होम -> समाज

 |  6-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 25 जनवरी, 2019 08:18 PM
श्रुति दीक्षित
श्रुति दीक्षित
  @shruti.dixit.31
  • Total Shares

हिंदुस्तान में पिछले कुछ सालों से नई-नई बीमारियों ने लोगों को बहुत ज्यादा परेशान करना शुरू कर दिया है. बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, निपाह, ZIKA वायरस और भी न जाने क्या-क्या है जिससे आए दिन भारतीयों को बचना पड़ता है. कुछ खास राज्यों में इसकी मार ज्यादा है. जैसे दिल्ली में स्वाइन फ्लू और डेंगू, राजस्थान में जीका वायरस, केरल में निपाह आदि. अब केरल और कर्नाटक में एक और बीमारी ने लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया है. ये बीमारी है Kyasanur Forest Disease (KFD). कर्नाटक (शिमोगा) से जन्मी ये बीमारी मंकी फीवर भी कही जाती है. ये नई नहीं है, लेकिन पिछले कई सालों से इसका कोई केस सामने नहीं आया था. पर अब एक बार फिर इस बीमारी की दहशत में लोग जी रहे हैं.

क्या है ये Monkey Fever?

जापानी इंसेफलाइटिस की तरह ही क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज है. इसमें तेज बुखार के साथ शारीरिक संरचना पर बुरा असर पड़ता है. जोड़ों के साथ ही पूरे शरीर में दर्द रहता है. आंख व गले पर भी बुरा असर पड़ता है. इसके स्‍पेशलि‍स्‍ट डॉक्‍टर बताते हैं कि कर्नाटक की जंगलों में पेड़ों की पत्तियों से क्यासानूर पनपता है. यह वायरस बंदरों के माध्यम से सबसे पहले इंसानों तक पहुंचा है. गर्मियों में इस वायरस का खतरा ज्यादा रहता है, पर केरल और कर्नाटक में अभी भी इस वायरस की मार जारी है.

केरल में दो साल बाद इस बीमारी का पहला केस सामने आया है. ये असल में वेक्टर बॉर्न डिसीज यानी कीड़ों से फैलने वाली बीमारी है. क्योंकि ये कीड़े बंदरों को शिकार बनाते हैं और बीमार, इन्फेक्टेड या मरे हुए बंदर के पास आने मात्र से इंसानों को ये बीमारी हो सकती है.

मंकी फीवर, बीमारी, केरल, कर्नाटकमंकी फीवर सबसे पहले 1957 में सामने आया था.

इस बीमारी का सबसे पहले पता चला था 1957 में. क्योंकि ये कर्नाटक में जंगलों में क्यासानूर वायरस का पता चला था और उससे बंदरों की बड़ी संख्या में मौत हो रही थी इसलिए इसे क्यारानूर फॉरेस्ट डिसीज या मंकी फीवर कहा गया था.

2016 में मंकी फीवर के कई केस सामने आए थे जहां कुछ लोगों की मौत भी हुई थी. कर्नाटक, गोवा, केरल से आने-जाने वाले यात्रियों को सावधानी बरतने को कहा गया था. लगभग दो सालों से ज्यादा परेशान नहीं कर रहा था, लेकिन अब फिर से ये उठा है. इस बीमारी के बारे में ये बात थोड़ी राहत देती है कि निपाह या स्वाइन फ्लू की तरह इसका अभी तक एक इंसान से दूसरे इंसान में ट्रांसफर होने की बात सामने नहीं आई है. यानी अगर कोई इस बीमारी का मरीज है तो उससे ये बीमारी किसी अन्य इंसान में नहीं फैलेगी. साथ ही, इसका असर मवेशियों पर भी होता है, लेकिन उनसे भी ये बीमारी किसी और को नहीं फैलती है. हालांकि, ये जानलेवा है. हर साल करीब 20-40 लोगों की मौत मंकी फीवर से होती है. और इसके करीब 300-400 मरीज सामने आते हैं. पर पिछले दो सालों से ये आंकड़ा न के बराबर था.

केरल और कर्नाटक में लोगों को हो रहा मंकी फीवर...

