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Updated: 03 दिसम्बर, 2015 04:32 PM
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धर्म बड़ा या कर्म... यह सवाल कोई आम सवाल नहीं है, पहले मुर्गी या पहले अंडा से कहीं ज्यादा दिमाग का दही करता है यह सवाल. इसके चक्कर में कहीं सहिष्णुता-असहिष्णुता जैसी भयंकर आवाजें सुनाई देने लगती हैं तो कहीं बोको-हराम और ISIS का जन्म हो जाता है. और तो और, अपने को सभ्य कहने वाले समाज में भी इसी के चक्कर में किसी भी हालत में अबॉर्शन तक को गैर-कानूनी माना जाता है! अब इंग्लैंड के एक स्कूल में क्लास के दौरान नमाज अदा करने को लेकर प्रशासन और अभिभावकों के बीच 'जंग' छिड़ी हुई है.

इंग्लैंड के वेस्ट यॉर्कशायर में एक स्कूल है - मिरफील्ड फ्री ग्रामर स्कूल एंड सिक्स्थ फॉर्म. यहां पढ़ने वाले कुछ मुस्लिम बच्चों के अभिभावकों ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का मन बनाया है - कारण है इनके बच्चों को स्कूल के अंदर नमाज अदा करने की अनुमति नहीं देना. और इस कारण से कुछ बच्चों को ठंड एवं बारिश में स्कूल के बाहर जाकर नमाज अदा करना पड़ा. स्कूल के कुछ बच्चों ने अपनी शिकायत में यह भी कहा है कि उन्हें भविष्य में नमाज अदा नहीं करने के संबंध में वॉर्निंग भी दी गई है.

6 वर्षों तक न्यूज इंडस्ट्री में रहने के बावजूद मेरा ऐसे किसी न्यूज से पाला नहीं पड़ा है जहां या तो स्टूडेंट्स या उनके अभिभावकों ने स्कूल-कॉलेज में लायक शिक्षक या प्रोफेसरों के अभाव के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की हो. लेकिन प्रार्थना, धर्म के नाम पर छुट्टी से संबंधित कई केस-मुकदमों की खबरों को खुद ही लिखा या संपादित किया हूं. इससे कुछ और हो या नहीं, सामाजिक चेतना और जनता की मानसिकता का पता तो चल ही जाता है - हमारे बच्चों की शिक्षा क्वॉलिटी की हो या न हो, लेकिन उनके धर्म के रास्ते में कुछ भी अड़चन नहीं आनी चाहिए.       

पर्व-त्योहार हर धर्म में होता है. लोग इसमें शामिल हों, परिवार के साथ वक्त बिताएं... इसके लिए लगभग हर देश की सरकारें छुट्टियां देती हैं - कम से कम लोकतांत्रिक देश की सरकारें तो निश्चित ही. लेकिन धर्म के नाम पर अगर आप हर दिन छुट्टी की बात करेंगे तो शायद ही कोई इसे तर्किक कहेगा... और अगर आप पढ़ने-लिखने-खेलने-कूदने की उम्र में धर्म के नाम पर क्लास से छुट्टी की बात करेंगे तो वह हास्यास्पद ही होगा. जरा सोचिए अगर हर धर्म के लोग अपने-अपने अनुसार प्रार्थना, नमाज, प्रेयर के लिए हर एक दिन छुट्टी लेने लगें तो क्या होगा?

वर्तमान व्यवस्था में पैदा होने से पहले ही भ्रूण तक का धर्म तय कर दिया जाता है. उसके बाद स्कूलों के अनुसार उनसे हर सुबह 'ओ फादर' या 'सरस्वती वंदना' या 'नमाज' अदा करवाई जाती है. काश ऐसा हो पाता कि हर एक शिशु को उसके वयस्क होने तक शिक्षा और सिर्फ शिक्षा दी जाती. धर्म की किताबों को तब वह खुद से पढ़ता और खुद ही यह तय करता कि कौन सा धर्म उसकी सोच के करीब है और उसकी शरण में चला जाता. काश ऐसा हो पाता!

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लेखक

चंदन कुमार चंदन कुमार @chandank.journalist

लेखक iChowk.in में पत्रकार हैं.

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