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Updated: 26 अगस्त, 2019 07:49 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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बड़े बुजुर्ग अक्सर ही एक कहावत बताते रहे हैं कि हर कामयाब पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है. ये बातें किस दौर में हुईं मुद्दा वो नहीं है. आज के परिदृश्य में मुद्दा है बराबरी का. जिस तरह हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला होती है. उसी तरह हर कामयाब महिला के पीछे भी एक पुरुष होता है. अब जो इस बात को समझना हो तो हम पीवी सिंधु का रुख कर सकते हैं. ओलंपिक सिल्वरमेडल विनर पी.वी. सिंधु ने स्विट्जरलैंड में बीडब्ल्यूएफ बैडमिंटन वर्ल्ड चैम्पियनशिप-2019 के फाइनल में नोजोमी ओकुहारा को करारी शिकस्त देकर खेल जगत में एक नया इतिहास रच दिया है.

बैडमिंटन वर्ल्ड चैम्पियनशिप 2019 के फाइनल में सिंधु ने जीत दर्ज करते हुए गोल्ड मेडल जीता है. सिंधु वर्ल्ड चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं. दिलचस्प बात ये है की इससे पहले अभी तक किसी भी भारतीय महिला या पुरुष ने बैडमिंटन वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल नहीं जीता था. सिंधु की इस सफलता पर अगर गौर कियुआ जाए तो मिलता है कि ये जीत केवल सिंधु की नहीं है. इस जीत में जहां एक तरफ सिंधु की मेहनत है तो वहीं दूसरी तरफ इसमें पी गोपीचंद का मार्गदर्शन और कुर्बानियां भी हैं. बात अगर साफ़ साफ़ कही जाए तो पीवी सिंधु की इस कामयाबी के पीछे पुलेला गोपीचंद का हाथ है.

पीवी सिंधु, पी गोपीचंद,खेल, गोल्ड मेडल, ओलंपिक, PV SIndhu सिंधु ने भले ही बैडमिंटन वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड जीता हो अगर ये जीत केवल उनकी नहीं बल्कि उनके गुरु गोपीचंद की भी जीत है

गोपीचंद के कारण ही आज सिंधु 'पीवी सिंधु' हैं

इस बात में कोई शक नहीं है कि सिंधु में प्रतिभा का भरमार है. मगर उस प्रतिभा को कैसे गोपीचंद ने आकार दिया इसे हम एक किस्से से समझ सकते हैं. बात 2016 से पहले की है. ट्रेनिंग के उद्देश से पीवी सिंधु, गोपीचंद की अकादमी में आई थीं. बताया जाता है कि उस वक़्त सिंधु का स्वभाव बहुत शांत था. गोपीचंद इस बात को जानते थे कि सिंधु अपने इस रूप के साथ मेडल कभी नहीं जीत सकतीं.

सिंधु के अन्दर का डर और घबराहट निकालने के लिए गोपीचंद को एक तरकीब सूझी. गोपीचंद ने सिंधु से साफ़ कह दिया कि जब तक वो बैडमिंटन कोर्ट के बीचों बीच खड़ी होकर मौजूद खिलाड़ियों और कोच के सामने तेज तेज नहीं चिल्लाती तब तक उन्हें बैडमिंटन का रैकेट छूने की कोई अनुमति नहीं है.

कोर्ट के बीचों बीच चिल्लाना सिंधु के लिए आसान नहीं था

हो सकता है ये बात सुनने में बहुत आसान लगे मगर ये सिंधु के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था. सिंधु खूब रोईं. उन्होंने बहुत मिन्नतें की मगर गोपीचंद ने उनकी एक न सुनी. आखिरकार सिंधु को घुटने टेकने ही पड़े. सिंधु ने कोर्ट में खड़े होकर चिल्लाया और अपने अन्दर के डर को दूर करते हुए उन्होंने अपना गुस्सा दिखाया. इस बारे में जानकारी खुद सिंधु के पिता और किसी ज़माने में भारतीय वॉलीबॉल टीम में रह चुके और 1986 के एशियाई खेलों में भारतीय टीम को कांस्य पदक दिलाने वाले पीवी रमण ने कही है.

