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Updated: 08 अक्टूबर, 2015 04:23 PM
विवेक शुक्ला
विवेक शुक्ला
  @vivek.shukla.1610
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एपीजे अब्दुल कलाम साहब को भी इस कब्रिस्तान में दो गज जमीन मयस्सर नहीं होती. ये कब्रिस्तान राजधानी के दिल यानी क्नाट प्लेस से चार-साढ़े किलोमीटर दूर होगा. दरअसल दिल्ली की पंजाबी मुसलमान बिरादरी ने अपनी पहचान को बनाए-बचाए रखने के लिए कई तरह के कदम उठा रखे हैं. सबसे बड़ा तो ये कि इनका अपना कब्रिस्तान है. करोल बाग का कब्रिस्तान कौम पंजाबियान. गैर-पंजाबी मुसलमानों को यहां नहीं दफनाया जा सकता. पहले पंजाबी मुसलमानों का एक कब्रिस्तान राज निवास मार्ग के पास भी होता था. उसके भरने के बाद इन्हें करोलबाग इलाके में जगह मिली.

दिल्ली की पंजाबी मुसलमान बिरादरी के सदर और कभी जाकिर हुसैन कॉलेज के प्रिंसिपल रहे डा. रियाज उमर कहते हैं, हम अपने कब्रिस्तान में किसी गैर-पंजाबी मुसलमान को दफन करने की इजाजत नहीं देते. अगर कलाम साहब को दफन करने के लिए हमें कोई कहता तो हमारे लिए उन्हें अपने कब्रिस्तान में दफन करने की इजाजत देना मुश्किल होता. ये जगह पंजाबी मुसलमानों को सरकार ने दी थी. इसलिए किसी दूसरे को इधर दफनाने की जगह कैसे मिल सकती है.

इस बीच, दिल्ली में गरीब मुसलमानों के बीच में तालीम की रोशनी फैलाने का काम कर रहे मकसूद अहमद कहते हैं कि पंजाबी मुसलमान इस्लाम सम्मत काम नहीं कर रहे. इन्हें अपने कब्रिस्तान में सबको जगह देना चाहिए. हां, ये उसे मैनेज करते रहे.

दरअसल दिल्ली में अच्छी-खासी आबादी पंजाबी मुसलमानों की भी है. ये दिल्ली में करीब 250 सालों से भी ज्यादा समय से हैं. ये पंजाबी नहीं जानते, लेकिन फख्र के साथ अपने को पंजाबी मुसलमान कहते हैं.

अपनी बिरादरी के लोगों की तादाद से लेकर उनका बाकी प्रोफाइल जानने के लिए ये हर पांच साल में एक बार अपनी मुंडगणना भी करते हैं. ये मुंडगणना होती दिल्ली अंजुमन कौम पंजाबियन की तरफ से. वर्तमान में दिल्ली में इनकी आबादी 5090 है. साक्षरता दर करीब 90 फीसदी. पंजाबी मुसलमान बिजनेस के अलावा डॉक्टर, इंजीनियर और दूसरे पेशों से जुड़े हैं. ये एक बात और बड़े गर्व से कहते हैं कि ये पैसे के पीर हैं बाकी पंजाबियों की तरह से.

कैसे बने मुसलमान
आगे बढ़ने से पहले इनका माजी जान लेते हैं. डॉ. रियाज उमर बताते हैं कि 17वीं सदी के अंत में उनके पुरखे बेहड़ा (अब पाकिस्तान के पंजाब में) से हरिद्वार गंगा स्नान के लिए जा रहे थे. रास्ते में उन्हें एक फकीर शम्स तबरेज मिले. वे उनसे बातचीत के दौरान इस कद्र प्रभावित हुए कि उन्होंने इस्लाम मजहब को स्वीकार लिया. मान्यता है कि इस्लाम धर्म को स्वीकार करने के बाद करीब 64 पंजाबी मुसलमानों के परिवार दिल्ली आ गए काम-धंधा करने के लिए. इन्होंने पहले अपना ठिकाना बनाया उस जगह को, जिसे आजकल शालीमार बाग कहते हैं. इन्हें तब उस दिल्ली में अपना कामकाज करने की इजाजत नहीं थी, जिसे हम अब दिल्ली-6 कहते हैं.

कभी थे वालिया, मेंहदीरत्ता, खन्ना
हालांकि इन्होंने इस्लाम तो स्वीकार कर लिया, पर ये अपने हिन्दू धर्म के सरनेम भी नहीं भूले. लगता है भूलना भी नहीं चाहते. अब भी शादी-ब्याह के मौके पर ये एक-दूसरे को अपना सरनेम जैसे वालिया, मेहंदीरत्ता, चावला, सचदेवा, खन्ना वगैरह बताते हैं. इनके बुजुर्ग उर्दू बोलते हैं.  
 
राजधानी के दरियागंज में पंजाबी मुसलमान क्रिसेंट स्कूल चलाते हैं. स्तरीय स्कूल है ये. यहां पर मेधावी स्टुडेंट्स के बोर्ड पर लिखे नाम पढ़ना अपने आप में एक अनुभव होता है. इधर बहुत से मुस्लिम बच्चों के सरनेम चावला, वालिया, सचदेवा, मेंहदीरत्ता जैसे नाम पढ़कर आप चौंकते हैं.

बाकी मुसलमानों से दूरियां
नसीर अब्दुला एक दौर में देश की विज्ञापन की दुनिया की हस्ती थे. कुछ फिल्मों में भी काम किया. नसीर कहते हैं कि हमें दिल्ली के स्थानीय मुसलमान अपना नहीं मानते, हम भी उन्हें अपना नहीं समझते. एक तरह की दूरियां हैं. हम शादियां अपनी बिरादरी में करना पसंद करते हैं. इन्हें पंजाबी सौदागरान बिरादरी भी कहा जाता है. सौदागरान का मतलब कारोबारी से होता है. कनाट प्लेस का मशहूर मरीना होटल, कभी मशहूर शमा प्रकाशन और बहुत से बड़े इलायची और सिगरेट के कारोबारी पंजाबी मुसलमान ही हैं. दिल्ली की तारीखी हार्डिंग लाइब्रेयरी (अब हरदयाल लाइब्रेयरी) का निर्माण सन 1862 में बख्श इलाही नाम के एक पंजाबी मुसलमान व्यापारी ने करवाया था.

एक दौर में तो पंजाबी मुसलमान दिल्ली-6 में ही रहते थे. सब्जी मंडी की बस्ती पंजाबियान इनका गढ़ होती थी. पर अब ये दिल्ली के तमाम इलाकों में रहने लगे हैं.

इस्तेमाल करते पंजाबी शब्द
एक बात और. हालांकि अब पंजाब के बेहड़ा शहर को छोड़े हुए एक लंबा अरसा गुजर चुका है, पर इनकी बोलचाल में पंजाबी के शब्द जैसे थल्ला(नीचे), उत्ते(ऊपर), मंजा(चारपाई) जैसे तमाम शब्दों का प्रयोग होता है.

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लेखक

विवेक शुक्ला विवेक शुक्ला @vivek.shukla.1610

लेखक एक पत्रकार हैं.

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