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Updated: 25 फरवरी, 2019 05:30 PM
श्रुति दीक्षित
श्रुति दीक्षित
  @shruti.dixit.31
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भारत को ऑस्कर की झलक 10 साल बाद एक बार फिर देखने को मिली है. ये पूरी तरह से भारतीय न भी सही, लेकिन इस अवॉर्ड की खनक तो भारतीय कानों में गूंज ही रही होगी. इस अवॉर्ड के सबसे खास होने का कारण ये भी है क्योंकि इसमें सदियों से औरतों की शर्मिंदगी का कारण बनने वाला विषय पीरियड अहम मुद्दा है, भले ही पीरियड आम बात हो, लेकिन महिलाओं को इसे छुपा कर रखना होता है. भारत जैसे देश में इसे शर्म का घूंघट उढ़ा दिया जाता है. इस फिल्म का नाम है 'Period. End of Sentence'. ये फिल्म महावारी पर बनाई गई है. वो महावारी जिसके बारे में भारत में बात नहीं की जाती. इसे भारत में हवा की तरह माना जाता था ये होती तो थी, लेकिन कोई इसके बारे में बात नहीं करता था. सबसे पहले तो यकीन करना ही मुश्किल है कि भारत की महावारी की समस्या पर बनी एक फिल्म ने ऑस्कर जीत लिया है.

ये फिल्म अक्षय कुमार की पैडमैन की तरह ही है. अक्षय कुमार की फिल्म Arunachalam Muruganantham की जिंदगी पर आधारित थी जिसमें वो एक हीरो के तौर पर दिख रहे थे, लेकिन Period. End of Sentence एक ऐसी फिल्म है जिसमें नायक, नायिका और स्टारकास्ट वो महिलाएं ही हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी बदल दी है.

ईरानी डायरेक्टर की फिल्म जो भारत की सच्चाई दिखाती है-

पिछली बार जब देश पर बनी विदेशी फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनएयर' के लिए ए.आर.रहमान को ऑस्कर मिला था तब भी हम बहुत खुश थे और 2019 में मिले ऑस्कर के लिए हमें सोचना चाहिए कि हमारे देश की सच्चाई जिसे हम पर्दे पर नहीं दिखा पाए वो किसी और ने दिखा दी. राजधानी दिल्ली से सिर्फ 60 किलोमीटर दूर मौजूद गांव में अगर ये हाल है तो उसे हमारी फिल्म इंडस्ट्री दिखा पाने में नाकाम रही या हमारा देश उस हालत को बदलने में नाकाम रहा. फिल्म की डायरेक्टर हैं Rayka Zehtabchi जो एक ईरानी-अमेरिकी फिल्ममेकर हैं. इस फिल्म को प्रोड्यूस किया है भारतीय प्रोड्यूसर Guneet Monga ने. सिख्या एंटरटेनमेंट के तहत बनी इस फिल्म की कहानी है दिल्ली से 60 किलोमीटर दूर हापुर गांव की जहां महिलाओं को पैड के बारे में पता भी नहीं था.

पीरियड, महिलाएं, भारत, ऑस्करइस फिल्म में हापुड़ गांव की कहानी दिखाई गई है. कई महिनो की मेहनत के बाद ये प्रोजेक्ट पूरा हो पाया है.

क्यों ये फिल्म है पैडमैन से अलग?

सीधी सी बात है. पैडमैन फिल्म कमर्शियलाइज्ड थी. उसमें एक हीरो की कहानी थी जो किसी छोटे से गांव में दुनिया से लड़कर भी महिलाओं की जिंदगी सुधारने की कोशिश कर रहा है, वो फिल्म उसी कहानी को दिखाती थी. उस कहानी में सच्चाई तो थी, लेकिन फिर भी उसे बड़े पर्दे पर हीरो की कहानी के रूप में ही दिखाया गया. पर यहीं पीरियड एक ऐसी फिल्म है जिसमें कुछ भी फिल्टर नहीं किया गया है. इस फिल्म में कहानी हीरो की नहीं बल्कि उन विक्टिम की है जो आए दिन इस पीरियड की समस्या को झेलती हैं जिनको न सिर्फ पैड देना बल्कि उसका इस्तेमाल करना और अपने घर में खुलकर उसके बारे में बात करना भी सिखाना जरूरी है.

