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Updated: 13 फरवरी, 2019 06:22 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujkumarmaurya87
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जिस दौर में हर कोई इंटरनेट का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने में लगा हुआ है, उस दौर में रूस ने पूरे देश में इंटरनेट बंद करने का फैसला किया है. फिलहाल तो ये फैसला अस्थाई तौर पर लिया गया है, ताकि देश की साइबर डिफेंस क्षमता का आकलन किया जा सके, लेकिन एक बार बंद होने के बाद इंटरनेट दोबारा चलेगा या नहीं, ये कहा नहीं जा सकता. रूस अपने देश के इंटरनेट को अमेरिका से बचाने के लिए ये अहम कदम उठा रहा है. दरअसल, रूस को डर है कि अमेरिका कभी भी रूस का इंटरनेट बंद कर सकता है, जिससे देश को काफी नुकसान होगा और ऐसे में रूस पहले से ही तैयार रहना चाहता है. हालांकि, ऐसा कर के रूस खुद ही अपने आप को पूरी दुनिया से अलग-थलग कर लेगा.

रूस की एक न्यूज साइट RBC में छपी खबर के अनुसार रूस अपना खुद का इंटरनेट बना रहा है, जिसे RuNet नाम दिया जा रहा है. इसके लिए तो बिल भी तैयार हो चुका है, जो मंगलवार को ही संसद में पास भी हो गया है. यानी आने वाले कुछ महीनों में इसे लागू कर दिया जाएगा. इस तरह रूस के लोग ग्लोबल इंटरनेट का हिस्सा नहीं रहेंगे. हालांकि, दुनिया से जुड़े रहने का तरीका भी रूस ने निकाला है, लेकिन वो कितना कारगर होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता.

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1- क्या है RuNet बिल?

इस बिल के तहत रूस में एक ऐसी व्यवस्था शुरू की जा रही है, जिससे सिर्फ देश के अंदर ही पूरी आजादी के साथ इंटरनेट इस्तेमाल किया जा सकेगा. अगर कोई भी ट्रैफिक रूस से बाहर जाएगा और वर्ल्ड वाइड वेब से जुड़ना चाहेगा, तो उसे कई एक्सचेंज प्वाइंट्स से होकर गुजरना होगा. इन एक्सचेंज प्वाइंट्स को रूस का कम्युनिकेशन रेगुलेटर Roskomnadzor नियंत्रित करेगा. अब यहां एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर रूस अमेरिका से इतना डरा हुआ क्यों है?

2- पुतिन इंटरनेट को 'सीआईए प्रोजेक्ट' क्यों कहते हैं?

अगर रूस के नए बिल की बात करें तो ये साफ होता है कि वह अमेरिका से डरा हुआ है. पुतिन तो यहां तक कह चुके हैं कि इंटरनेट एक 'सीआईए प्रोजेक्ट' है. आपको बता दें कि सीआईए अमेरिका की जांच एजेंसी है. पुतिन के सलाहकार जर्मन क्लिमेंको भी पिछले साल कह चुके हैं कि पश्चिमी देशों ने इंटरनेट पर इस तरह कब्जा किया है कि वह सिर्फ एक बटन से ही रूस को ग्लोबल इंटरनेट से काट सकते हैं. अब सवाल ये उठता है कि पुतिन और उनके सलाहकार अमेरिका पर इतने हमलावर क्यों हैं? दरअसल, अमेरिका ने रूस को हैकिंग अटैक के सोर्स की लिस्ट में डाला हुआ है. यानी अमेरिका में होने वाली हैकिंग की बहुत सारी घटनाएं रूस से होती हैं. यही वजह है कि इंरनेट को लेकर अमेरिका और रूस के बीच मतभेद हैं. रूस अपना खुद का इंटरनेट बनाना चाहता है, जिसे वह अपने तरीके से नियंत्रित कर सके. देखा जाए तो रूस अपने देश में इंटरनेट के जाल को ग्रेट फायरवॉल ऑफ चाइना जैसा बनाना चाहता है.

