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Updated: 26 अप्रिल, 2021 07:19 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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सोशल मीडिया पर बहुत सारे अकाउंट्स और हैंडल ऐसे हैं जिनका एकसूत्री एजेंडा किसी भी स्तर तक जाकर विरोधी की आलोचना करना है. देश में कोविड हैंडलिंग को लेकर नरेंद्र मोदी पर बेहद सख्त प्रतिक्रियाएं देने वाले कुछ हैंडल्स चर्चा में आ गए हैं. दरअसल, आईटी एक्ट 2000 के तहत केंद्र सरकार के अनुरोध पर इन हैंडल्स से किए गए कई ट्वीट हटाए गए हैं. पूरी कवायद के बाद एक तबका इसे भारत में बोलने की आजादी के संकट से जोड़ रहा है. दावा यह भी है कि मोदी का विरोध करने वालों के खिलाफ भारत में सोशल मीडिया के जरिए अंकुश लगाया जा रहा है. क्या सच में मोदी सरकार ऐसे लोगों पर अंकुश लगा रही है? और सबसे बड़ा सवाल ये भी कि बोलने वाले कितने तटस्थ हैं?

ट्विटर ने ज्यादातर जिन ट्ववीट्स को डिलीट किया है वो कोरोना के इलाज में हेल्थकेयर सिस्टम की खस्ता हालत को दर्शाते हैं. हरिद्वार के कुंभ से जुड़े ट्वीट भी हैं, महामारी में जिसके आयोजन पर हर कहीं आलोचना हुई. कार्रवाई झेलने वालों में कइयों को बड़े पैमाने पर फ़ॉलो किया जाता है. इनमें तीन धुर भाजपा विरोधी दलों के नेता हैं. कांग्रेस के सांसद आर रेड्डी, आसनसोल से टीएमसी नेता मलय घटक और टीएमसी के एक राज्यमंत्री शामिल हैं. मोदी के समर्थन या विरोध पर इनकी पार्टी पॉलिटिक्स स्वाभाविक और बिल्कुल साफ़ है.

लेकिन तस्वीर के पीछे का भी दूसरा पहलू भी है. इसे सोशल मीडिया का एक सबसे खराब पक्ष भी माना जा सकता है. सोशल व्यवहार (जिसे गलत या सही जो भी मानें) एकतरफा या तटस्थ नहीं हैं. ठीक इसी तरह मोदी के तमाम सेलिब्रिटी समर्थक भी अपने विरोधियों के लिए आंख मूंदकर निंदा करने वाले एक सूत्री एजेंडा पर चलते हैं. मानवीय पहलुओं पर भले ही दोनों तरफ के कुछ पोस्ट्स से आपकी सहमति हो, मगर इनके हैंडल्स को तटस्थ, ईमानदार और बहुत मानवीय मानने का कोई बड़ा उदाहरण नहीं मिलता.

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फिलहाल तो बहस का मुद्दा कार्रवाई झेलने वाले एक्टिविस्ट पीटर फ्रेडरिक, एक्टर विनीत कुमार और दो फिल्ममेकर्स- अविनास दास-विनोद कापड़ी हैं. महामारी के बाद से पिछले कुछ हफ़्तों में इनके हैंडल्स से कोविड 19 पर सरकार की हैंडलिंग को लेकर रोजाना कुछ ना कुछ लिखा गया है, साझा किया गया. जो एक बात साफ दिखती है वो ये कि कोविड या राजनीति से जुड़ी लगभग हर एक पोस्ट में पीएम नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भाजपा और उसके दूसरे नेताओं की तीखी आलोचना की गई है.

एक और कॉमन चीज दिखती है. हर एक आंदोलन या इवेंट जो भाजपा के खिलाफ थे (जैसे किसान आंदोलन, नागरिकता क़ानून, जम्मू कश्मीर में धारा 370 का खात्मा आदि) या सरकारों के अमानवीय पहलू (लॉकडाउन के बाद शहरों से लोगों का पलायन) या विरोधी दलों के इलाकों में घटित वो मुद्दे जिसे बीजेपी ने तूल दिया (जैसे महाराष्ट्र में सुशांत सिंह राजपूत की हत्या)- में भाजपा के विरोध में खड़े दिख रहे. शिवसेना जैसी पार्टियों से वैचारिक पक्षधरता के मेल नहीं खाने के बावजूद उद्धव ठाकरे के कामों का समर्थन किया. भाजपा विरोधी नेताओं की बड़ी गलतियों पर या तो मुंह फेर लिया या चुप हो नजर आते हैं.

