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Updated: 30 अगस्त, 2022 02:47 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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एशिया कप में नसीम शाह की बॉल पर रविंद्र जडेजा और  मोहम्मद निजाम पर हार्दिक पंड्या के छक्के से किसी को सकून मिले ना मिले, मगर इन दो छक्कों ने उन दर्शकों को जरूर राहत दी होगी जिन्होंने शारजाह में चेतन शर्मा की गेंद पर छक्के की वजह से देश को एक जीता मैच हारते देखा था. वह मैच शारजाह में ऑस्ट्रेलिया कप का था. छक्का जड़ने वाले 'जंपिंग जैक' जावेद मियादाद साब थे जो पाकिस्तानी बैटिंग लाइनअप की जान थे. भारत के खिलाफ उनका उत्साह हमेशा आसमान पर दिखता था. किरण मोरे की शरारत पर कूदते हुए उनका वीडियो क्रिकेट प्रशंसकों ने देखा ही होगा. खैर, जो भी हो मगर मियादाद का वह छक्का भारतीय क्रिकेट के मानस पर ऐसे गहरे घाव की तरह था जिसका दर्द साल दर साल बना ही रहा.

भारत के खिलाफ ऐसे अलग-अलग मैचों की वजह से पाकिस्तानी खिलाड़ियों का दंभ मैदान पर हमेशा दिखा है. यह तब तक बना रहा जब तक कि अजय जडेजा ने मोहम्मद अकरम और वकार यूनिस को कायदे से धुना नहीं और रावलपिंडी एक्सप्रेस के रूप में कुख्यात दुनिया के सबसे तूफानी गेंदबाज शोएब अख्तर की गेंदों को सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर; यहां तक कि लक्ष्मीपति बालाजी जैसे पुछल्ले बल्लेबाजों ने भी मार मारकर भुरता नहीं बना दिया. चेतन शर्मा पर पड़े छक्के का दर्द और पाकिस्तान का दंभ कबका पीछे छूट चुका है. एशिया कप में भारत पाकिस्तान के मैच में पहली गेंद से आख़िरी बॉल तक इसे साफ़ देखा जा सकता है. नीली जर्सी के सामने उनके खिलाड़ी विवश थे. एक महत्वपूर्ण वक्त में जडेजा को क्लीन बोल्ड करने के बावजूद सेलिब्रेशन में जीत का आत्मविश्वास ही नजर नहीं आया. क्योंकि उन्हें मालूम था उनके सामने मुकाबले में कौन खड़ा है?

भारत-पाकिस्तान के बीच बड़े अंतराल के बाद मुकाबला हुआ. एशिया कप का यह मुकाबला भले कांटे का रहा, बावजूद एक सेकेंड के लिए भी ऐसा नहीं लगा कि भारत मैच गंवाने ही जा रहा है. मुकाबला आखिर के ओवर तक जरूर पहुंचा. मगर टीम इंडिया की तैयारी और उसके बल्लेबाजों का आत्मविश्वास आसमान पर ही नजर आया. पंड्या ने मैच के बाद कहा भी कि रन चाहे सात होते या पंद्रह, उन्हें तो गेंदे मैदान के बाहर ही भेजनी थीं. पंड्या नाकाम भी रहते तो उनके बाद आने वाला बल्लेबाज भी बिल्कुल वही करता. या फिर दूसरे एंड पर खड़े दिनेश कार्तिक ऐसी नौबत ही ना आने देते. भारत हर हाल में मैच जीतता. सिर्फ इसलिए कि यह टीम, 20 साल पहले वाली टीम से हर मिजाज में बहुत अलग है. इसमें प्रबंधन, गहराई, आक्रामकता और बौद्धिक कौशल- सबकुछ है.

india vs pakहार्दिक पांड्या

यह आज की बात नहीं, हमेशा हारे हुए पाकिस्तान के पक्ष में नैरेटिव खड़ा कर दिया जाता है

तो भारत जीता और उसकी जीत हर लिहाज से बेमिसाल है. मगर सालों से चला आ रहा सिलसिला है कि थमने का नाम नहीं ले रहा. सिलसिला यह कि पाकिस्तान के खिलाफ भारत की जीत चाहे जितनी बेमिसाल हो उसे कमजोर करने वाली कहानियां गढ़ ही दी जाती हैं. खोज ली जाती हैं. और भारत को किसी भी मंच पर कमजोर करने वाले उसे प्रचारित करने के लिए पहले से मुस्तैद बैठे ही रहते हैं. एशिया कप के सबसे शानदार मैच में दो चीजें खोज ली गईं जिनके शोर में भारत की शानदार जीत के जश्न और इससे उपज रहे सवालों को दबाया जा सके. कुछ चीजों की गैरजरूरी आलोचना, प्रचार और महिमामंडन कुछ इस तरह है कि हारने वालों की टीम स्पिरिट और उनके खिलाड़ी को लगभग महामानव ही बना दिया गया और इसमें जडेजा-पंड्या समेत टीम इंडिया की दिलेरी दबकर रह गई. यह हमेशा से होता रहा है.

