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Updated: 10 जून, 2022 09:16 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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12 बजे का वक़्त और जून का ये जुल्मी-जानलेवा महीना यानी सूरज सिर पर. गर्मी के चलते गली खाली थी तो होना तो चाहिए था Pin Drop Silence लेकिन जब बात दूर तक सुनानी होती है तो आवाज बुलंद करनी पड़ती है. दो- चार पत्थर जुटे थे. आपस में गुटरगूं कर रहे थे. उन्हें एक अद्धे को अपने साथ ले जाना था - आवाज आई - अरे ओ  जानेमन जरा बाहर निकल. आज जुम्मा है! जुम्मा सुनना भर था. अद्धा जो कि नाली में छिपा हुआ था भनभनाता हुआ बाहर आया और उन पत्थरों से कहने लगा - हां बिरो ! बता किसपर बरसना है आज तेरा भाई पूरी तैयारी से है. अभी इतनी ही बात हुई थी छोटा पत्थर, बड़े पत्थरों से बोला - Oh Shit Man ये तो 'मोली साहब ने व्हाट्सअप ग्रुप पर बताया ही नहीं.

तो मितरों आज जुम्मा था. ऐतिहासिक दिन. प्रदर्शन का दिन. इस्लाम बचाने का दिन. पैग़म्बर मोहम्मद को इंसाफ दिलाने का दिन. अभी दिन ही कितने हुए हैं. पिछले ही हफ्ते की तो बाप थी. नूपुर शर्मा के बयान पर कानपुर के बेकनगंज में टोपियां बौराई थीं और जो बेशर्मी का नंगा नाच हुआ था क्या ही बताया जाए. सारी लाइम लाइट कानपुरिया पत्थरों ने बटोरी थी. सिर्फ पंद्रह बीस मिनट आधे घंटे की घटना ने कनपुरिया पत्थरों को सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं विदेश में भी Talk of the Town बना दिया.

Friday, Violence, Namaz, Kanpur, Lucknow, Prayagraj, West Bengal, Stone Pelting, Yogi Adityanathजुमे की नमाज के बाद पत्थर चलकर मुसलमानों ने फिर लोकतंत्र को शर्मिंदा किया है

जलन इंसानों में ही रहती तो क्या बात थी. ये पत्थरों में भी फैली और पत्थर संक्रमित हुए. नतीजा वही निकला जिसे व्यंग्य के भीष्म पितामह हरिशंकर परसाई ने 'आवारा भेड़े के खतरे में' बरसों पहले कह दिया था. क्या प्रयागराज और लखनऊ क्या दिल्ली, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ लाइम लाइट सबको पानी थी, मीडिया के कैमरों में सबको आना था जो दास्तां बीते जुम्मे को अधूरी छोड़ दी गयी थी उसे इस जुम्मे पूरा किया गया.

देश भर के तमाम शहरों के वो पत्थर जो रसूल को इंसाफ दिलाने के लिए प्रदर्शनकारियों के हाथ लगे थे भली प्रकार जानते थे कि मुक्ति अकेले की नहीं होती. अलग से अपना भला नहीं हो सकता. पत्थरों को पता था मनुष्ट की छटपटाहट है मुक्ति के लिए, सुख के लिए, न्याय के लिए. पर यह बड़ी लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है.

उपरोक्त विचार ने पत्थरों को एकजुट किया और उन्माद के जो चित्र हम अपनी- अपनी टीवी स्क्रीन पर देख रहे हैं. परसाई की ही उस बात की पुष्टि कर देते हैं जिसमें कहा गया है कि, धार्मिक उन्माद पैदा करना, अन्धविश्वास फैलाना, लोगों को अज्ञानी और क्रूर बनाना राजसत्ता, धर्मसत्ता और पुरुषसत्ता का पुराना हथकंडा है.'

रसूल को हक़ दिलाने के लिए देश भर के अलग अलग शहरों में पड़े पत्थरों ने शायद ग़ालिब को बहुत सीरियसली ले लिया और ये कह कर परमपिता परमात्मा के पास चले गए कि  

ये कहां की दोस्ती है के, बने हैं दोस्त नासेह 

कोई चारासाज़ होता,  कोई ग़म गुसार होता.

बरोज जुम्मा देश भर में हुई पत्थरबाजी पर हम फिर परसाई को कोट करना चाहेंगे जिन्होंने कहा था कि सत्य को भी प्रचार चाहिए, अन्यथा वो मिथ्या मान लिया जाता है. और भइया आज का सत्य यही है कि जुम्मे के दिन मुस्लमान मस्जिद इबादत करने या नमाज पढ़ने के लिए बल्कि हुड़दंग मचाने, बवाल करने, पत्थर बरसाने के लिए जाता है. रसूल की आड़ लेकर जैसी नौटंकी बीते दिन से चल रही है कहीं ऐसा न हो मुस्लिम इतिहासकार जुम्मे को एंटी नेशनल गतिविधि के लिए वक़्फ़ कर दें. 

जिक्र दिल्ली की गली में संवाद करते हुए पत्थरों का हुआ है तो हम उन्हें गीता की उस पंक्ति की याद ज़रूर दिलाना चाहेंगे जिसमें लिखा है कि कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन. पत्थर संक्रमण में हैं और शायद प्रभाव में भी इसलिए हो ये सकता है कि वो इस पंक्ति को न समझ पाएं. पंक्ति कहती है कि तुम्हारे अधिकार में सिर्फ कर्म करना है, तुम फल की इच्छा मत करो.

वाक़ई कितनी सही बात लिखी है गीता में. पत्थरों ने अपना कर्म कर लिया है फल अगर अल्लाह ने चाहा तो बुलडोजर देगा. उसके बाद क्या नाटक होगा? न कुछ कहने की जरूरत है. न कुछ बताने की. बाकी अगर अब भी कोई कंफ्यूजन में रहे तो अपने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हमेशा ही दंगाइयों को अच्छा सिला दिया है. 

भले ही नूपुर शर्मा विवाद में पैगम्बर मोहम्मद की शान बचने के लिए सड़कों पर उमड़ी नमाजियों की भीड़ ने अपनी जिद पूरी कर ली लो लेकिन बेचारे पत्थर! इनके साथ फिर धोखा हुआ. इन्हें इस्तेमाल करके फिर फ़ेंक दिया गया है और एजेंडा हावी है. हां वही देश की अनेकता एकता और भाईचारे को तोड़ने का एजेंडा. मुद्दा रसूल की शान में की गयी गुस्ताखी है ही नहीं. मुद्दा है अहम्.

जुम्मे को जहन्नुम की शक्ल देने वाले मुसलामानों अब जबकि तुम फिर एक बार अपनी बदनामी करा चुके हो. चलने के बाद रोड पर आराम फरमाते पत्थर भी आपस में यही बातें कर रहे हैं कि इनको (मुसलमानों को) क्या लगा? रसूल खुश होंगे? शाबाशी देंगे? बिलकुल नहीं. एक एजेंडे की गिरफ्त में आए पत्थरों ने साफ़ कह दिया है इनका इलाज सिर्फ बुलडोज़र है. सिर्फ और सिर्फ बुलडोज़र. न उससे कम और न ज्यादा. ज्यादा रहे तो उससे भी अच्छा.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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