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Updated: 12 फरवरी, 2021 04:28 PM
सर्वेश त्रिपाठी
सर्वेश त्रिपाठी
  @advsarveshtripathi
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इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता.

अकबर इलाहाबादी

देश दुनियां में इस वक्त प्रेम सप्ताह चल रहा है. शायद सात फरवरी से जो ये फलाने डे ढिमकाने डे का सिलसिला चल रहा है उसका प्रेम चतुर्दशी (वेलेंटाइन डे) को पारन होगा. अभी कल चॉकलेट डे और भालू डे गुजरा है. कल क्या डे है यह भी रात तक भाई लोग एफबी ट्विटर पर अपडेट कर ही देंगे. अपन का क्या. हम लोग भाई राजकपूर से राजकुमार राव की पीढ़ी के बीच वाले प्राणी ठहरे. बीच में शाहरुख सलमान गोविन्दा ने हम लोगों को भी प्रेम का थोड़ा मोड़ा पाठ और तरीका सीखा ही दिया था. बस 'कर दे मुश्किल जीना इश्क कमीना' टाइप आक्रामकता नहीं ला पाए. कैसे लाते भाई? हम लोग जिस समय पैदा हुए बाबू और अम्मा मुंह से कम और चप्पल और चिमटा से ज्यादा बात करते थे. तो अव्वल उस डर के कारण दूसरे तब की फिल्मों में प्रेम के कबूतर कबूतरी के चोंच लड़ाने वाले बिम्ब के असर से किशोर वय में हम सब प्रेम के नाम पर किसी पेड़ की छाल पर दिल की आकृति उकेर कर उसमें एक तीर घुसेड़ कर ही दिल को सांत्वना दे लेते थे.

Valentine Day, Valentine Week, Love, Girlfriend, Boyfriend, Film, Bollywoodइश्क़ के हफ्ते में सिर्फ मुहब्बत उसके सिवा कुछ नहीं है

फ़िलहाल यह सब तो अपने अपने भाग्य की बात है. छोटे कस्बों के हम सब अपने बचपन को तो जी भर कर जिए लेकिन किशोर होते ही कैरियर की चिंता में ऐसे फंसे कि आज तक इसी चिंता में घुले जा रहे है. वैसे इस वक्त कैरियर की चिंता भी अपनी न होकर मां बाप की चिंता थी. इंटर में गणित पढ़ने वाले बेचारे पॉलीटेक्निक और इंजीनियरिंग के तैयारी में और बायो वाले डॉक्टरी की तैयारी में रेल दिए जाते थे.

कुछ हमारे जैसे चतुर या कहे पढ़ाई में दोयम दर्जे वाले प्राणी भी थे जो सिविल की तैयारी के नाम पर कुछ समय इधर उधर तांक झांक कर लेते थे. लेकिन क्या अपर क्या लोअर सभी आर्थिक संवर्गों में किशोर वय के बच्चों की हालत कमोबेश एक ही थी. यानि सोलह सत्रह साल की उमर से कोल्हू के बैल की तरह जीवन की मूषकदौड़ में लग जाना.

इसी चक्कर में हमारी वाली पीढ़ी को ससुरा न माया ही मिली और न राम ही मिले. एक गुप्त बात बोले प्रेम की इस सप्ताह में आप सब एक बात गौर करिए ये नईके लरिका से ज्यादा हमारी पीढ़ी यानि चालीस के आसपास वाले ज्यादा प्रेम प्रेम चिल्ला रहे है. बताइए च्यवनप्राश खाने की उमर मे अब चॉकलेट खा के हमसे क्या उखड़ेगा. ख़ैर इसे आप सब मेरी ईर्ष्या भी कह सकते है पर 101% आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि यह कुंठा नहीं है.

आखिर हम सब भी प्रोफेसर मटूकनाथ के चेले रहे है. हां तो बात चल रही थी प्रेम के सप्ताह पर. कितना अच्छा लग रहा है कि इस सप्ताह किसान और पिसान दोनों को हम सब ने किनारे कर दिया. अब जो राजकाज है उससे कितने दिन कोई अपनी भावना जोड़े रखे भाई. 'टेक अ ब्रेक ब्रो!' अभी तो वैसे ही कोरोना का टीका ठुकवाना है.

वैसे ही यह पर्व 14 फरवरी को यानि वेलेन्टाइन डे तक ही रहेगा. उसके बाद बाज़ार होली में मुनाफा खोजेगा. 'व्यक्तिवाद' ने तो त्योहार के आत्मीय पलों को वैसे भी लगभग छीन ही चुका है. तो प्रेम के इस सप्ताह को जी भरकर महसूस करिए. अगर मेरी तरह शादीशुदा है तो सिमरन की तरह अपनी जिंदगी के इन पलों को जीने में थोड़ी दिक्कत तो होगी ही पर डोंट वरी डूड.

वैसे भी उम्र बढ़ने पर हड्डी थोड़ा देर से जुड़ती है. लेकिन अपनी किशोरावस्था के पहले प्रेम के उन अनमोल पलों को महसूस करने में उसकी महक को दिल के बंद संदूक से निकाल कर फिर से उसमें डूबने से किसने रोका है भाई. याद कीजिए उस वक्त को को जब किसी के लिए दिल पहली बार धड़का था. या उस प्रेमिका के लिए जिसके लिए आपने न जाने कितने खत लिखे और उसे कभी दे न पाए.

याद कीजिए आंखों की उस चमक को जो प्रियतम की एक झलक भर से आपकी आत्मा में उतर जाती थी और आज तक दिल के किसी कोने में उसकी याद के दिए की तरह टिमटिमा रही है. याद करिए छूटते उस साथी की उदासी को जिसको आपसे कभी बेइंतहा मोहब्बत थी.

याद करिए उन रास्तों को जहां से आपकी गुजरी मुहब्बत के निशान अब भी सुबह सुबह जमीन पर बिखरे हरसिंगार की तरह भीनी भीनी महक के साथ आपके दिल और दिमाग में ताउम्र के लिए पैबस्त हो चुके है. और अंत में याद रखिए की मुहब्बत यानि इश्क यानि लव ही इस दुनियां को इंसानों की बस्ती बना सकता है. सच्चे और प्यारे इंसानों की बस्ती.

लव यू आल

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लेखक

सर्वेश त्रिपाठी सर्वेश त्रिपाठी @advsarveshtripathi

लेखक वकील हैं जिन्हें सामाजिक/ राजनीतिक मुद्दों पर लिखना पसंद है.

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