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Updated: 11 मार्च, 2017 01:39 PM
पीयूष पांडे
पीयूष पांडे
  @pandeypiyush07
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घर पर ऐसा सन्नाटा पसरा था, जैसा जवान बेटे की मौत के दूसरे दिन होता है. जिस जगह भांग पीसी जानी थी, वहां एक उल्टा पउआ पड़ा था. लेकिन खाली. एक कुत्ता तेजी से पूंछ हिलाते हुए कंफ्यूजन की मुद्रा में टहल रहा था, क्योंकि बाकी दिन बरामदे में घुसते ही एक साथ चारों तरफ से चार-छह लोग उसे लतियाने के लिए आगे बढ़ते थे. उस वक्त कुत्ता खुद से सवाल करता था कि जब वो शांतिवार्ता का पक्षधर है तो ये इंसानगण बिना वार्ता के हिंसा पर क्यों उतर रहे हैं? और अगर बिना बात के ये इंसान टांग उठा रहे हैं तो आखिर 'कुत्ता' है कौन?

कुत्ते का कन्फ्यूजन वाजिब था क्योंकि सन्नाटा था ही ऐसा. कुत्ते ने अपने जन्म के बाद से बीते 15 साल से इस घर में ऐसा सन्नाटा नहीं देखा था. हवेलीनुमा घर के कोनों में इक्का दुक्का इंसान खड़े दिख रहे थे, लेकिन बेजान. कोई हरकत नहीं, कोई आवाज़ नहीं. चुप्प. सांप सूंघने वाले मुहावरे का अगर किसी को प्रैक्टिकल देखना होता तो ये दृश्य विशेष रुप से उन्हीं के लिए था.

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बरामदे से भीतर पहुंचते ही वो ऐतिहासिक ड्राइंग रुम था, जहां न जाने कितने घोटालों का कमीशन लिया गया. जहां न जाने कितनी बार सरकारें गिराने की विफल कोशिशें हुईं. यूं भी क्रांति हर बार कहां सफल होती है ! बलात्कार का पहला मामला दर्ज होने के बाद इसी ड्राइंगरुम से उनकी गिरफ्तारी भी हुई थी. और फिर गिरफ्तारी के महज 12 घंटे बाद ज़मानत पर रिहा होकर जब वो वापस लौटे थे, तो इसी ड्राइंगरुम में जीत के लड्डू बंटे थे. उनकी ख्याति के मुताबिक लड्डू असली घी के थे, और खर्चा सारा रमाकांत हलवाई ने ही उठाया था. इसी ड्राइंगरुम में जब उनका बड़ा बेटा पहला मर्डर करने के बाद वापस लौटा था, तब उन्होंने उसकी पीठ ठोंकते हुए कहा था- शाबाश! अब तुम अपने पैरों पर खड़े होने लायक हो गए हो. इस बार नगरनिगम का चुनाव लड़ लो.

ये ड्राइंगरुम महज ड्राइंगरुम नहीं था. ये भारतीय राजनीति के उन हजारों अदृश्य ड्राइंगरुमों में वो ड्राइंगरुम था, जिसने भारतीय राजनीति को आज उस खास मुकाम पर ला दिया है- जहां से उसका पीछे जाना असंभव है. चूंकि-इतिहासकार स्वार्थी, कामचोर, अज्ञानी वगैरह होते हैं तो उन्हें सिर्फ गांधी-नेहरु-मोदी-पटेल जैसे बड़े नेताओं के ही ड्राइंगरुम में हुए कारनामे दिखायी दिए.

खैर, इसी ऐतिहासिक ड्राइंगरुम में नेताजी पसरे पड़े थे. सन्नाटे का अश्रव्य शोर उन्हें बेचैन किए जा रहा था. जितने नौकर ड्राइंगरुम में आए, उनमें से कुछ गालियां खाकर बाहर जा चुके थे. गालियों में मां-बहनों के लिए प्रगट सम्मान का सम्मान करते हुए कुछ नौकर दरवाजे से ही लौट लिए. गालियां खाकर बाहर गए कुछ नौकर तो मानो सीधे आत्मसम्मान की दुकान पर गए और दो किलो आत्मसम्मान खरीदकर मेमसाहब के सामने नौकरी छोड़ने का ऐलान कर डाला. मेमसाहब भैरंट गुस्से में थीं. गुस्से की तीन वजह थीं. पहली, महज एक हफ्ते बाद होने वाली उनकी स्विटजरलैंड की ट्रिंप कैंसिल हो गई. दूसरी, उन्होंने नेताजी को बहुत समझाया था कि इस बार वो अपनी जगह उन्हें चुनाव लड़वाएं. दो बार चुनाव जीतने के बाद नेता के प्रति भी एंटी इनकमबैंसी फैक्टर हो जाता है. लेकिन नेताजी नहीं समझे. पत्नी की सफलता से जलते हैं न ! और तीसरी वजह यह कि एक दिन बाद होली थी, और एक हारे हुए नेता के यहां होली मनाने कौन आता है?

