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Updated: 12 अप्रिल, 2019 10:45 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
  @parulchandraa
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कोई शक नहीं कि सरोगेसी ने बहुत से नाउम्मीद लोगों को माता-पिता बनाया है. अब तक ये उन महिलाओं के लिए वरदान था जो किन्हीं कारणों से मां नहीं बन सकती थीं, लेकिन अब ये समलैंगिक पुरुषों के लिए भी वरदान है जो बिना महिला के पिता नहीं बन सकते.

अमेरिका के नब्रास्का की एक वृद्ध महिला सिसिल जिनकी उम्र 61 साल है, उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया है. अपने ही बेटे के बच्चे को पैदा करके सिसिल दादी बन गई हैं. उन्होंने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया है जिसका नाम उमा रखा गया है. उन्होंने ये सब अपने बेटे के लिए किया जो समलैंगिक है.

mother61 साल की उम्र में दिया स्वस्था बच्चे को जन्म

सिसिल के बेटे मैथ्यू ने इलियट के साथ 2015 में समलैंगिक विवाह किया था. अपने भाई बहनों के बच्चों को देखकर उन्होंने भी अपना परिवार बढ़ाने का फैसला किया. वो दोनों पिता तो बन सकते थे लेकिन मां नहीं और बच्चा पाने के लिए उन्हें एक सरोगेट की जरूरत थी. इसलिए उन्होंने IVF की मदद लेने का निर्णय किया.

surrogacyमैथ्यू और इलियट अब पिता बन गए हैं

बच्चे के लिए इलियट की बहन ने अपने एग डोनेट किए थे. जिन्हें मैथ्यू के स्पर्म के साथ निषेचित कराया गया. क्योंकि वो चाहते थे कि बच्चे में दोनों परिवारों का डीएनए हो.

अब जरूरत थी एक कोख की जिसमें भ्रूण को प्लांट किया जाना था. फिर मैथ्यू की मां यानी सिसिल ने कहा कि वो इसके लिए सरोगेट मदर बनेंगी. उस वक्त इस जोड़े को मां का ऐसा कहना मजाक लगा. लेकिन डॉक्टर्स ने विश्वास दिलाया कि ये मुमकिन है. और सिसिल के गर्भ में भ्रूण प्लांट कर दिया गया जो उमा के रूप में सबके सामने है.

surrogacyइलियट अपने बच्चे को अपने सीने से लगाए है

लेकिन ये बिल्कुल भी आसान नहीं था

बच्चा पैदा करने की एक उम्र होती है. और 61 साल वो उम्र नहीं थी. जाहिर है किसी भी महिला के लिए एक उम्र के बाद गर्भ धारण करना बहुत मुश्किल होता है. सिसिल का गर्भाशय एकदम ठीक था. लेकिन ज्यादा उम्र की माओं में डायबिटीज और ब्लड प्रेशर का भी रिस्क होता है इसलिए ये गर्भावस्था आसान तो नहीं थी. सिसिल को हार्मोन्स भी लेने पड़े जो गर्भावस्था में जरूरी होते हैं. फिर भी डॉक्टरों की पूरी निगरानी में ये डिलिवरी नॉर्मल हो सकी.

सिसिल कहती हैं- 'ये एक बेटे के लिए उसकी मां की तरफ से दिया हुआ तोहफा है'

हालांकि जब ये खबर लोगों के बीच पहुंची तो ये अखबारों की सुर्खियां बन गई. लोगों ने सिसिल के इस फैसले को सराहा भी लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी जिन्होंने इसकी आलोचना की. लेकिन एक मां ही है जो अपने बच्चों के लिए सारी मुश्किलें झेल जाती है.

surrogacyएक मां की तरफ से बेटे के लिए इससे बेहतर तोहफा कुछ नहीं हो सकता था

आखिर माएं ये फैसला क्यों ले लेती हैं

ये कोई पहली बार नहीं है कि किसी मां ने अपने गे बेटे के लिए उसकी संतान को जन्मा हो. ब्रिटेन में 2015 में ऐसा पहली बार हुआ था जब एक गे व्यक्ति की 46 वर्षीय मां ने उसे बच्चे को जन्म दिया था. लेकिन इसके बाद कहीं न कहीं से ये खबरें आती रहीं और सुर्खियां बनती रहीं.