एशिया कप के लिए भी मैच से पहले स्क्रिप्ट पर काम शुरू हो गया था. पाकिस्तानी एक्सपर्ट नाना प्रकार के बहाने बनाते नजर आए. भारत में संसाधन बहुत है. क्रिकेट का माहौल है. क्रिकेटर्स को बढ़ाने वाले लोग हैं. अलाना-फलाना तमाम चीजें आ रही थीं. पाकिस्तान के तमाम पूर्व क्रिकेटर जो अब यूट्यूबर हैं और भारतीय दर्शकों के बीच अपने कंटेंट पर व्यूज लाकर घर चलाते हैं- उन्होंने स्थापित ही कर दिया कि भाई मुकाबला भले दो टीमों का हो रहा है मगर पाकिस्तान की टीम बहुत कमजोर है. मानो पाकिस्तान हार भी जाए तो भारत की जीत को एक पिद्दी पर मिली जीत के रूप में प्रचारित करेंगे और किसी तरह जीत ही जाए तो कहा जाए कि "वाह कितनी बेहतरीन टीम है जिसने अपने से बहुत मजबूत टीम को पटककर दे मारा. जबकि इन एक्सपर्ट्स से पूछा जाए कि भला टीम पाकिस्तान आख़िरी बार किसके खिलाफ गदर मचाते दिखी थी?

नसीम शाह हारकर जीतने वाले बाजीगर नहीं पाकिस्तान की जुगाडू टीम की सच्चाई हैं

मीडिया के एक धड़े में दूसरा ही खेल दिख रहा है. नसीम शाह जिन्होंने केएल राहुल और सूर्यकुमार यादव को सीधे बोल्ड मारा उनकी जमकर तारीफ़ हो रही. यहां तक कहा जा रहा कि अगर वे अनफिट ना हुए होते तो मैच का नतीजा दूसरा होता. उनकी गेम स्पिरिट के सब कायल दिख रहे. कमेंटेटर्स ने भी उनकी टीम स्पिरिट को सराहा. सोशल मीडिया पर नौजवान गोलंदाज को 21 तोपों से कम सलामी मिलती नहीं दिख रही. भारत में पाकिस्तान के लिए गंगा जमुनी माहौल बनाने वाला इंटरनेशनल मीडिया नसीम शाह को हार कर जीतने वाले 'बाजीगर' के रूप में प्रस्तुत करता दिख रहा. नजर दौड़ा लीजिए. जबकि सवाल तो यह होना चाहिए था कि जो गेंदबाज चार ओवर का एक स्पेल- वह भी अंतराल पर डालने में भी सक्षम नहीं है वह इतने बड़े मैच में किस मजबूरी के तहत उतारा गया?

अब पाकिस्तान का कोई खिलाड़ी विराट कोहली के हलवा कैच को टपका दे तो इसमें कोहली का दोष थोड़े है. वह तो मौका पाने पर 35 रन ठोकेगा ही. जडेजा, मोहम्मद नवाज की जिस गेंद पर आउट हुए थे- उसपर उनका अफसोस देखिए. दूसरे एंड पर खड़े हार्दिक की मुस्कान देखिए. जो कह रहे थे- प्यारे यही तो वह गेंद थी. सच में वह गेंद चार या छह रन के लिए थी. बावजूद चूक गए. खैर यही तो क्रिकेट है. लेकिन उससे पहले जडेजा ने नसीम शाह पर जो लहराकर छक्का मारा था क्रिकेट की किसी भी किताब में उसे दर्शनीय ही कहा जाएगा. उस शॉट के लिए जिगरा चाहिए. उन्होंने जो इनिंग खेली वह भी बेमिसाल कही जाएगी. हार्दिक ने जो तूफ़ान मचाया- उससे बेहतर कुछ था क्या इस मैच में?