केरल के वायनाड में 36 साल के एक मरीज को ये बीमरी हो गई है. हालांकि, अब वो खतरे से बाहर बताए जा रहे हैं. इसी के साथ, एक अन्य मरीज को भी इसी बीमारी के लक्ष्ण हैं और अभी उसकी जांच चल रही है. वायनाड डिस्ट्रिक्ट मेडिकल ऑफिसर आर.रेणुका का कहना है कि इन मरीजों को ये बीमारी कर्नाटक से लगी हो इसकी गुंजाइश है. ये लोग कर्नाटक के बैराकुप्पा के एक फार्म में काम करने गए थे. इसके बाद 20 जनवरी को इन्हें डिस्ट्रिक्ट मेडिकल हॉस्पिटल लाया गया.

कर्नाटक-वायनाड बॉर्डर पर मेडिकल टीमें अलर्ट हो गई हैं और जंगलों की भी जांच की जा रही है. साथ ही, लोगों को चेतावनी भी दी जा रही है.

इंजेक्शन तो तैयार लेकिन मरीज परेशान-

KFD से लोहा लेने के लिए मेडिकल डिपार्टमेंट तैयार हैं. वो बॉर्डर पर और जंगलों के पास स्थित गांव में जाकर वैक्सीन देने की बात कर रहे हैं, लेकिन एक मेडिकल ऑफिसर का कहना है कि लोग वैक्सीन लेने को तैयार ही नहीं हैं. हालांकि, उन्हें जंगलों में जाने से पहले क्या-क्या करना चाहिए इसके लिए चेतावनी दे दी गई है.

वैक्सीन जो बनाया गया है वो 1960 के दशक में ही बनाया गया था और उसके बाद से इसे ज्यादा अपडेट नहीं किया गया है. 2006-11 के बीच इसपर दो स्टडी की गई हैं. एक स्टेट हेल्थ ऑफिस द्वारा और दूसरी नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरोलॉजी द्वारा और उन स्टडी में ये सामने आया है कि वैक्सीन की कमी है.

ये वैक्सीन भी सिर्फ 7 से 65 साल के मरीजों को ही असर करता है और इस एज ग्रुप के बाहर भी कई लोग मंकी फीवर का शिकार होते हैं. साथ ही, इस वैक्सीन को लेना भी एक परेशानी भरा सबब है. शुरुआत के पहले महीने में दो बार इसे लेना होता है और फिर हर 6-9 महीने में दोबारा लेना होता है.

साथ ही इस इंजेक्शन को लेने का बाद हाथ में दर्द भी होता है. क्योंकि मंकी फीवर ज्यादातर गरीब तब्के को होता है जिन्हें रोज़ाना खेतों या जंगलों में जाना पड़ता है तो लोग इसलिए वैक्सीन लेने से डरते हैं क्योंकि हाथ दर्द काम कर असर करेगा.

इसके पहले भी मचाई है इस बीमारी ने तबाही-

केरल के वायनाड में ये पहली बार नहीं है जब इस बीमारी के लक्ष्ण दिखे हों. सबसे पहला केस 2013 में हुआ था. इससे पहले केरल इस बीमारी से अछूता था. सबसे खतरनाक हालत 2015 में हुई थी जब 102 लोग अकेले इस जिले में मंकी फीवर से परेशान थे और उनमें से 11 की मौत हो गई थी. कई लगभग मरने की कगार पर पहुंच गए थे. 2016 में भी 9 केस आए थे, लेकिन 2017 और 2018 में इस बीमारी का कोई केस नहीं आया था.

कर्नाटक में शिमोगा और केरल में वायनाड और मल्लापुरम में ये बीमारी अक्सर पहुंच जाती है. पर अगर इस साल की शुरुआत में ही इस बीमारी का पता चल गया है तो ये डर बना हुआ है कि कहीं इस साल ये और विकराल रूप न ले ले. फॉरेस्ट डिपार्टमेंट भी अपने स्तर पर जंगलों में जांच में जुट गया है. अगर आप इस इलाके से हैं और जंगलों के आस-पास आते-जाते रहते हैं तो खुद को कीड़ों से बचाने के लिए लोशन या दवाओं का इस्तेमाल करें, साथ ही बंदरों से थोड़ा दूर रहें. साथ ही, अगर ऐसे लक्ष्ण दिख रहे हैं तो तुरंत डॉक्टरी सलाह लें.

ये भी पढ़ें-

पुरुषों की आवाज़ न सुन पाने वाली इस महिला की कमजोरी से कई लोगों को जलन होगी

जब छुट्टी पाने के हों हजार बहाने तो कोई क्यों 5000 रु. देकर 'बीमारी' खरीदेगा

Monkey Fever, Kyasanur Forest Disease, Monkey

लेखक

श्रुति दीक्षित श्रुति दीक्षित @shruti.dixit.31

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय