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बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 29 मई, 2022 03:35 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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निकहत जरीन जब इस्तांबुल के रिंग में अपनी प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ ताबड़तोड़ मुक्के बरसाकर वर्ल्ड चैम्पियन बनीं- मुझ जैसों को लगा कि भारत को एक और नया सितारा मिल गया जिसकी हमारे देश को बहुत जरूरत है. अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में छोटे-छोटे देशों के भी सामने हमारा प्रदर्शन औसत से भी नीचे नजर आता है. लेकिन पिछले कुछ सालों में खिलाड़ियों ने खून को पसीने की तरह बहाया और देश ने ना जाने कितने नए नए नायक हासिल किए हैं. निकहत भी उसी सिलसिले की कड़ी हैं. लेकिन जब मैंने अभी हाल में उनके कुछेक इंटरव्यू देखें- बहुत निराशा हुई. निकहत के संघर्ष पर आप चाहे जितनी किताबें, आर्टिकल और बायोपिक बना दीजिए- भविष्य में मुश्किल है कि वे होनहार बॉक्सरों के लिए कोई प्रेरणा बन सकें. काश कि मेरा यह आंकलन बुरी तरह से गलत साबित हो. और मैं अपनी इस स्थापना के लिए कभी सार्वजनिक रूप से माफी मांग लूं.

क्रिकेट को लेकर दावे से नहीं कह सकता मगर दूसरे खेलों में निकहत से पहले आए नायकों को उठा लीजिए, शायद ही कोई ऐसा मिले जो पदार्पण के साथ ही अपने धार्मिक मुद्दों के सवालों को एड्रेस करता दिख रहा हो. शायद एकाध मिल जाएं. हालांकि उनमें से भी ऐसा कोई नहीं है जिसके संघर्ष और उसकी उपलब्धि की एक-दूसरे से तुलना की जाए. सभी अलग-अलग जाति, लिंग, धर्म और भाषा के हैं. निकहत समेत देश के किसी भी खेल नायक ने तश्तरी में चीजों को यूं ही गिफ्ट की तरह हासिल नहीं किया है. ये अलग बात है कि कुछेक प्रतिभाएं चमक बिखेरने के बावजूद क्षेत्रीय राजनीति का शिकार भी हुई हैं देश में.

लेकिन निकहत के इंटरव्यूज और वो पत्रकारों के जिन सवालों को ले रही हैं वे सब एक जैसे हैं और एक उदीयमान खिलाड़ी को देखकर हैरानी होती है. उदाहरण के लिए वे जिन सवालों को ले रही हैं उनमें बॉक्सर की बजाय 'मुसलमान बॉक्सर' के सवाल ज्यादा दिखते हैं. हिजाब के सवाल हैं. मुस्लिम होने की वजह से भेदभाव के सवाल हैं. मुसलमानों के दूसरे सामजिक राजनीतिक मुद्दों के सवाल हैं- हां जो पिछले दो-तीन सालों में एक बहुत बड़ा मुद्दा बन चुके हैं. ऐसा लग रहा है जैसे एक स्थापना बनाने की कोशिश हो रही है और उसका मकसद निकहत की उपलब्धि, बॉक्सिंग के खेल से कहीं ज्यादा आगे की है.

nikhat zareenनिकहत जरीन

निकहत राजनीतिक सवालों को लेकर क्या साबित करने की जल्दबाजी में हैं?

ऐसा इसलिए लग रहा है कि कास्ट, जेंडर और रिलिजन पर बहुत जिम्मेदार नजर आने वाले बीबीसी और द प्रिंट भी मानों निकहत के सामने एक ही सवाल की कॉपी लेकर बैठा है- पता नहीं क्या साबित करने की जल्दबाजी है.

एक जैसे बड़े सवाल और मुसलमान होने के नाते उनके एक जैसे जवाब की वजह तमाम इंटरव्यूज एकरंगी दिख रहे हैं. ये तो रही निकहत और उनके इंटरव्यूज की बात. मगर इन्हीं सवालों से जुड़े दूसरे पहलू को देखते हैं तो उनका संदर्भ उतना भर नहीं है जितना निकहत से पूछा जा रहा है या वो आधिकारिक प्रतिक्रिया दे रही हैं. कुछ उदाहरणों पर ध्यान देना चाहिए. क्या हम इनसे निकहत की सोच का अंदाजा लगा सकते हैं?