पीरियड फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे स्कूल जाती हुई बच्चियां कैसे परेशान होती हैं, पीरियड्स कैसे उन्हें पढ़ाई से रोक देता है. कैसे स्कूल जाने वाले लड़के तक पीरियड की बात सुनकर हंसी उड़ाने लगते हैं और कुछ शर्मा जाते हैं. कैसे लड़कियों को ये पता भी नहीं है कि पैड क्या होता है और उन्हें पीरियड के खून से गीला हुआ कपड़ा ही बार-बार इस्तेमाल करना पड़ता है. ये परेशानियां उन महिलाओं और छोटी बच्चियों के साथ होती है जिन्हें खेतों में काम करना पड़ता है, घर का सारा काम करना पड़ता है, लेकिन ये लोग कभी अपनी सुविधा के बारे में नहीं सोच पाते. पीरियड्स का मतलब पढ़ाई रुक जाना. फिल्म में एक महिला खुद का अनुभव भी बता रही है कि कैसे उसे पीरियड शुरू होने के बाद स्कूल में बहुत दिक्कत होती थी. वो गंदा कपड़ा बदल भी नहीं पाती थी और उसके लिए उसे बहुत दूर जाना होता था. वो महिला अपने स्कूल की क्लास बार-बार छोड़कर दाग के डर से कपड़ा देखने जाती थी और कई बार लड़कों के मौजूद होने के कारण वो ये भी नहीं कर पाती थी. 1 साल तक ये सब सहने के बाद उसने आखिर स्कूल जाना ही बंद कर दिया.

पीरियड, महिलाएं, भारत, ऑस्करमहिलाएं घूंघट की आड़ में भी काम करने को तैयार हैं. वो अपना चेहरा इसलिए छुपा रही हैं क्योंकि वो पीरियड से जुड़े किसी काम को कर रही हैं.

क्या है कहानी?

कहानी कुछ यूं है हापुर गांव की एक लड़की जो पुलिस ऑफिसर बनने का सपना रखती है जब उसे सेनेट्री पैड मशीन की सुविधा मिलती है तो वो अपने गांव औऱ आस-पास की महिलाओं की जिंदगी सुधारने में लग जाती है. गांव की महिलाएं साथ देती हैं, साथ ही कुछ महिलाओं को इसमें झिझक लगती है और सेनेट्री पैड मशीन का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं कैसे झिझकने वाली महिलाओं की सोच बदलती हैं. ये शुरू एक प्रोजेक्ट की तरह हुआ था, लेकिन अब हापुर गांव का एक बिजनेस बन गया है जिसमें महिलाएं ही योगदान देती हैं.

इस फिल्म में बहुत सच्चाई है. लड़कियां और बूढ़ी औरतें भी झिझकती हैं पीरियड के बारे में बात करने पर और कैसे वो छुप जाती हैं अपने घूंघट के पीछे. कैसे वो कभी नहीं सोचतीं कि ये आम है. स्नेहा जिस लड़की ने सब बदलने का बीड़ा उठाया ये उस लड़की की कहानी है जो न सिर्फ अपने गांव की हर महिला को पीरियड के बारे में जानकारी देना चाहती है बल्कि उनके स्वास्थ्य के लिए भी सुरक्षित पैड्स कम दाम में मुहैया करवाना चाहती है और इससे जो पैसा मिल रहा है उसे स्नेहा पुलिस में भर्ती होने का अपना सपना पूरा करना चाहती है.

कैसे शुरुआत हुई इस प्रोजेक्ट की?

ये दरअसल एक सोशल वर्क प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुआ. लॉस एंजिलिस के ओकवुड स्कूल के बच्चों ने कई तरीकों से पैसे इकट्ठे किए और फिर हापुर में एक सेनेट्री पैड की मशीन लगवा दी. इसी प्रोजेक्ट को एक सफल बिजनेस के तौर पर हापुर की महिलाएं पूरा कर रही हैं. ये मशीन लगाई गई तो इस गांव की महिलाओं को नई जिंदगी मिल सकी.

भारत की असलियत पर ये फिल्म विदेशियों की मदद से बनाई गई है, लेकिन हमारे बॉलीवुड की चकाचौंध में शायद ये असलियत कहीं खो जाती है. भारतीय फिल्मों को ऑस्कर जीतने के लिए जहां हम इंतजार करते हैं वहीं ये सोचना बहुत मुश्किल नहीं है कि आखिर भारत से जुड़ी किस तरह की फिल्मों को ऑस्कर मिल रहा है. 91st Academy Awards भले ही इस साल बिना एंकर के थोड़े बोरिंग हो गए हों, लेकिन पहली बार पीरियड्स पर बनी एक फिल्म को ऑस्कर देकर ये जरूर साबित कर दिया है कि ये सबसे अलग हैं.

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श्रुति दीक्षित श्रुति दीक्षित @shruti.dixit.31

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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