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Updated: 02 मई, 2019 12:14 PM
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गर्मियों का समय जहां स्कूल की छुट्टियों का होता है वहीं गर्मियों के इन आलस भरे महीनों में से किसी एक दिन स्कूली बच्चों की और साथ ही साथ उनके माता-पिता की नींद भी उड़ जाती है. ये दिन होता है रिजल्ट का. किसी को सेकंड डिवीजन, किसी को मेरिट लिस्ट मिलती है और कुछ फेल भी हो जाते हैं. हर स्कूल में लगभग इसी तरह का रिजल्ट मिलता है, लेकिन अगर कोई कहे कि किसी एक राज्य के 165 स्कूल ऐसे रहे जहां एक भी बच्चा पास नहीं हुआ तो? यहां बात हो रही है यूपी बोर्ड के रिजल्ट ही.

यूपी और बिहार बोर्ड में नकल को लेकर बहुत सी बातें की जाती हैं. और ये हवा-हवाई कल्पना नहीं बल्कि असलियत है क्योंकि यूपी-बिहार में नकल के कई मामले सामने आए हैं. यही कारण है कि इस बार यूपी बोर्ड स्टूडेंट्स के लिए हाई स्कूल और हायर सेकंड्री की परीक्षाओं को लेकर बहुत सावधानी रखी गई थी और इसे ही कारण बताया जा रहा है 165 स्कूलों के जीरो रिजल्ट का. एक दो नहीं पूरे 165 स्कूल ऐसे हैं जिनमें कोई भी पास नहीं हुआ. एक बच्चा भी नहीं.

इतना ही नहीं यूपी के 388 स्कूलों में रिजल्ट 20% से भी कम रहा. यूपी बोर्ड के डायरेक्टर विनय कुमार पांडे कहते हैं कि ये रिजल्ट दरअसल सख्त नियमों के कारण आया है जो नकल रोकने के लिए लागू किए गए थे.

यूपी बोर्ड, परीक्षा, यूपी बोर्ड रिजल्ट, सोशल मीडियायूपी बोर्ड के रिजल्ट ने शिक्षा के क्षेत्र की बहुत बड़ी खामी को उजागर कर दिया है.

इतना ही नहीं कौशांभी जिसे नकलची माफिया के लिए सुरक्षित स्थान माना जाता था वहां भी इस बार की हाई स्कूल परीक्षा में नकल करने नहीं मिली और यहां भी 13 स्कूल ऐसे रहे जहां किसी भी बच्चे को पास होने लायक नंबर नहीं मिल पाए.

इंटरमीडिएट परीक्षा में ऐसा ही संदिग्ध स्थान अलीगढ़ और मैनपुरी के स्कूलों का है.

यूपी बोर्ड रिजल्ट के बारे में क्या कहते हैं आंकड़े?

यूपी बोर्ड के रिकॉर्ड्स के मुताबिक कौशांबी के अलावा, हाईस्कूल परीक्षा में सबसे ज्यादा जीरो रिजल्ट पाने वाले जिले हैं प्रयागराज (7 स्कूल), मिरजापुर (6 स्कूल), इटाह (6 स्कूल), बलिया (5 स्कूल), गाजीपुर (5 स्कूल), हरदोई (4 स्कूल), आजमगढ़ (3 स्कूल), अलीगढ़ (3 स्कूल), चित्रकूट (3 स्कूल), प्रतापगढ़ (3 स्कूल) ऐसे ही 2 स्कूल बहराइच, मऊ, जौनपुर, सोनभद्र, शाजहानपुर, कन्नौज, फतेहपुर में हैं, इसके अलावा सिद्धार्थ नगर, देवोरिया, वाराणसी, चंदौली, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, कासगंज, मोरादाबाद, बरेली, बदाऊं, राए बरेली जैसे जिलों में भी 1-1 स्कूल ऐसे हैं.

ऐसे ही इंटरमीडिएट परीक्षा में जो जिले जीरो रिजल्ट वाले स्कूलों से भरे हुए हैं वो हैं प्रतापगढ़ (5 स्कूल), गाजीपुर (5 स्कूल), आजमगढ़ (4 स्कूल), प्रयागराज, गोंडा और अयोध्या में 3 स्कूल, इटाह, हाथरस, कानपुर देहात, कन्नौज, जलाऊं, अमेठी, बहराइच, बलिया और जौनपुर में दो-दो स्कूल ऐसे हैं जिनका इसी तरह का जीरो रिजल्ट रहा है. ऐसे ही कई जिले 1 स्कूल वाले भी हैं.

क्या सिर्फ सरकारी स्कूलों का रहा है खराब रिजल्ट?

नहीं ये भ्रांति कि सिर्फ सरकारी स्कूल के बच्चे चीटिंग करते हैं या फिर वहीं खराब रिजल्ट रहता है ये यूपीबोर्ड परीक्षा परिणामों ने तोड़ दी है. जिन 388 स्कूलों में 20% से कम रिजल्ट रहा है उनमें 139 हाईस्कूल थे और 249 इंटरमीडिएट स्कूल. जिन स्कूलों में जीरो रिजल्ट हैं उनमें 50 सरकारी स्कूल हैं, 5 सरकारी फंडिंग से चलने वाले, 84 प्राइवेट स्कूल हैं. ये सभी हाई स्कूल कैटेगरी में हैं. अगर बात इंटरमीडिएट की करें तो 15 सरकारी स्कूल, 58 सरकार द्वारा फंडिंग से चलने वाले, 176 प्राइवेट स्कूल भी शामिल हैं.

कुल मिलाकर यूपी बोर्ड के रिजल्ट ने एक और बड़े सवाल को जन्म दे दिया है कि आखिर क्यों उत्तर प्रदेश को भी शिक्षा के मामले में इतना पिछड़ा हुआ है. हिंदुस्तान के 10 सबसे अशिक्षित राज्यों में से एक उत्तर प्रदेश है जिसका नंबर 7वां है. यहां 67.68% से भी कम शिक्षा दर है और ये अपने आप में काफी है जानने के लिए कि किस कदर प्रदेश में विकास की जरूरत है. शिक्षा को लेकर कड़े नियम बनाए गए हैं स्कूलों में चीटिंग रोकी गई है, लेकिन सबसे जरूरी ये है कि स्कूलों की पढ़ाई को देखने वाले भी कुछ नियम होने चाहिए. 

ये तो ठीक है कि इस बार ताल ठोंक कर यूपी बोर्ड के अधिकारी कह रहे हैं कि उन्होंने नकल रोकी. लेकिन क्या इसकी पैरवी की जा सकती है कि आखिर क्यों इन स्कूलों में बिलकुल भी पढ़ाई नहीं हुई? सरकारी स्कूल और सरकारी ग्रांट पाने वाले स्कूलों पर तो खास नजर होनी ही चाहिए, लेकिन वो नहीं होना शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी कमी को उजागर करता है. 

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