साल 2015 में निकहत सीनियर कैटेगरी में आ गई थी. उन्होंने जिस तरह की सामजिक आर्थिक चुनौतियों से जूझा होगा- साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला कोई भी भारतीय आसानी से समझ सकत है. 2016 में उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी हिस्सा लिया. हालांकि 51 किग्रा कैटेगरी की बजाए 54 की वेट कैटेगरी में उन्हें खेलना पड़ा. ऐसा इसलिए हुआ कि 51 वाली कैटेगरी में कई सीनियर खिलाड़ी थे. सिलेक्शन की उम्मीद भी कम थी. कुछ सीनियर अच्छा प्रदर्शन भी कर रहे थे. कई खेलों में वेट एक समस्या है और ऐसा भी लगता है जैसे दिक्कत हमेशा ही रहती होगी. जूनियर खिलाड़ियों की तुलना में एक उम्र के बाद सीनियर खिलाड़ियों का वेट कम या ज्यादा करना भला चुनौती से कम है क्या? यहां तक कि वेट को मेंटेन करना भी. निकहत की उम्र उस वक्त 20 साल से कम रही होगी.

समझिए निकहत को क्यों लग रहा है कि मुसलमान होने के नाते उनसे भेदभाव हुआ

कभी क्रिकेट में भी सुनाई देता था कि सीनियर खिलाड़ियों को फिटनेस तक से छूट दे दी जाती थी. बशर्ते यह ध्यान रखा जाता था कि उन खिलाड़ियों के प्रदर्शन में निरंतरता हो. यह खेलों में वह 'झोल' है जहां भेदभाव से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता. निकहत सहर्ष राजी हो गईं और उन्होंने मेहनत करके जगह बनाई. लेकिन शायद पहली बार उसी समय उन्हें लगा कि 'भेदभाव' हुआ. इंटरव्यूज से तो यही समझ में आता है.

खैर, यह बड़ा मसला नहीं था. बड़ा विवाद तो तब हुआ जब निकहत को लगा कि उनकी प्रतिभा को नजरअंदाज किया जा रहा है. और सबकुछ जानबूझकर हो रहा है. ये साल 2020 का समय है. इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि 2016 से 2020 के बीच निकहत को भेदभाव का सामना ना करना पड़ा हो. हो सकता है. हालांकि इस अवधि में भेदभाव हुआ ही हो, बावजूद निकहत की तरफ से कोई खुलासा या विवाद मैं नहीं देख पाया. साल 2020 तक बहुत सारे बदलाव हो चुके थे. लंबे वक्त से जारी एमसी मैरीकॉम का जादू कमजोर पड़ने लगा था. हालांकि इससे पहले भारतीय मुक्केबाजी महासंघ ने विश्व चैम्पियनशिप के लिए 2019 में ट्रायल नहीं करने की घोषणा की. मैरीकॉम ने कांस्य जीत लिया था तो वह टोक्यो ओलिम्पिक के लिए पहली पसंद बन चुकी थीं. मैरीकॉम 52 किग्रा वेट कैटेगरी में थीं. निकहत ने भी इसी कैटेगरी में दावा पेश किया था.

निकहत को लगा कि वेट कैटेगरी में वे मेरीकॉम से बहुत बेहतर हैं और ट्रायल का नहीं होना उनके या अन्य खिलाड़ियों के साथ अन्याय है. निकहत ने प्रॉपर चैनल के जरिए मुक्केबाजी महासंघ तक अपनी बात पहुंचाई. उस दौर की राजनीति में जब केंद्रीय खेलमंत्री किरण रिजीजू तक यह बात पहुंची तो सामान्य खेल भर की बात नहीं रह गई थी. निकहत ने मैरिकॉम के साथ ट्रायल के लिए चैलेंज किया. कहने की बात नहीं है कि यह मामला भी करीब-करीब हिंदू मुस्लिम वाला टाइप का हो गया जबकि मैरिकॉम खुद अल्पसंख्यक समुदाय से हैं. वे एक ईसाई परिवार से आती हैं. वह भी उत्तर पूर्व से जहां के खिलाड़ी आज भी मुख्यधारा में शामिल होने के लिए जिस तरह की जद्दोजहद से गुजरते हैं शेषभारत उसकी कल्पना तक नहीं कर सकता.

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मैरिकॉम गुरुर रौंद चुकी हैं पर अभी तक परिपक्व नहीं हो पाई निकहत

निकहत-मैरिकॉम मामले में विवाद इतना बढ़ा कि ट्रायल कराना पड़ा. जानते हैं उस फाइट में क्या हुआ था- "मैरिकॉम ने निकहत को 9-1 के अंतर से बुरी तरह रौंद डाला था." मैरिकॉम में इतना गुस्सा था कि उन्होंने गेम के बाद उनसे हाथ भी नहीं मिलाना ठीक नहीं समझा और चली गईं. स्वाभाविक है कि निकहत जिस तरह के आत्मविश्वास और धारणाओं का शिकार थीं, हकीकत से मुकाबला हुआ तो पैरों के नीचे जमीन भी ना बची होगी. समझा जा सकता है कि उनपर क्या बीती होगी? द प्रिंट से उन्होंने खुद कहा कि "हार के बाद वो मानसिक रूप से सबसे निचले स्तर पर चली गई थीं." बावजूद निकहत तमाम परेशानियों और संघर्षों से जूझ कर चैम्पियन तो बन गईं लेकिन एक खिलाड़ी के रूप में अभीतक परिपक्व नहीं दिख रही हैं.

