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Updated: 17 अप्रिल, 2020 08:13 PM
अनु रॉय
अनु रॉय
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'फ़ोर मोर शॉट्स सीज़न टू मिक्स्चर है वीरे दी वेडिंग, आयशा जैसी फ़िल्मों का. जो न तो दिल को छूती हैं और न ज़िंदगी को.'

हिंदुस्तानी वेबसीरिज़ (Web Series) में रिबेल, फ़ेमिनिस्ट, आत्मनिर्भर स्त्रियों का एक ही अर्थ है ख़ूब सारा सेक्स, शराब और गालियां देती औरतें. जिनके ज़िंदगी में तकलीफ़ के नाम पर है मोटापा, ब्रेक-अप, चीटिंग और पिरीयड में टैम्पान कैसे यूज़ किया जाये. क्या सच में भारत का जो अपर-क्लास है वो इसी बात को लेकर परेशान रहते हैं. क्या उनकी ज़िंदगी में कोई और समस्या नहीं होती होगी? कम से कम फ़ोर मोर शॉट्स के सीज़न टू (Four More Shot Please सीजन 2) को देख कर मुझे यही लगा. दूसरे सीज़न की कहानी वहीं से शुरू होती है जहां से पहला सीज़न ख़त्म हुआ था.  

Amazon Prime, Four More Shot Please, Review, Feminism अमेज़न प्राइम पर टेलीकास्ट फ़ोर मोर शॉट्स प्लीज़ ने फेमिनिज्म की परिभाषा ही बदल दी है

मानवी यानि सिड ख़ुद को तलाशने के लिए इस्तांबुल चली गयी हैं. वहां पर ‘ईमो’ यानि एमोशनल महसूस करने पर वो रोते हुए अपनी दोस्त बानी जे को कॉल करती हैं और कहती हैं कि मैं सुसाइडल फ़ील कर रही हूं. इतना सुनते ही बानी जे अपनी दो और दोस्तों, कृति और सयानी को कॉल करती हैं और बताती हैं कि सिड प्रॉब्लम में है इसलिए हम सबको इस्तांबुल चलना होगा. वैसे पिछला सीज़न इन चारों की लड़ाई से ही ख़त्म हुआ था. चार महीने बाद इन तीन दोस्तों में आपस में पहली बार बात हो रही और दो सीन के बाद ये तीनों इस्तांबुल में हैं अपनी चौथी दोस्त सिड को बचाने के लिए. जो किसी मेल-स्ट्रिपर के साथ रात गुज़ार कर ख़ुश हो रही होती है. चारों इस्तांबुल में चार महीने बाद एक साथ हैं. शिकवे-शिकायत के दौर के बाद चारों अपनी ज़िंदगी में क्या चल रहा डिस्कस करते हैं और फिर वापिस इंडिया लौट आते हैं. उसके बाद इन चारों किरदारों की ज़िंदगी क्या मोड़ लेती है यही सीज़न टू के बाक़ी के नौ एपिसोड में दिखाया गया है.

कहानी की बात करें तो ये हॉलीवुड के सीरिज़ से ले कर वीरे दी वेडिंग और सोनम कपूर की फ़िल्म आईशा सब की गंदी कॉपी है. प्रीतिश नंदी प्रोडक्शन की इस सीरिज़ के स्क्रीनप्ले से ले कर डायलॉग सब ऐसे लगते हैं कि जैसे बिना मन से किया गया कोई टास्क हो. किरदारों की बात करें तो चारों अहम किरदार अपने काम को अंजाम देने में नाकाम साबित हुई हैं और सिर्फ़ मिलिंद सोमन का किरदार ऐसा है जो आपको बांध कर रख पाएगा.

“बहनों शॉट्स मारो ऐश करो. शॉट्स मारो. शॉट्स मारो!

बानी जे पूरी सीरिज़ में चिल्लाती हैं और रोडीज़ वाले इक्स्प्रेसन देती नज़र आ रही हैं.  कह सकते हैं कि सीरियस ऐक्टिंग उनके बस की बात नहीं है. एक तो उनका फ़ेक एक्सेंट, ऊपर से डायलोग बोलने का कॉन्स्टिपेटेड अंदाज एक वक़्त के बाद इतना बोझिल हो जाता है कि उनको स्क्रीन पर देख कर मैं सीन फ़ास्ट फ़ॉर्वर्ड कर देती हूं और एक चीज़ जो उनके हिस्से आयी है वो है उनका जिम में होना. उनके किरदार को डायलॉग से ज़्यादा डंबल उठाने वाले दृश्य मिलें हैं.