पीटर फ्रेडरिक का नाम किसान आंदोलन भड़काने के लिए टूलकिट में भी आ चुका है. उनके दर्जनों ट्वीट के अंदर मोदी के शासन के तहत भारत में लोकतंत्र के खात्मे और एक हिंदू राष्ट्र में तब्दील हो जाने की घोषणा करते हैं. पीटर फ्रेडरिक को कौन बताए कि भारत सिर्फ केंद्र सरकार नहीं है. कई राज्यों में भाजपा विरोधी दलों की मजबूत सरकारें हैं. मौजूदा हालात में कोविड हैंडलिंग सिर्फ केंद्र सरकार की नाकामी भर नहीं है. राज्य सरकारें (खासकर महाराष्ट्र, दिल्ली और गुजरात) भी बराबर की भागीदार हैं. फिर सिर्फ मोदी पर ही हमले की सुविधा क्यों? अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे को कैसे माफ़ किया जा सकता है.

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जहाँ तक भारत में लोकतंत्र की बात है मोदी के बाद पिछले कई विधानसभा चुनावों में विपक्ष ने भाजपा को हराकर मजबूत सरकारें बनाई जो अभी भी चल रही है. विपक्ष की रणनीतिक हार और राजनीतिक नाकामी को एक तर्क गढ़कर छिपाने की कोशिश की जा रही है.

जब घोषित बौद्धिक तबके के 'वैचारिक डिबेट' का ये स्तर है तो भला इसे कैसे तटस्थ माना जाए? चीजें अगर बहुत ज्यादा सिलेक्टिव हैं तो उसे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला' और 'फांसीवाद' के प्रचार का जामा पहनाकर बचाना तार्किक नहीं है. ये दुर्भाग्य है कि मानवतावादी बौद्धिकों के "सिलेक्टिव अप्रोच" ने उन दलों को मनमानी और गैरवाजिब काम करने दिए या उसे ढापने का काम किया जिसकी वजह से भाजपा के एजेंडा को जनता के बीच जगह मिली. मोदी पर कई बहुत ही घटिया पोस्ट लिख रहे अविनाश दास, लालू यादव की जमानत का स्वागत करते हैं. अविनाश लेफ्टिस्ट हैं और पत्रकार रहे हैं. अब फ़िल्में बनाते हैं. लालू यादव ने बिहार में दलित-पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने के अलावा क्या किया? क्या लालू के शासन में नरसंहारों को भूला जा सकता है. जातीय गोलबंदी तो निजी राजनीतिक फायदे के लिए ही की. आखिर जब जेल जाने की स्थिति में सत्ता छोड़ने की नौबत आई तो वो कौन सी मजबूरी थी जिसके आगे दूसरे योग्य दलित पिछड़े नेताओं को छोड़कर पत्नी राबड़ी देवी को गद्दी पर बिठाना पड़ा?

इस कौन सी वाममार्गी वैचारिकी है जिसमें लालू को इसलिए सही माना जाता है क्योंकि वो बिहार में भाजपा या मोदी के खिलाफ हैं. भाजपा से अलग जाने पर नीतीश सही हो जाते हैं, मगर जैसे ही वो वापसी करते हैं, खराब हो जाते हैं. ये लोग उन वाजहों पर ईमानदारी से बात ही नहीं करना चाहते हैं जिससे भाजपा या मोदी को बढ़त मिली. विपक्ष की ज्यादातर राजनीति का भी यही हाल है जिसकी वैचारिकी को दिशा विनोद कापड़ी और अविनाश दास जैसे लोग दे रहे हैं.

मोदीराज में तमाम चीजों की बर्बादी की घोषणा करते हुए ये लोग बार-बार भूल जाते हैं कि मोदी और भाजपा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत ही हैं. उन्हें जनता ने चुना है. अगर एक शब्द में कहा जाए तो ये "आदतन" मोदी, संघ और भाजपा के अंध विरोध से ज्यादा कुछ नहीं है. और भाजपा की सरकारों को क्या कहा जाए. एक सामान्य ट्रोल की भूमिका में आ चुके ऐसे लोगों पर उनकी कार्रवाई भी आदतन ही नजर आती है. जिसे सिलेक्टिव डिबेटर विक्टिम कार्ड की तरह इस्तेमाल करते हैं.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल में पत्रकार हैं.

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