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Updated: 13 मई, 2022 08:15 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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ताजमहल के 22 बंद कमरों को खुलवाए जाने की मांग को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले में याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि 'ऐसी बातों पर चर्चा घरों में की जाती है, नाकि कोर्ट में. कल आपको हमारे चैंबर में घुसने की भी अनुमति चाहिए होगी.' इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि 'PIL व्यवस्था का दुरुपयोग मत कीजिए. पहले इस मामले की पढ़ाई कीजिए. जाइए पहले एमए कीजिए, नेट और जेआरएफ कीजिए, पीएचडी के लिए विश्वविद्यालय जाएं. अगर आपको कोई संस्थान रिसर्च नहीं करने देता है, तो हमारे पास आइए.' कुल मिलाकर ताजमहल को लेकर दायर की गई याचिका को रद्द करते हुए जजों ने याचिकाकर्ता को खूब खरीखोटी सुना दी. जाहिर है ये उनका विवेकाधिकार था. लेकिन, जब ऐसे ही केरल के पद्मनाभस्वामी मंदिर वाले मामले पर नजर डालते हैं तो तस्‍वीर एकदम उलट नजर आती है. एक पुलिस अफसर की पीआईएल पर वहां के कोर्ट ने ऐतिहासिक मंदिर के कमरों को खोलने का न केवल आदेश दिया था, बल्कि उनका नियंत्रण सरकार को सौंपने का आदेश दे दिया था. आइये, समझते हैं पूरा मामला...

Phd for Taj Mahal PIL Padmanabha Templeपद्मनाभस्वामी मंदिर के खिलाफ लगी PIL पर हाईकोर्ट ने केरल सरकार को मंदिर अपने नियंत्रण में लेने का निर्देश दे दिया था.

क्‍यों याद आई पद्मनाभस्वामी मंदिर की कहानी...

- 2009 में एक पूर्व आईपीएस अधिकारी ने केरल हाईकोर्ट में जनहित याचिका यानी पीआईएल दायर की. आरोप लगाया गया कि त्रावणकोर राज परिवार मंदिर से जुड़ी संपत्ति (हीरे-जवाहरातों, सोने के आभूषणों वगैरह) को निकाल रहा है. मांग की गई कि पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रबंधन का अधिकार त्रावणकोर राज परिवार से लेकर केरल सरकार को दे दिया जाए. इस याचिका के खिलाफ त्रावणकोर राज परिवार के मार्तंड वर्मा ने हाईकोर्ट की शरण ली.

- केरल हाईकोर्ट ने राज परिवार की एक न सुनी. जनवरी, 2011 में आदेश जारी कर दिया कि राज्य सरकार को मंदिर और संपत्तियों का नियंत्रण अपने हाथ में लेना चाहिए. और, पद्मनाभस्वामी मंदिर के कल्लार (मंदिर के तहखानों) को खोलने का फैसला दिया. आखिरकार त्रावणकोर राज परिवार ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली. मई, 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी. और, कल्लार (तहखाना) के आभूषणों और कीमती वस्तुओं की सूची बनाने का निर्देश दिया. वैसे, नवंबर 2012 में एक स्वतंत्र रिपोर्ट में कहा गया कि राज परिवार द्वारा खजाने को निकाले जाने के कोई सबूत नहीं मिले हैं.

- अप्रैल, 2014 में मामले के एमिकस क्यूरी एडवोकेट गोपाल सुब्रह्मण्यम ने सुप्रीम कोर्ट में एक 577 पेज की रिपोर्ट दाखिल की. जिसमें कहा गया कि मंदिर प्रशासन में कई खामियां हैं. उन्‍होंने यह भी बताया कि राज परिवार ने मंदिर के उन कमरों को भी खोला, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदी लगाई थी. त्रावणकोर राज परिवार ने इस रिपोर्ट पर आपत्ति जताई.

- तमाम अपील-दलील के बाद जुलाई 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि मंदिर पर केरल सरकार का नियंत्रण ठीक नहीं है. और उसे वापस त्रावणकोर राज परिवार को सौंप दिया गया. इसके साथ ही केरल की वामपंथी सरकार और त्रावणकोर राज परिवार के बीच चला आ रहा ये मुकदमा लंबी लड़ाई के बाद खत्म हो गया. हालांकि, केरल सरकार मंदिर प्रशासन पर अपनी तिरछी नजर गड़ाए है. 

- केरल की वामपंथी सरकार ने देवस्वोम बोर्ड के जरिये राज्य के सभी मंदिरों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर चुकी है. केवल पद्मनाभस्वामी मंदिर ही एक अपवाद के तौर पर केरल सरकार के नियंत्रण से बचा हुआ था. लेकिन, 1991 में पद्मनाभस्वामी मंदिर की देखरेख करने वाला त्रावणकोर राज परिवार के बलराम वर्मा की मौत के बाद उनके भाई मार्तंड वर्मा के हाथ में कमान आई. तो, इसके बाद से ही केरल सरकार ने पद्मनाभस्वामी मंदिर को देवस्वोम बोर्ड में लाने की कोशिशें शुरू कर दी थीं.

इस पूरी कहानी के साथ कहा यह जा रहा है कि पद्मनाभ मंदिर को लेकर दायर याचिका को पूरी सहानुभूति के साथ सुना गया. और उसका नियंत्रण सरकार को भी सौंप दिया गया था. जबकि ताजमहल को लेकर दायर हुई याचिका उतनी ही निर्ममता के साथ खारिज कर दी गई.

पीएचडी क्यों जरूरी है?

- ताजमहल को लेकर की गई इस जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाइकोर्ट की टिप्पणियों पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है. हर्ष वर्धन त्रिपाठी नाम के एक यूजर ने लिखा है कि ताजमहल के कमरे खोलने की याचिका रद्द करना न्यायालय/न्यायाधीश के विवेक पर है. उनका विशेषाधिकार है, लेकिन याचिकाकर्ता को पढ़ाई करने और पीएचडी करके आने की बात कहकर न्यायालय ने न्याय के मूल सिद्धांत को खारिज करने की कोशिश की है. क्या कम पढ़ा लिखा या अनपढ़ याचिका नहीं कर सकता?

- सोशल मीडिया पर कई यूजर्स का कहना है कि पद्मनाभस्वामी मंदिर के दरवाजे एक जनहित याचिका से खोले जा सकते हैं. लेकिन, ताजमहल के कमरों पर जनहित याचिका मंजूर नहीं की जा सकती है. जबकि, इन्हीं प्रक्रियाओं के तहत ही सच्चाई सामने आती है. लक्ष्मीकांत भारद्वाज नाम के यूजर का कहना है कि इतिहास में पीएचडी करने में 5 साल लग जाएंगे. पर ताजमहल के 22 कमरों के ताले खोलने में 5 मिनट लगेंगे. बताइए कौन सा काम करना चाहिए, मी लॉर्ड ?

- लोगों का गुस्सा सोशल मीडिया पर साफ नजर आ रहा है. एक यूजर का कहना है कि जलीकट्टू, दही हांडी, सबरीमाला आदि के याचिकाकर्ताओं को तो ऐसी नसीहतें नहीं दी गईं थीं? इन मामलों पर फैसले तो ऐसे दिए हैं, मानो उन विषयों पर पीएचडी भी कर रखी हो?

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लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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