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समाज

 |  7-मिनट में पढ़ें  |   14-04-2018
विजय मनोहर तिवारी
विजय मनोहर तिवारी
  @vijay.m.tiwari
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हममें से हर एक अपने हिस्से की उम्र में अपना सर्वश्रेष्ठ देकर इस दुनिया से चला जाता है. इसलिए इस काल्पनिक प्रश्न का कोई अर्थ नहीं है कि आज चाणक्य होते तो क्या होता? महात्मा गांधी होते तो क्या कर रहे होते? आंबेडकर होते तो उनका क्या नजरिया होता? 1857 से 1947 के बीच 90 साल भारत की नियति के बेहद महत्वपूर्ण साल हैं. करीब दस हजार साल के ज्ञात इतिहास और सनातन संस्कृति वाले इस देश ने अपनी यात्रा में अनगिनत उतार-चढ़ाव देखे, तूफान झेले. गुलामी के लंबे एक हजार साल भी उसकी नियति में आए और इसकी पूर्णाहुति इन्हीं 90 साल में हुई.

इन 90 सालों में भारत की कोख ने अनगिनत सपूत पैदा किए. हम अभी सिर्फ आंबेडकर की बात करते हैं. आज अनुसूचित जाति या जनजाति का कोई भी व्यक्ति उस दौर और उस समाज की कल्पना भी नहीं कर सकता, जिसमें भीमराव ने आंखें खोली होंगी. तब हमारी सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था में छुआछूत का कैंसर बुरी तरह फैला हुआ था. अछूत माने गए समुदायों में पैदा होने वाले किसी भी बच्चे का कोई भविष्य नहीं था. उसे वही करना था, जो तय था. ब्रिटिश राज में कुछ चीजें बदली थीं और भीमराव के पिता को अंग्रेजों की सेवा में सूबेदार की हैसियत मिल गई थी. बहुत मुमकिन है कि इससे उन्हें सामाजिक रूप से अछूत होने के दंश से बहुत मुक्ति नहीं ही मिली होगी.

dr. bhimrao ambedkarबाबा साहब अंबेडकर ने किया था संविधान के निर्माण

तब कोई आरक्षण नहीं था. जातिगत आधार पर पढ़ने-लिखने या नौकरियों में कोई रियायत नहीं थी. छुआछूत की जड़ें बाहर से ज्यादा दिमागों में भी गहरी थीं. वे भूमिहीन थे. आजीविका के लिए दोयम दरजे के काम और ऊंची जाति के रहमोकरम पर निर्भर थे. उस समाज की कल्पना मात्र से मेरा सिर शर्म से झुकता है. वो हम सबका एक शर्मनाक सच है. एक ऐसे भेदभाव भरे अंधकारमय भविष्य वाले समाज में भीमराव जन्म लेते हैं. जब बंगाल में नवाबों की सड़ी-गली रियासतें खत्म हुईं और अंग्रेजों ने कदम रखे तो एक हजार साल के दमन के बाद बंगालियों ने पहली बार साफ हवा में सांस लेने का अहसास किया. उन्होंने खुले मन से नई भाषा को अपनाया. ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरियों में गए. उनके स्कूल-कॉलेजों में पढ़े. तब मुस्लिमों ने काफिर फिरंगियों से दूरी बनाए रखी. उनके लिए यह शर्म की बात थी कि वे अंग्रेजी सीखें और उन कंबख्तों की नौकरियां कुबूल करें, जिन्होंने उनके तख्त उलट दिए.