क्या देश को पता नहीं है कि आम भारतीय लड़कियों को खेल के मैदान तक पहुंचने में किस तरह मुश्किलों और कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं? पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक- परंपरागत परिवारों से आने वाली सभी लड़कियां इन्हीं मुश्किलों से पार होकर चैम्पियन बनती हैं. जिस तरह का बहुसंस्कृतिक देश है उसमें निकहत ना तो पहली हैं और ना ही आख़िरी. आधा दर्जन महिला खिलाड़ियों के उदाहरण तो अकेले उत्तर पूर्व में हैं. मैरिकॉम का संघर्ष भला कहां किसी से रत्तीभर कम है. मैरिकॉम की स्थिति में हम आप वैसी अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धि की कल्पना तक नहीं कर सकते. किसी ने सुना कि उत्तर पूर्व की खिलाड़ियों ने कभी आफस्पा जैसे काले क़ानून का जिक्र किया हो?

उत्तर पूर्व के बच्चों को आज से कुछ साल पहले तक देशभर के शहरों, होटलों, बाजारों, विश्वविद्यालयों में चिंकी विदेशी चीनी और ना जाने क्या क्या कहा गया. उनके खाने पर सवाल उठाए गए. उन्हें मारा-पीटा तक गया. क्या किसी खिलाड़ी ने स्टेटस मिलने के बाद उसे मुद्दा बनाया? हां, उन्होंने बिना कुछ कहे अपनी उपलब्धियों से लोगों को जवाब दिया और आज एथलीट में उत्तर पूर्व की बेटियां ही अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का तिरंगा लहरा रही हैं. और उत्तर पूर्व को देश सिर्फ उन खिलाड़ियों के अथक परिश्रम की वजह से पहचान पाया. उत्तर पूर्व की सरसरी हकीकत जानने के लिए लोग आयुष्मान खुराना की अनेक देख सकते हैं जो हाल ही में रिलीज हुई है.

...तो निकहत को हिजाब पहनकर चैम्पियनशिप जीतना चाहिए था

हिजाब किसे पहनना है, कौन पहनेगा? इस पर सक्षम मौलाना/उलेमा बहस कर रहे हैं. नेता भी बहस कर रहे हैं. यह निकहत का विषय नहीं है. बेशक निकहत अपने निजी घरेलू मसले पर बात कर सकती हैं. लेकिन जब हिजाब पहनकर बॉक्सिंग खेला जा सकता है और नियम भी इसकी गवाही देते हैं और निकहत भी ऐसा ही मानती हैं तो उन्हें ऐसे बयानों से व्यर्थ की बहस को उठाने की बजाए नजीर पेश करनी चाहिए थी. हिजाब में निकहत चैम्पियन क्यों नहीं बनीं?

वो शायद हिजाब में विश्व चैम्पियन बनतीं तो भारत की खिलाड़ी दुनिया को एक और बड़ा संदेश देने में कामयाब होती और शायद अफगानिस्तान में भी कोई निकहत उससे प्रेरणा पाती. सड़क पर कहां मुस्लिम होने के संदेह में मारपीट हो रही है वह निकहत का विषय नहीं होना चाहिए. यह समाज और राजनीति का विषय है. और हमारे देश में राजनीति के विशेषज्ञों की कमी नहीं है. हां अगर निकहत को ऐसा लग रहा है कि विषय पर कोई ठीक ढंग से बात नहीं रख पा रहा तो उनके लिए बॉक्सिंग रिंग से बेहतर राजनीति का मैदान ही है.

निकहत के रूप में एक खिलाड़ी का इंटरव्यू पढ़ने गया तो तमाम मौलानाओं-पंडितों और नेताओं और निकहत में कोई फर्क ही नजर नहीं आया. निकहत पर कॉरपोरेट पैसों की बारिश क्यों नहीं कर रहे, मुझे नहीं मालूम- लेकिन राजनीतिक विचार को लेकर ओपन माइंडेड खिलाड़ियों को कोई भी अपना ब्रांड बनाने से बचता है. वैसे भी वे चैम्पियन बनने से पहले उनकी भद्द पिट चुकी है. वे कल किस मुद्दे पर क्या बोल जाएँगी कोई भरोसा नहीं.

ऐसा लग रहा जैसे एक इंडियन बॉक्सर की पहचान की बजाए निकहत एक इंडियन मुस्लिम बॉक्सर की पहचान के रूप में ज्यादा सहज हैं. जिस तरह वे चिढ़ा रही हैं (मैरिकॉम को) और टोंट मार रही हैं- नहीं लगता कि वे बहुत समय तक शीर्ष पर टिकी रह पाएंगी और अपने जैसी दो-पांच लड़कियों को भी प्रेरणा दे पाएंगी. पत्रकारों के विशेष सवालों ने उन्हें लगभग क्रांतिकारी तो बना ही दिया है.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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