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Updated: 25 दिसम्बर, 2015 02:34 PM
गिरिजेश वशिष्ठ
गिरिजेश वशिष्ठ
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कुछ लोगों का मानना है कि केजरीवाल के ऑड ईवन प्लान की आलोचना नहीं की जानी चाहिए. पहल हो रही है इसलिए उसका स्वागत करना चाहिए. उसकी आलोचना करना विघ्न संतोषी और परिवर्तन के लिए तैयार न रहने वाले सुविधाभोगी लोगों का काम है. लेकिन तथ्यात्मक आधार पर की जा रही समीक्षा को सुनना समझना और देखना जरूरी है. इसके बगैर सही नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता. मैं पहले इस पूरे मामले पर काफी लिख चुका हूं अब कुछ नयी जानकारियां और तथ्य देख रहा हूं.

अभी ये अभियान सिर्फ 1 पखवाड़े के लिए चलाया जा रहा है और इस दो हफ्ते की एक्सरसाइज के लिए 5 हजार बसों का इंतजाम किया गया है. बस वालों से उम्मीद की जा रही है कि वो अपने वर्तमान कॉन्ट्रेक्ट तोड़कर सरकार से जुड़ जाएं. पहले तो 15 दिन के लिए कोई अपना जमा जमाया धंधा छोडकर क्यों आएगा. जो आ भी रहे हैं उन्हें अब तक कोई योजना नहीं दी गई है जबकि सिर्फ 5 दिन बाकी हैं. उनसे कहा जा रहा है कि उन्हें किलोमीटर के हिसाब से पैसे दिए जाएंगे और कहां से कहां चलना है बताया नहीं.

दूसरा इंतजाम नागरिकों ने कर रखा है. आंकड़ों के मुताबिक अबतक दिल्ली में 13 लाख सैकेण्ड हैण्ड गाड़ियां बिक चुकी हैं और आने वाले दिनों में ये रफ्तार तेज़ होने वाली है. बड़ी संख्या में लोगों ने दूसरे राज्यों से भी इस उम्मीद में पुरानी गाडियां खरीदीं कि आन वाले समय में उन्हें सातों दिन चलाया जा सकेगा. नई गाड़ियों की बिक्री के आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं. लोग आंकड़े हासिल करने की कोशिश में हैं, उम्मीद है दो चार दिन में पूरे आंकड़े सामने आ जाएंगे.

मोटर साइकिल की बुकिंग भी तेज हो गई हैं और माना जा रहा है कि 15 लाख के करीब मोटर साइकिल सड़कों पर जल्द ही दिखाई देंगी.

10 हजार के करीब नये ऑटो रिक्शा को भी परमिट दिया गया है.

एक छोटा सा सवाल है. केजरीवाल साहब सिर्फ 15 दिन की कसरत (उन्होंने खुद कहा है कि जब जब प्रदूषण बढ़ेगा ऐसा अभियान चलाएंगे ये स्थायी व्यवस्था नहीं है, इन 15 दिन के बाद फिर कब ये अभियान शुरू होगा कुछ नहीं पता) के लिए दिल्ली की सड़कों पर 5000 बसें, 10 हजार ऑटो, करीब 13 हजार पुरानी गाड़ियां, 15 लाख मोटर साइकिल और बड़ी संख्या में नयी गाड़ियां झोंक देना कहां की समझदारी है. ये सारे वाहन या तो जाम की समस्या खड़ी करेंगे या फिर पार्किंग की. मकसद था प्रदूषण कम करने का और कर दिया बढ़ाने का इंतज़ाम.

इससे बेहतर होता कि सरकार सड़कों को चौड़ा करती. जाम वाले इलाकों की पहचान करके वहां नया इनफ्रा स्ट्रक्चर लाती. कुछ व्यापार एक से दूसरी जगह ले जाए जाते और कुछ दफ्तरों का समय बदला जाता. ये वही इंतज़ाम है, जो नोएडा में प्रशासन ने किया है.

दिल्ली, प्रदूषण, ऑड ईवन फॉर्मूला

लेखक

गिरिजेश वशिष्ठ गिरिजेश वशिष्ठ @girijeshv

लेखक दिल्ली आजतक से जुडे पत्रकार हैं

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