महू में पैदा होने के बाद भीमराव का परिवार बंबई चला गया, जहां उन्होंने अंग्रेजों के बनवाए स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई की. वे बड़ोदा स्टेट की स्कॉलरशिप पर अमेरिका गए. भीमराव का शानदार शैक्षणिक रिकॉर्ड आज आरक्षण के नाम पर सिर पर आसमान उठाने वाले उनके अनुयायियों को जरूर देखना चाहिए. अच्छे-अच्छे ऊंची जात वालों के सिर शर्म से झुक जाएं, ऐसी योग्यता है भीमराव की. वे घोर अंधेरे गर्त से उगे सूरज थे. उनके उदय में किसी आरक्षण का टेका नहीं था. प्रखर प्रतिभा के दम पर ही बड़ोदा स्टेट ने उन्हें मदद का पात्र समझा होगा, सिर्फ दलित समुदाय के तो और भी लाखों युवा रहे होंगे.

प्रतिभा के आधार पर हम उन्हें अपवाद मान लेते हैं. आजादी के बाद संविधान के निर्माण के समय यह स्वभाविक था कि वे करोड़ों दलितों के लिए अलग से कुछ करें. भारत की नई व्यवस्था में नेहरू समेत ज्यादातर लोग ऊंची जातियों के थे. मगर आरक्षण को सबने समय की जरूरत माना. रिजर्व सीटों से नेतृत्व चुनकर आया और लाखों युवाओं ने सरकारी नौकरियों में बराबरी से कदम रखे. पचास के दशक में पहली बार आरक्षण का फायदा लेने वालों की अगली और सक्षम पीढ़ी ने सत्तर के दशक में नौकरियां हासिल कीं. नई शताब्दी तक उनकी तीसरी ताकतवर पीढ़ी इसी सीढ़ी से ऊपर चढ़ी. इस बीच इस होड़ में कई और जातियों ने जोर-आजमाइश शुरू कर दी.

अब बाबा साहेब हमारे बीच आज होते तो क्या करते-

1. आरक्षण पर शुरू से ही पैनी नजर रखते. सत्तर के दशक में आरक्षण नीति में कुछ बुनियादी बदलाव चाहते. वे दूसरी पीढ़ी को आरक्षण का फायदा कतई नहीं लेने देते. क्योंकि अब यह जरूरत नहीं, बेजा फायदा था.

2. आरक्षित कोटे से एक अवसर पाने वाले दलित परिवार बेहतर आर्थिक और शैक्षणिक स्तर हासिल कर चुके थे. बाबा साहेब इसे सामान्य वर्ग में आना ही मानते. इस स्तर पर बात बराबर थी.

3. गरीबी सिर्फ दलितों में नहीं थी. गांवों में लाखों सवर्ण परिवार भी उसी लंबी गुलामी की पैदाइश थे. भूमिहीन, गरीब और मजदूरी पर आश्रित. बाबा साहेब इन्हें नजर अंदाज कर ही नहीं सकते थे.

4. वे पहले शख्स होते जो बीस साल बाद आर्थिक आधार पर सबका साथ, सबका विकास चाहते. तब ऊंची जाति के उपेक्षित और प्रतिभाशाली लोग भी सिर्फ उन्हीं की शरण में जाते और वे ही सर्वोत्तम न्यायसंगत रास्ता निकालते. उनसे बेहतर कौन जानता था कि उपेक्षा क्या होती है?

5. वे अनुसूचित जाति, जनजाति के नौकरी प्राप्त अफसर-कर्मचारियों के संगठन बनाए जाने के खुलकर खिलाफ होते. वे कहते-आरक्षितों के संगठन बनाकर आरक्षण को राजनीतिक ढाल मत बनाइए. वर्ना हम दिशा भटक जाएंगे. आप मजबूत हो गए हैं तो दूसरे कमजोरों की सहायता कीजिए.

6. वे आरक्षण पाकर ऊंचे ओहदों पर बैठी पहली पीढ़ी के मंत्री, सांसद, विधायक, अफसर और कर्मचारियों से अपील करते कि अपने-अपने गांवों को ही गोद ले लीजिए. वहां अच्छे स्कूल-कॉलेज खड़े कीजिए. हरेक दलित परिवार के बच्चों की सिर्फ पढ़ाई में मदद कीजिए. (जैसी एक समय उनकी भी किसी ने मदद की थी. बाकी यात्रा उन्होंने स्वयं की.)