असल में आईवीएफ तकनीक से ये सब कुछ बहुत आसान हो गया. अब लोगों को पता है कि वो सरोगेसी से अपना खुद का बच्चा पैदा कर सकते हैं. इसलिए ये ज्यादा उम्र की माएं भी ये फैसला लेने से पीछे नहीं हटतीं क्योंकि इसमें भले ही उन्हें शारीरिक परेशानी हो, लेकिन किसी और का बच्चा गोद लेने से उन्हें ये बेहतर लगता है. पहले ये मुमकिन नहीं था लेकिन विज्ञान से हर असंभव को संभव कर दिया है. अपनी संतान के लिए एक मां का प्यार उससे कुछ भी करवा लेता है.

समलैंगिक संबंधों के दंश झेल रही हैं तीन पीढ़ियां

समलैंगिक रिश्तों की एक सच्चाई ये भी है कि जब समलैंगिक पुरुष अपना परिवार बढ़ाने के बारे में सोचते हैं तो उनकी माएं सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं. प्रभावित वो भी होती हैं जो जो खुद बच्चा पैदा करने के लिए तैयार हो जाती हैं. और प्रभावित वो भी होती हैं जो अपने गे बेटे के बच्चों की पूरी जिम्मेदारी एक मां की तरह उठाती हैं. क्योंकि जाहिर तौर पर ऐसे बच्चे मां के प्यार और दुलार के बिना ही बड़े होते हैं. वो माएं जो अपने जीवन के उस दौर में हैं जब वो पहले की तरह एक्टिव नहीं हैं, उनका शरीर उनका साथ नहीं देता, डायबिटीज है या बीपी से परेशान हैं, उस वक्त भी वो एक बच्चे को अपनी कोख में रखने की हिम्मत कर लेती हैं. खुद बच्चा न भी पैदा करें तो अपने बेटे के बच्चे का बहुत ख्याल रखती हैं. क्योंकि समलैंगिक लोगों की संतान होना एक असंभव बात होती है, और जब वो आ जाती है तो वो किसी चमत्कार जैसी ही होती है.

आज हम अगर करण जौहर या तुषार कपूर के बच्चों को देखें, जो सरोगेसी की बदौलत ही आए हैं, तो बच्चों के लिए अगर सबसे ज्यादा समर्पित कोई है तो वो बच्चों की दादियां ही हैं, जो बच्चों के लिए मां बनी हुई हैं. हालांकि दादियां तो बच्चों को प्यार करती ही हैं लेकिन इस केस में उस बच्चे की पूरी जिम्मेदारी उनकी ही होती है. पिता भले ही कहते रहें कि मैं बच्चों की मां भी हूं और पिता भी. लेकिन मां की जगह तो कोई पिता नहीं ले सकता. और चूंकि घर में बच्चों की मां नहीं हैं, तो दादियां ही मां बनी हुई हैं. पिता सभी झंझटों से फ्री.

समलैंगिक लोगों के जीवन में माता-पिता बनने का सुख तो संभव हो गया है. लेकिन इससे इस बात को बिल्कुल नकारा नहीं जा सकता कि इन संबंधों के दंश तीनों पीढ़ियां झेलती हैं. माओं के संघर्ष आपने देख ही लिए. अपनी मां के बिना जीवन जीना- एक बच्चे के लिए इससे बड़ा संघर्ष क्या होगा. और माता-पिताओं के संघर्ष ये कि एक बच्चा पैदा करने के लिए उन्हें किसी और के एग, स्पर्म और किराए की कोख खोजनी पड़ती है.

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पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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