तुम मेरे लिए कभी लड़े ही नहीं वरुण!

कृति कुल्हाड़ी यानि फ़ोर मोर शॉट्स की अनज़ इस पूरी सीरिज़ की सबसे कम्पोज़्ड और स्ट्रॉंग किरदार हैं जिन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ अपना किरदार निभाया है. उनको देखने के लिए ये पूरी सीरिज़ देखी जा सकती है. सीरीज में दिखाया गया है कि पहले पति से तलाक़ के बाद जहां एक तरफ वो अपनी बेटी की परवरिश कर रही हैं तो वहीं वर्किंग वीमेन होने के नाते में काम भी कर रही हैं. सीरीज में उन चुनौतियों का भी जिक्र है जिसमें इन्हें एक ऐसा बॉस मिलता है जो इन्हें हर कदम पर नीचा दिखाता हैलेकिन वो हार नहीं मानतीं.

फिर आती हैं मानवी यानि सिड जो ग्रुप की पैम्पर बच्ची जैसी हैं. उनको पता ही नहीं है कि उनको आख़िर करना क्या है ज़िंदगी में. मानवी का ये किरदार उनके वीरे दी वेडिंग के किरदार से काफ़ी मिलता जुलता है. उनके हिस्से में वही आया है कि एक मोटी सी लड़की जो अपने बढें हुए वजन को ले कर परेशान है. उसका कोई बॉयफ़्रेंड नहीं है और करियर को ले कर वो सिरियस नहीं हो पा रही हैं. अपने मोटापे को ले कर वो इतनी इंसीक्योर है कि इस चीज़ से निकलने के लिए वो कई लड़कों के साथ सेक्स करती हैं.

चौथी और आख़िरी दोस्त हैं सयानी गुप्ता जो एक किताब पर काम कर रहीं हैं लेकिन फ़ोकस उनका अपने पिछले रिश्ते से हटा नहीं है.

अब इन चार अलग-अलग किरदार की कहानी को दिखाने के लिए कई सपोर्टिंग किरदार आए हैं, जो इन अहम किरदारों से ज़्यादा बेहतर रोल प्ले करते नज़र आते हैं. उनमें मिलिंद सोमन सबसे प्यारे लगते हैं.

ये तो हो गयी किरदारों की बात जिनके हिस्से में न तो ढंग के डायलॉग आएं हैं और न ही ऐसी कहानी लिखी गई है जो दिल को छू जाए. इसके अलावा एक चीज़ जिसने मुझे इस सीजन में परेशान किया है वो है फ़ेमिनिस्ट और निजी स्पेस को समझाने में फेल होते हिंदी वेबसीरिज़ और इनके डायरेक्टर. इनको ये समझना होगा कि आज़ाद और आत्मनिर्भर लड़कियां सिर्फ़ शराब, सेक्स और सिरगरेट नहीं पीती हैं.

फ़ेमिनिज़म के नाम पर जो इन सीरिज़ में दिखाया या बताया जा रहा वो किसी व्यक्ति विशेष की पसंद और उसकी निजी आज़ादी भर है. फ़ेमिनिज़म का इन चीज़ों से कोई लेना देना नहीं है. रिबेल होने का मतलब गाली देना नहीं होता. फ़ोर मोर शॉट्स सीज़न टू भी अपने पिछले सीज़न जैसा ही है. जो भारत के अपर क्लास को ऊपर से छूकर गुजरता हुआ नजर आ रहा हैं. इस सीजन में भी ऐसा कुछ नहीं है कि आदमी अपने को इससे रिलेट कर ले हालांकि संभावनाएं खूब थीं.

कुल मिलाकर हमारी कही बातों का सार बस इतना है कि समलैंगिक रिश्ते, तलाक़ और धोख़ा ये सब बेहद गहरे रंग हैं ज़िंदगी के इन्हें आप ऐसे बिलकुल नहीं दिखा सकते जैसे फ़ोर मोर शॉट्स प्लीज़ में दिखाया गया है और उसे  फ़ेमिनिज़म और मॉडर्न बनने का तमगा दिया गया है.

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लेखक

अनु रॉय अनु रॉय @anu.roy.31

लेखक स्वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं, और महिला-बाल अधिकारों के लिए काम करती हैं.

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