7. वे यह अपील जरूर करते कि अब सिर्फ सरकारी नौकरियों की आस में मत रहिए. अच्छी तालीम पाकर अपने रोजगार-धंधे खुद करिए. वे आर्थिक मदद की स्कीमें लाते. स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करते.

8. वे दलित मंत्रियों, सांसदों, आईएएस-आईपीएस-आईएफएस अफसरों, बैंकों, रेलवे, शिक्षा, स्वास्थ्य समेत बाकी सरकारी विभागों में नियुक्त कर्मचारियों से पूछते कि उन्होंने पूरे कार्यकाल में कितने दलित बच्चों का स्तर ऊंचा उठाया. वे जरूर कहते कि आपको सरकार ने ऊंचा उठाया. अब अपनों को ऊपर लाने का काम आपका है. सरकार के आसरे अनंतकाल तक हमारी कौम अपाहिज बनकर बैठी नहीं रहेगी.

9. बाबा साहेब की प्रेरणाा से अस्सी के दशक से गांव, कस्बों और शहरों में दलित उद्यमियों की एक बड़ी ताकतवर फौज खड़ी होना शुरू होती, जो देश की अर्थव्यवस्था में एक इंजन की तरह काम कर रही होती. और तब वे नौकरियों में आरक्षण की पूर्णाहुति चाहते, क्योंकि अब दलित उद्यमी रोजगार देने की हालत में आ रहे होते.

10. हर सरकार के समय वे लीडरों पर नजर रखते कि कोई आरक्षण को मोहरा न बनाने पाए. आरक्षण किसी भी जाति के वोट पाने के लिए फैंका गया टुकड़ा न बन पाए. वे ऐसे लीडरों और उनकी पार्टियों के खिलाफ सबसे पहले शंखनाद करते. खुद मेधावी वकील थे. सुप्रीम कोर्ट जाते. सांसद थे संसद में बोलते. मगर आरक्षण को मोहरा कभी नहीं बनने देते.

बाबा साहेब हमारे बीच नहीं हैं. अगर वे आज अचानक आकर देख पाएं तो हम उनकी आत्मा को बेहद कष्ट में ही पाएंगे. वे माथा ठोक लेंगे कि इस देश में चल क्या रहा है? वे जितने नेताओं से क्रुद्ध होंगे, उतना ही गुस्सा उन्हें अपनी कौम पर भी आएगा. हमारी समस्या यह है कि हम इशारे में उठाई गई उंगली को पकड़कर भव्य स्मारक खड़े करने वाले जड़ बुद्धि और अंधविश्वासी लोग हैं. आरक्षण तो कुछ वक्त के लिए दिया गया एक मददगार संकेत था. सदियों के सताए हुए लोगों को आगे ले जाने का दूरदृष्टिवान बाबा साहेब की उंगली का इशारा. हम उसी मुद्रा में उनकी मूर्तियां चौराहों पर खड़ी करके आरक्षण को ही धर्म बनाकर बैठ गए. अब वह एक अलग ताकतवर डेरा है, जिनके अपने राम रहीम हैं. धर्म के विरुद्ध कोई बात बर्दाश्त नहीं होगी. खबरदार जो कोई कुछ बोला. हम आग लगा देंगे.

परम पूजनीय बाबा साहेब हमें बिल्कुल क्षमा मत करना. हम बखूबी जानते हैं कि हम क्या कर रहे हैं!

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अब आ भी जाओ बाबा साहब और बता दो कि आप क्या थे...

लेखक

विजय मनोहर तिवारी विजय मनोहर तिवारी @vijay.m.tiwari

पेशे से पत्रकार और किताब 'भारत की खोज में मेरे पांच साल' के लेखक हैं.

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