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Updated: 22 फरवरी, 2021 07:33 PM
ज्योति गुप्ता
ज्योति गुप्ता
  @jyoti.gupta.01
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आजाद भारत में पहली बार किसी महिला (Shabnam ko Fansi) अपराधी को फांसी (shabnam hanging) देने की तैयारी चल रही है. शबनम ने अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर घर के सात सदस्यों की बेरहमी से हत्या कर दी थी. राष्ट्रपति ने शबनम की दया याचिका को खारिज कर दी थी, जिसके बाद शबनम की फांसी तय मानी जा रही है. वहीं इस मामले में हिंदू धर्म गुरु महंत परमहंस दास का कहना है कि शबनम को माफी दे दो. जिसके बाद लोगों के रिएक्शन आने शुरू हो गए हैं.

दरअसल, अयोध्या के महंत परमहंस दास ने राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से अपील की है कि वह शबनम को माफ कर दें और उसे फांसी की सजा ना दें. आपको क्या लगता है, क्या शबनम को ऐसे अपराध के लिए माफ किया जाना सही है? धर्म अपनी जगह सही है लेकिन ऐसे में तो अपराधियों के हौसले बुलंद होते रहेंगे. जिस महिला ने अपने हाथों से बड़ी ही बेरहमी के साथ सात लोगों को जान से मार दिया हो, क्या उसको माफी दिया जाना सगी होगा? उन सात लोगों में उसका 10 माह का भतीजा भी था, जिसका गला खुद शबनम ने दबाया था.

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तपस्वी छावनी के महंत परमहंस दास का मानना है कि हिंदू शास्त्रों में महिलाओं का स्थान पुरुषों से बहुत ऊंचा है. एक महिला को मृत्युदंड देने से समाज का भला नहीं हो सकेगा, बल्कि इससे आपदाओं और दुर्भाग्य को न्योता मिलेगा. यह बात भी ठीक है कि शबनम ने जो अपराध किया है वह माफी के लायक नहीं है, लेकिन एक महिला होने की वजह से उसे माफ कर देना चाहिए.

धर्म गुरु का मानना है कि अगर शबनम को फांसी दी जाती है तो किसी का भला नहीं होगा, क्योंकि इसके बाद मुसीबतें और आपदाएं आ सकती हैं. महंत का कहना है कि, हिंदू धर्म गुरू होने की वजह से मैं राष्ट्रपति से अपील करता हूं कि शबनम की दया याचिका स्वीकार कर लें. वह पहले ही जेल में अपने अपराधों का प्रायश्चित कर चुकी है. अगर उसे माफी ना देकर फांसी दी जाती है तो यह इतिहास का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय होगा. हमारा संविधान राष्ट्रपति को कई शक्तियां देता है. उन्हें इसका उपयोग क्षमा देने में करना चाहिए.

वहीं शबनम के नाबालिग बेटे ने भी मां के लिए राष्ट्रपति से दया की गुहार लगाई है. शबनम के बेटे को एक दंपत्ति ने गोद लिया था. हाल ही में जब वह अपनी मां से मिलने जेल गया था तब वह अपने बेटे को बार-बार गले लगा रही थी. शबनम कभी बेटे का माथा चूम रही थी, कभी रो रही थी तो कभी समझा रही थी कि, पढ़-लिखकर अच्छा आदमी बनना. शायद उस मासूम को अभी अपनी मां के जुर्म का अंदाजा भी नहीं है.

अब आप खुद सोचिए कि जब कानून महिला और पुरुष दोनों को बराबर का हक देता है तो क्या सिर्फ महिला होने के नाते से शबनम को माफ कर देना चाहिए. क्या महिलाएं अपराध नहीं करतीं? तो फिर उन्हें सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए? इसके बाद अगर बाकी महिलाओं में अपराध करने का हौसला बुलंद हो गया तो? क्या अपराधियों की भी कोई जाति-धर्म होती है. मैनें तो यही सुना है कि अपराधियों की बस एक ही पहचान होती है और वो है अपराध.

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लेखक

ज्योति गुप्ता ज्योति गुप्ता @jyoti.gupta.01

लेखक इंडिया टुडे डि़जिटल में पत्रकार हैं. जिन्हें महिला और सामाजिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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