यह टीम इंडिया की स्पिरिट और मैच की तैयारी थी जो उनकी जीत में साफ़ साफ़ दिखती है. और यह तैयारी एक मैच भर के लिए नहीं है. उसके पीछे अपमानों के अंतहीन कड़वे अनुभव हैं. इस जीत के पीछे भारत की डायवर्सिटी भी है जिसे अभी बहुत बहुत दुरुस्त किया जाना है. निश्चित ही दुनिया के साथ कदमताल करते भारतीय नागरिकों का स्वाभिमान भी जुड़ा है. पाकिस्तान में तैयारी नहीं दिखी. उनका खिलाड़ी इतने बड़े मैच में अनफिट रहा. कप्तान गेंदबाजों के बेहतर प्रदर्शन के बावजूद उनका सही से इस्तेमाल नहीं कर पाया. और मोहम्मद नवाज के स्पेल को लेकर आखिर तक किंतु परंतु बना रहा.

अब ये क्या बात रही कि नसीम शाह मां की मौत पर मैच खेलते रहे और घर नहीं आए थे. इसमें कैसी देशभक्ति. अगर आपातकाल में नसीम की जगह लेने वाला कोई नहीं है तो पाकिस्तान को क्रिकेट बंद ही कर देना चाहिए. सचिन तेंदुलकर भी विश्वकप में पिता की मौत के बाद घर चले आए थे. भारतीय संस्कार यही कहता है. जो मोर्चे पर है वह लड़ेगा. इसका मतलब यह नहीं कि बाकी की चीजें बंद कर दी जाएंगी. फिर कभी मौका नहीं मिलेगा. सचिन ने उस टूर्नामेंट के बाद कितने रन बनाए जाकर देख लीजिए. हालांकि उस विश्वकप में भारत का प्रदर्शन बहुत ही निराशाजनक था.

कुछ लोग नसीम की कम उम्र का भी हवाला दे रहे. अरे महाराज. बूढ़े कार्तिक नहीं दिखाई दे रहे जिनका करियर बस चार साल कम है बावजूद वो रिषभ जैसे खिलाड़ी को बाहर कर मैच में खेला. उसका स्ट्राइक रेट और हाल के कुछ सालों में प्रदर्शन देखिए. इससे बढ़िया कोई गेम स्पिरिट हो सकती है क्या?

सवाल तो इस मैच के बहाने पाकिस्तान क्रिकेट की हालत पर होनी चाहिए थी. इतने बड़े देश में अच्छे खिलाड़ियों का बैकअप ही नहीं है. क्या पाकिस्तान क्रिकेट में मठवाद नहीं है? वहां डायवर्सिटी है भी क्या? पाकिस्तान में क्रिकेट खेलने वाले कहां से और कौन लोग हैं? इस मोर्चे पर पाकिस्तान क्रिकेट का हाल वही नजर आता है जो उनकी राजनीति, सेना और कारोबार में दिखता है.

जय शाह वाले वीडियो का जुबैर से फैक्ट चेक करवाए लोग

जबकि भारत के कम से कम आधा दर्जन खिलाड़ी ऐसे थे जो टीम में होना डिजर्व करते हैं. पाकिस्तान के खिलाफ उतारे जा सकते थे. लेकिन कम्पीटीशन इतना है कि हर्शल पटेल और बुमराह जैसे गेंदबाजों के स्क्वाड में नहीं होने के बावजूद आर आश्विन जैसा सबसे अनुभवी गेंदबाज भी बेंच पर बैठा रहता है. टीम में जगह नहीं मिल पाती. रिषभ पंत की भी भूमिका दर्शक से ज्यादा नहीं थी.

टीम पाकिस्तान की है तो पाकिस्तान वाले बेहतर समझ सकते हैं कि वे नसीम शाह की तारीफ़ से संतुष्ट हैं या आलोचना करने की उनमें क्षमता है. और जहां तक बात भारत के वैशाखनंदनों की है- उन्हें हर जगह राजनीति ठूसने से परहेज करना चाहिए. जिस वीडियो के आधार पर कहा जा रहा कि उन्होंने तिरंगे का अपमान किया, उसी आधार पर और भी बात निकलती है. आपने कैसे समझ लिया कि जय के बाजू में खड़ा व्यक्ति उन्हें तिरंगा दे रहा था लहराने को. हो सकता है कि वह कोई और बात कह रहा हो जिसे जय शाह ने सिर हिलाकर मना किया हो. अच्छा तो यह होता कि बाजू में खड़े उस व्यक्ति या वहां आसपास मौजूद लोगों से प्रतिक्रिया ली जा सकती थी. मोहम्मद जुबैर को बोल देते. वो फैक्ट चेक कर देते. उस्ताद हैं इसके.

लग तो यही रहा कि भारत की जीत बर्दाश्त से बाहर है. यह वो बीमारी है जिसका कुछ भी नहीं किया जा सकता.

लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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