3- चीन की 'ग्रेट फायरवॉल ऑफ चाइना' जैसा नेटवर्क

चीन ने अपने यहां इंटरनेट के इस्तेमाल पर नियंत्रण रखने के लिए एक मजबूत सिस्टम तैयार किया है, जिसे ‘ग्रेट फायरवॉल ऑफ चाइना’ के नाम से जाना जाता है. इसमें सरकार ने तरह-तरह के कई फिल्टर लगाए हुए हैं, जिनकी मदद से चीनी अधिकारी ये तय करते हैं कि चीन के लोग इंटरनेट पर क्या देख सकते हैं और क्या नहीं. यानी चीन जो और जैसा चाहता है वही चीन के लोग देखते हैं. जिस तरह से चीन ने 'ग्रेट फायरवॉल ऑफ चाइना' बनाया है, उसी की तर्ज पर रूस में भी एक नेटवर्क बनाया जा रहा है, जिसके जरिए रूस के अंदर की सारी चीजों तक लोग आजादी के साथ पहुंच सकेंगे, लेकिन जैसे ही कोई ट्रैफिक रूस के बाहर जाएगा, उसकी मॉनिटरिंग शुरू हो जाएगी. मुमकिन है कि रूस के बाहर के इंटरनेट का इस्तेमाल करने के लिए कई तरह के फिल्टर से भी गुजरना पड़े.

4- सरकार को कितना फायदा कितना नुकसान

इस फैसले से रूस की सरकर पर आर्थिक बोझ काफी बढ़ जाएगा. सबसे पहले तो 134 अरब रूबल यानी करीब 144 अरब रुपए हर साल टेलिकॉम ऑपरेटर्स को मुआवजे के तौर पर देने होंगे. इसके अलावा एक्सचेंज के रजिस्टर को बनाने के लिए अतिरिक्त 25 अरब रूबल यानी करीब 27 अरब रुपए खर्च होंगे. एक सीनेटर Andrei Klishas का कहना है कि सरकार पहले ही 20 अरब रूबल यानी करीब 21 अरब रुपए का प्रावधान कर चुकी है, जिसका इस्तेमाल विदेशी हमलों से रूस के इंटरनेट को बचाने में किया जाएगा.

5- इस फैसले से क्या बदलेगा?

इस फैसले के लागू होने के बाद रूस के लोग एक तरह से दुनिया से कट से जाएंगे. ग्लोबल इंटरनेट से जुड़ना तब न तो आसान रहेगा ना ही आजाद. जैसी व्यवस्था रूस बनाना चाहता है, उसके लिए रीयल टाइम में ट्रैफिक की जानकारी और सभी ऑपरेटर्स की सारी स्कीमों की जानकारी रूस के कम्युनिकेशन रेगुलेटर Roskomodzor को देनी होगी, जिसे वहां से सर्विस प्रोवाइडर नामुमकिन सा बता रहे हैं, लेकिन रूस इस बार अपनी बात पर अड़ा हुआ है. इसके अलावा रूस के एक इंटरनेट एक्सपर्ट Filipp Kulin कहते हैं कि अगर ऐसा किया जाता है तो इसका मतलब होगा कि रूस पहले से ही पूरी दुनिया के साथ एक तरह के युद्ध की स्थिति में हैं. उनका कना है कि हमें ये सोचना चाहिए कि न्यूक्लियर वॉर होने पर परमाणु सर्दी की स्थिति में आलू कैसे उगाए जाएं, ना कि इंटरनेट कैसे चलाएं. आपको बता दें कि परमाणु सर्दी वह स्थिति होती है, जब किसी परमाणु युद्ध के बाद धुएं की मोटी चादर के चलते सूरज किरणें जमीन तक नहीं पहुंच पाती हैं.

रूस में इंटरनेट बंद होने के संकेत तो काफी समय से मिलने लगे थे. पुतिन का इंटरनेट को सीआईए प्रोजेक्ट कहना और उनके सलाहकार का ये कहना कि पश्चिमी देश एक बटन से रूस का इंटरनेट बंद कर देंगे, ये सब इशारे ही तो हैं. वैसे भी डुप्लीकेट नेटवर्क बनाने की बात तो 2014 में ही उठ गई थी, जिसे 2017 में पुतिन ने दोहराया भी था और अब 2019 आते-आते इसे लेकर एक बिल बन चुका है. हालांकि, विपक्ष का कहना है कि 2014 में इंटरनेट को बंद करने की कवायद हुई थी, लेकिन उसे बंद नहीं किया जा सका. इतना ही नहीं, रूस ने टेलीग्राम जैसे ऐप को भी ब्लॉक करने की कोशिश की, लेकिन फेल हो गए. यहां तक कि खुद कई रूसी अधिकारी भी टेलीग्राम का इस्तेमाल वीपीएन के जरिए करने लगे, ताकि पकड़ में ना आएं.

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