यूं नेता हार से नहीं घबराता. लेकिन ऐन होली के मौके पर आई हार ने मानो नेताजी के गुलाबी चेहरे को ब्लैक कलर से पोत दिया. नेताजी भली भांति जानते थे कि होली पर मेमसाहब का हाथ पकड़कर गाने पर ठुमकते हुए उनकी तस्वीरें चैनलों पर नहीं चलेंगी. अखबारों में अगले दिन लाल-पीले रंग में पुता उनका फोटू नहीं छपेगा और नहीं छपेगा उनका पारंपरिक भाईचारे का संदेश. ये वही संदेश था, जो सिर्फ होली के मौके पर नेताजी दिया करते थे, और जिस मरने से पहले नेताजी के पिताजी ने उन्हें बाकायदा लिखवाया था. नेताजी अंगूठाछाप नहीं थे. उनके पास किलो के भाव में डिग्रियां थीं. बीए की तो अलग अलग यूनिवर्सिटी से तीन-तीन डिग्रियां थीं. येल यूनिवर्सिटी का नाम सुनने के बाद से वो येल यूनिवर्सिटी की भी डिग्री जुगाड़ने के चक्कर में थे. लेकिन, मसला डिग्री का नहीं, ज्ञान का है और नेताजी को कुछ लिखना होता था तो उनके हाथ-पैर फूल जाते थे. इसलिए भाई-चारे का संदेश पिताजी ने कई साल पहले लिखवाया था, और वो ही संदेश हर बरस होली पर नेताजी अखबार वालों को चेंप देते थे.

होली के मौके पर आने वाला हर गेस्ट देशी-विदेशी दारु की शानदार बोतलें लाया करता था-तो उसका घाटा कौन पूरा करेगा, ये नेताजी की समझ से परे था. एसडीएम-डीएम को रिजल्ट सुनते ही ऐसे रफूचक्कर हुए कि उनका होली पर घर आना ही दुनिया का 8वां आश्चर्य हो सकता है.

बच्चे अलग भनभनाए हुए थे कि अब होली कैसे मनाएं. ये मौका शर्म का है, और शर्म के मौके पर कलरफुल होली मनाना प्रैक्टिकल नहीं. छोटा बेटा तो इसलिए ज्यादा भन्नाया हुआ था कि ठेकेदार अंकल ने होली पर हर्लेडैविडसन की बाइक गिफ्ट करने का वादा किया था लेकिन रिजल्ट के बाद से ही ठेकेदार का फोन बंद है.

बेबस नेताजी से दुखी परिवार का दर्द देखा नहीं जा रहा था. उन्होंने रिजल्ट से पहले गिफ्ट में आई इलायची की दारु का एक पैग बनाया, पीया और लिख दिया चुनाव आयोग को एक एक ख़त. इस लंबे ख़त का मजमून यूं था-

प्रिय चुनाव आयुक्त महोदय,

चुनाव आप जब चाहे कराएं लेकिन नतीजे की घोषणा ऐन त्योहार से पहले ठीक नहीं. और त्योहार होली का हो तो बिलकुल ठीक नहीं. सारा रंग और भंग बेकार हो गए. सिर्फ होली पर ही पूरे साल की शराब आ जाती है, तो उसका टोटा पड़ना तय है. होली पर तमाम काम कार्यकर्ता रुपी चेले करते हैं तो इस बार कई काम खुद करने होंगे. यह सब इसलिए क्योंकि आपने ऐन होली से पहले नतीजे की घोषणा कर दी. बाकी हार जीत तो चलती रहती है. नेता हार-जीत निरपेक्ष होता है. उम्मीद है कि आप मेरा और मेरे जैसे हजारों नेताओं का दर्द समझेंगे. वैसे, मैं जानता हूं कि आप नहीं समझेंगे क्योंकि एक हारे हुए नेता के लिए होली का दर्द क्या हो सकता है-ये सिर्फ एक हारा हुआ नेता जानता है.

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लेखक

पीयूष पांडे पीयूष पांडे @pandeypiyush07

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और व्यंगकार हैं.

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