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Updated: 10 मार्च, 2019 07:40 PM
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यौन शोषण सदियों से एक बहुत बड़ी समस्या रही है और इसका शिकार हुए लोग न सिर्फ अपने आत्मविश्वास को खो देते हैं बल्कि अपने दिल में हमेशा के लिए ये बोझ लेकर चलते हैं. यौन शोषण सिर्फ फिल्मों, किताबों और कहानियों की बात नहीं बल्कि हमारे शहर, मोहल्ले, गलि, घर, आंगन और यहां तक कि कमरे के अंदर की भी बात है. बच्चे, बूढ़े, जवान कोई भी ऐसा नहीं है जो ये कह सके कि यौन शोषण से उसे तकलीफ नहीं हुई हो. जहां महिलाओं का यौन शोषण बहुत आम है, वहीं ये बात हमें नहीं भूलनी चाहिए कि पुरुषों का यौन शोषण कहीं किसी भी हिसाब से कम दुखदाई नहीं होता.

पर ऐसा कितनी बार हुआ होगा कि किसी ने किसी पुरुष के यौन शोषण की बात सुनी हो. इसका कारण ये है कि कई पुरुष अपने साथ हुए यौन शोषण की जानकारी देते ही नहीं हैं. एक रिपोर्ट कहती है कि हर 6 में से 1 पुरुष के साथ जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर यौन शोषण होता है, लेकिन असल आंकड़ा शायद इससे भी ज्यादा हो सकता है क्योंकि कई पुरुष अपने साथ हुए शोषण की रिपोर्ट ही नहीं करते.

पर आखिर ऐसा क्यों?

1. उलझन, क्या मेरे साथ सही हुआ या गलत-

यौन शोषण का शिकार इंसान चाहें महिला हो या पुरुष उसके मन में कई तरह की भ्रांतियां होती हैं. सबसे अहम ये कि क्या मेरे साथ शोषण हुआ है या क्या कुछ गलत हुआ है या ये आम है? ये बात पुरुषों के लिए ज्यादा होती है. बचपन में लड़कों के साथ हुआ शोषण उन्हें लगता ही नहीं कि गलत है या कुछ अलग हुआ है. उदाहरण के तौर पर अगर किसी पुरुष के साथ यौन शोषण कोई महिला कर रही है तो कई बार उन्हें लगता है कि ये सही है. इसी कारण कई बार पुरुषों को असहजता महसूस नहीं होती और इसे हंसी में टाल दिया जाता है. कई लोगों को तो ये लगता है कि शायद ये उन्हीं ने शुरू किया था और सब सही है जिंदगी में. बहुत बाद में ये समझ आता है कि असल में ये सब गलत था. कारण ये है कि भले ही किसी को लगे कि सही हो रहा है या इससे कम उम्र के लड़कों को मर्दानगी का अहसास हो, लेकिन बड़ी उम्र के लोगों और छोटे बच्चों का इस तरह का संबंध खतरनाक परिणाम दे सकता है. ये उस समय भी उनकी सोच नहीं होती.

5-reasons-why-men-does-not-talk-about-their-sexual-harassmentपुरुषों को बदनामी, खीज, आत्मग्लानि और कमजोरी का अहसास उतना ही होता है जितना कि महिलाओं को

साइकोलॉजी के मुताबिक जिस भी लड़के के साथ बचपन में ये हुआ होता है उसे आगे चलकर कहीं न कहीं अपनी निजी जिंदगी में दिक्कत होती है. कई इसे हाइपर-सेक्शुएलिटी से तौलते हैं, कई इसे महिलाओं के प्रति गुस्से से जाहिर करते हैं तो कई पुरुष महिलाओं पर भरोसा नहीं कर पाते और उन्हें गलत ही समझते हैं. बचपन में हुआ यौन शोषण बड़े होने पर सोच पर असर डालता है. अगर दो छोटी उम्र के लड़के हैं और एक बड़ा और एक थोड़ी कम उम्र का है तब समझना और मुश्किल हो जाता है कि ये यौन शोषण था. Michel Dorais एक रिसर्चर और Don’t Tell: The Sexual Abuse of Boys किताब के लेखक कहते हैं कि उम्र इस बात पर बहुत असर डालती है कि यौन शोषण के बाद यौन शोषण का शिकार हुए इंसान की सोच कैसी होगी. अक्सर मेल टू मेल यौन शोषण में लड़कों को बेहद उग्रता का अहसास होता है. और उनका व्यवहार भी वैसा ही बन जाता है.

2. शर्म और स्वयं को दोष देना एक नई समस्या की शुरुआत होती है-

यौन शोषण किसी भी इंसान को अंदर से गंदा महसूस करवाता है. अगर ये बचपन में हुआ है तो बच्चे खुद को बदसूरत, टूट हुआ, गंदा समझने लगते हैं. बच्चे अक्सर ऐसी समस्या के लिए खुद को ही दोषी समझते हैं. खुद को गलत समझने के कारण बच्चे अपने अंदर की भावनाओं को किसी को नहीं बता पाते और असहाय महसूस करते हैं. जहां हर बच्चा खुद को परेशान महसूस करता है वहीं अगर किसी लड़के के साथ छोटी उम्र में शोषण हुआ है तो उसे ये बहुत ज्यादा आत्मग्लानि होती है. उन्हें ये बचपन में ही अहसास करवा दिया जाता है कि वो असहाय हैं और कमजोर हैं. इसे दो तरह से लिया जा सकता है या तो वो बच्चा दबकर रहने लगेगा या खुद को ताकतवर साबित करने के लिए कमजोरों को सताने की कोशिश करेगा. ये सब कुछ पर्सनालिटी पर निर्भर करता है.