सिंधु के पिता के अनुसार जब ऐसा हुआ वो सिंधु के साथ मौके पर मौजूद थे. सिंधु के लिए ऐसा करना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि सिंधु आक्रामक न होकर स्वाभाव से बहुत नरम है.

रमण के अनुसार,जब इस बारे में गोपीचंद से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भारतीय बच्चे एक बहुत ही संरक्षित वातावरण में बड़े होते हैं जिसके कारण वे खुद को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं करते हैं. ऐसे में जब बात खेल के मैदान की होती है तो वहां चिल्लाना या फिर अपने अंदर का जोश और गुस्सा दिखाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इससे सामने वाले प्रतिद्वंद्वी पर दबाव पड़ता है जिससे खेल जीतने में मदद मिलती है.

हीरे को तराशा है गोपीचंद ने

ये कहना हमारे लिए कहीं से भी अतिश्योक्ति नहीं है कि सिंधु एक बेमिसाल खिलाडी हैं मगर वो बेमिसाल क्यों हैं इसकी एक बड़ी वजह उनके गुरु पी गोपीचंद हैं. लोगों से भरे बीच कोर्ट में चिल्लाने की बात हो या फिर अनुशासन का मुद्दा पूर्व में ऐसे कई मौके आए हैं जब गोपीचंद ने सिंधु की छोटी से छोटी डिटेल पर न सिर्फ गौर किया बल्कि उसपर काम किया और जहां कमियां थीं उन कमियों को दूर किया.

गोपीचंद के ऐसा करने के बाद ही सिंधु का असली रूप निखर कर आया और वो कितना कामयाब है ये हम उनके उस गेम में देख चुके हैं जिसमें उन्होंने नोजोमी ओकुहारा पर शुरू से दबाव बनाया और आसान जीत दर्ज करके अपना नाम इतिहास में लिखवा लिया.

खुद गोपीचंद ने माना सिंधु की इस कामयाबी के लिए खूब की है मेहनत

ये जीत केवल सिंधु की जीत नहीं है ये जीत साफ़ तौर पर गोपीचंद की जीत है. सिंधु की इस जीत की एक बड़ी कीमत गोपीचंद को चुकानी पड़ी है. एक अच्छे भलेकरियर के बाद गोपीचंद के जीवन में परेशानियां आईं. गोपीचंद ने हिम्मत नहीं हारी और एक नई शुरुआत की. उनके अन्दर एक गज़ब का दीवानापन था जिसे पूरा करने के लिए उन्हें अपना घर तक गिरवी रखना पड़ा. गोपीचंद ने अपनी अकादमी खोली और वो सब हासिल किया जिसकी उन्हें चाह थी. कह सकते हैं कि आज जिस मुकाम पर गोपीचंद हैं वो केवल और केवल उनकी मेहनत और लगन का नतीजा है.

सिंधु के सारथी गोपीचंद ने खूब आलोचनाएं भी सही हैं

सफलता क्षणिक नहीं होती. इसके लिए इंसान मेहनत करता है और समय समय पर उसे आलोचना का भी सामना करना पड़ता है. कुछ ऐसा ही गोपीचंद के साथ हुआ. एक लंबे समय तक उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. ऐसे तमाम मौके आए जब आलोचकों ने उन्हें इतना कुछ कहा जो किसी मजबूत से मजबूत इंसान की कमर तोड़ दे. कहा गया कि गोपीचंद खिलाड़ियों के साथ भेद भाव करते हैं मगर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की और सिंधु के रूप में परिणाम हम सब के सामने हैं.

भले ही अगले ओलम्पिक में अभी ठीक ठाक वक़्त बचा हो. मगर जैसी तैयारी पीवी सिंधु की है और जैसा जज्बा पी गोपीचंद में है कह सकते हैं कि ओलम्पिक का स्वर्ण भारत की झोली में आएगा और ये जोड़ी अपने आप में एक मिसाल कायम करेगी. सिंधु का खेल आगे कैसा रहता है? इसका फैसला समय करेगा. लेकिन अभी जो समय है वो ये बता रहा है कि गुरु और शिष्य की ये परंपरा जो पीवी सिंधु और गोपीचंद ने शुरू की है आने वाले समय में ऐसा बहुत कुछ करने वाली है जो देश लंबे समय तक नहीं भूल पाएगा.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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