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Updated: 13 अक्टूबर, 2015 11:51 AM
सूरज पांडेय
सूरज पांडेय
  @dabanggchulbul
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भारत में क्रिकेट को धर्म माना जाता है और इस धर्म के पुजारी करोड़ों में हैं. हिंदुस्तान में लोग गर्व से कहते हैं कि क्रिकेट में उनकी आत्मा बसती है और उनके लिए वो खेल से कहीं ऊपर हैं.

इस देश में सबसे ऊपर क्रिकेट है

इस बात पर मुझे कोई शक भी नहीं है कि भारत में क्रिकेट का दर्जा बहुत ऊंचा है. क्रिकेट के आगे बाकी सारे खेल फिर चाहे वो दुनिया का सबसे ज्यादा खेला जाने वाला खेल फुटबॉल हो, भारत को विश्वमंच पर कई बार गौरवांगित करने वाली हॉकी हो या फिर एथलेटिक्स और टेनिस, ये सब काफी पीछे हैं.

क्रिकेट से ज्यादा गर्व दिया है इन खेलों ने

अगर हम इन खेलों को क्रिकेट से तोलें तो इन्होंने हमें क्रिकेट से ज्यादा खुशियां और अच्छी यादें दी हैं. हॉकी में हमने लगातार ओलंपिक गोल्ड मेडल जीता. एथलेटिक्स में मिल्खा सिंह, पीटी ऊषा, अंजू बॉबी जॉर्ज और ऐसे तमाम नाम हैं. बाकी खेलों में भी निशानेबाजी में अभिनव बिंद्रा, कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर, जसपाल राणा, हिना सिद्धू जैसे नाम. बैडमिंटन में नंबर एक साइना नेहवाल, प्रकाश पादुकोण, पुलेला गोपीचंद, ज्वाला गुट्टा. टेनिस में लिएंडर पेस, महेश भूपति, सानिया मिर्जा. स्कवैश में दीपिका पल्लीकल, जोशना चिनप्पा, सौरव घोषाल. कुश्ती में केडी जाधव से लेकर सुशील कुमार, वेटलिफ्टिंग में कर्णम मल्लेश्वरी मुक्केबाजी में मैरीकॉम, विजेंदर सिंह, डिंको सिंह जैसे तमाम नाम हैं जिन्होंने समय समय पर तिरंगे की शान बढ़ाई है.

सबसे बुरा हाल है फुटबॉल का

हमारी फुटबॉल टीम जिसके 11 खिलाड़ियों के नाम भी इस देश की 98 फीसदी आबादी नहीं जानती उसने भी समय-समय पर अच्छा खेल दिखाया है. लेकिन इन सबके बावजूद भी हम उंगलियों पर गिनने लायक देशों में खेले जाने वाले क्रिकेट के अंधभक्त बने घूमते हैं. हमारी फुटबॉल टीम की रैंकिंग गिरती है हम बिना वजह जाने अपनी टीम को कोसने लगते हैं. कभी हमने जानने की कोशिश की कि आखिर क्यों हमारी फीफा रैंकिग बार-बार गिरती है? जनाब जब टीम साल में 4-5 मैच ही खेलेगी वो भी कमजोर टीमों के खिलाफ तो रैंकिंग तो गिरेगी ही.

मीडिया भी नहीं देता ध्यान

क्या हमें ये सवाल नहीं करना चाहिए कि प्रफुल्ल पटेल की अगुवाई वाला ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन क्या कर रहा है? अगर वो अपनी टीम के लिए कुछ मैच भी नहीं आयोजित करा सकता तो आखिर उसकी उपयोगिता क्या है? हमने कभी मीडिया से पूछा कि विराट के बल्ले के वजन तक पर खबर बना देने वाला हमारा मीडिया नेशनल फुटबॉल टीम के वर्ल्ड कप क्वालीफायर से पहले कैंप ना आयोजित होने पर खबर क्यों नहीं बनाता ? हमने कभी जानने की कोशिश की कि शॉटपुटर इंद्रजीत सिंह को रियो ओलंपिक तक पहुंचने के लिए पैसे इकट्ठा करने के लिए ऑनलाइन कैंपेन चलाने की नौबत क्यों आई? हर खेल एसोसिएशन के शीर्ष पदों पर बैठे नेता अपनी जेबें भर रहे हैं तो हम क्यों नहीं इसके खिलाफ आवाज उठाते? क्रिकेट में हमने दो वर्ल्डकप, एक टी20 वर्ल्डकप और एक चैंपियंस ट्रॉफी (जिसमें आठ देश खेलते हैं) जीती है. बस इतनी सफलताओं पर ही हम दीवाने हुए जा रहे हैं.

अफीम के नशे से बाहर आना होगा

कार्ल मार्क्स ने ठीक ही कहा था, ‘धर्म अफीम है’ और अफीम के नशे में धुत्त इंसान को कुछ नहीं दिखता. जरूरत है इस अफीम के नशे से बाहर निकलने की और उन्हें सपोर्ट करने की जो तिरंगे के लिए खेलते हैं ना कि उन्हें जो प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के लिए खेलते हैं. तो मितरों आप प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के नौकरों को चियर करो, हमसे ना हो पाएगा. आपको ही मुबारक हो आपका धर्म मुझे गर्व है कि मैं ‘नास्तिक’ हूं.

लेखक

सूरज पांडेय सूरज पांडेय @dabanggchulbul

लेखक इंडिया टुडे (डिजिटल) में पत्रकार हैं.

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