हमारे समाज में पुरुष खुद को कमजोर साबित होते नहीं देख सकते हैं और दुनिया के किसी भी धर्म, जाति और समुदाय में पुरुषों को कमजोर समझा नहीं जाता है और वो खुद को यौन शोषण का शिकार नहीं बता सकते हैं. यहां तक कि बहुत छोटे लड़के भी ये सोचते हैं कि उन्हें अपने हमलावर का विरोध करना था और उन्हें कुछ करना था अपनी ताकत दिखानी थी. पर एक छोटे बच्चे से आप एक वयस्क का मुकाबला करने की उम्मीद नहीं रख सकते चाहें वो हमलावर लड़का हो या लड़की. ऐसे में 'मैं ही क्यों?' वाला सवाल सामने आ जाता है. ऐसे में वो बच्चा ये समझता है कि उसने ही कुछ किया होगा जिससे हमलावर उसके पास आया.

3. हमलावर की हां में हां मिलाने की गलती-

पुरुषों के साथ ये अक्सर होता है कि उन्हें अपने साथ हुए बर्ताव के लिए खुद को ही जिम्मेदार मानना होता है. अक्सर यौन शोषण का शिकार होने के बाद वो ये स्वीकार नहीं करना चाहते कि उनके साथ ये हुआ और इसलिए वो किसी भी इंसान के सामने ये नहीं मानते कि वो कमजोर पड़ गए. इसलिए वो इस बात से इंकार करते हैं कि उनका शोषण हुआ है और कई बार हमलावर की हां में हां भी मिलाते हैं कि इसकी वजह वो खुद थे और उन्होंने ही शुरुआत की थी. ये मामला और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि एक तरफ उनके मन में ये भावना होती है कि वो कमजोर हो गई दूसरी तरफ अपने स्वाभिमान को बढ़ावा देने के लिए वो इस गलत बात को भी सही साबित करने की कोशिश करते हैं.

इसे मेल ईगो का एक हिस्सा भी कह सकते हैं. इससे वो हमलावर की हिम्मत को और बढ़ाएंगे और उन्हें लगेगा कि वो ज्यादा कुछ कर सकते हैं. कई बार हमलावर इससे सामने वाले व्यक्ति का गलत फायदा उठा लेता है.

4. अपराध भावना जो कभी खत्म नहीं होती-

यौन शोषण के शिकार पुरुष अक्सर इस बारे में किसी से बात करना पसंद नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है ऐसा होने के बाद जैसे उन्होंने इस बात के लिए रिएक्ट किया वो गलत था. उदाहरण के तौर पर अगर किसी पुरुष के साथ ऐसा हो रहा है तो वो इसका गुस्सा दूसरों पर निकालने की कोशिश करेगा और गुस्सा शांत होने के बाद भी वो किसी को कुछ नहीं बताएगा क्योंकि उसने गलत तरह से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया. यौन शोषण का शिकार कोई पुरुष किसी महिला के साथ गलत कर सकता है, किसी बच्चे को पीट सकता है, कहीं तोड़-फोड़ कर सकता है, चोरी कर या किसी कानून को तोड़कर अपना गुस्सा व्यक्त कर सकता है और इसके बाद वो खुद को गुनहगार समझने लगता है.

कई पुरुष शिकार खुद को गुस्सैल समझने लगते हैं और ये गुस्सा कहीं न कहीं गलत तरह से ही बाहर आता है.

5. समलैंगिकता का ठप्पा लगने का डर-

ये अक्सर शिकार हुए पुरुषों के साथ ऐसा होता है वो ये समझते हैं कि किसी पुरुष ने उनका यौन शोषण कर रहा है तो कहीं उन्हें समलैंगिक होने का ठप्पा न लग जाए. कई लोग ये समझते हैं कि अगर वो खुद गे हैं तो ही अन्य पुरुष उनकी तरफ आकर्षित होंगे और ऐसे में उन्हें ये गलतफहमी हो जाती है कि कहीं न कहीं वो भी समलैंगिक हैं और ये बात वो दुनिया से छुपाना चाहते हैं. कई लोगों को तो ये लगता है कि हमलावर की हरकतों के कारण वो समलैंगिक बन जाएंगे और अब उन्हें लड़कों में ही दिलचस्पी होगी.

Dorais की किताब के अनुसार जितना ज्यादा एक व्यक्ति इस बात पर यकीन करेगा कि यौन शोषण में उसकी गलती थी उतना ही ज्यादा वो समलैंगिकता के डर और उसके असर के बारे में सोचने लगेगा. कई बार तो लड़के (जो पहले से ही समलैंगिक होते हैं,) उन्हें इसका अहसास ही यौन शोषण के बाद होता है.

इन सभी बातों के साथ एक अहम बात भी है वो ये कि लड़कों को लगता है कि वो असहाय हैं और कई बार उन्हें भी बदनामी का डर होता है पर ये डर लड़कियों से कुछ अलग होता है. पर ये चिंता की बात थी और हमेशा रहेगी. बॉलीवुड की फिल्म बदरीनाथ की दुलहनिया में वरुण धवन के यौन शोषण के सीन को कॉमेडी की तरह दिखाया गया था और ये बात बेहद चिंताजनक है. मेल ईगो को लेकर इस तरह के सीन समाज में ये दर्शाते हैं कि पुरुषों का यौन शोषण होता ही नहीं है और ये सिर्फ एक मजाक ही है.

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