकी एकमात्र वजह 'नवाबीन ए अवध या रॉयल फैमिली ऑफ अवध हैं. अवध के नवाबों का शराब को लेकर शौक किसी से छिपा नहीं है. अगर ये कहा जाए कि लखनऊ में महिलाओं को शराब खरीदते देख वहां ऊपर स्वर्ग में नवाब साहब की आत्मा रो रही होगी.

तो भइया बात अगर ऐसी है तो यकीन मानिए तमीज तहज़ीब को लेकर नवाब साहब के पूरे कॉन्सेप्ट में ही बड़ा झोल था. होना तो ये चाहिए था कि वो नवाब साहब जिनकी आत्मा वहां ऊपर स्वर्ग में दरुअल महिलाओं को देखकर आहत हो रही है उसे तो तब भी आहत होना चाहिए था जब उसने देखा हो कि 'विकासनगर का कोई पुरुष राजाजीपुरम आकर ब्लेंडर्स का हाफ खरीद रहा है.

गोल मोल बात करने का कोई कोई फायदा नहीं है. पुरुष शराब पियें और महिलाएं न ले ये एक लंबी डिबेट है. अगर सुधार हो तो फुर स्त्री पुरुष दोनों में हो. शराब छूटे तो जैसी स्त्री छोड़े वैसे ही पुरूष भी. यदि तमाम तरह की नाक भौं सिकोड़ने के बावजूद शराब पी जा रही है तो फिर स्त्री भी उसे उतना ही खुलकर पिये जितना कोई पुरूष पी रहा हो.

देखिये भाईसाहब! शराब को लेकर ये स्त्री पुरुष वाली दोगलापन नहीं चलेगा. जब देश बराबरी से स्त्री और पुरुष दोनों का है. जब देश की संपदा पर स्त्री और पुरुष दोनों का ही समान हक़ है तो फिर शराब का गिलास इससे अछूता क्यों रहे. याद रहे देश में बहस के तमाम मुद्दे हैं और उन मुद्दों में भी बड़ा मुद्दा महिलाओं का सिगरेट शराब पीना और समाज से बदचलन, बेगैरत कहलाना है.

सवाल ये है कि जो समाज सिगरेट शराब पीने वाली महिला को बदचलन कह रहा है तब उसके मुंह में ताले क्यों जड़ जाते हैं जब एक पुरुष शराब के नशे में धुत पुरुष नाली में पड़ा होता है. लखनऊ की तो बात ही छोड़ दीजिये क्या ऐसा पुरुष किसी दूसरे शहर के कल्चर वहां की तमीज तहज़ीब को प्रभावित नहीं करता? ये बहुत बड़ा सवाल है जिसका नारीवाद और नारीवादियों से कोई लेना देना नहीं है. आदमी में यदि विवेक हो तो ऐसे सवालों का उठना स्वाभाविक से कहीं ज्यादा, वक़्त की जरूरत है.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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